कहानी और उपन्यास से भी कठिन विधा है लघुकथा : रामदेव धुरंधर, वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय लघुकथा-सम्मेलन
नारनौल। कहानी और उपन्यास से भी कठिन विधा है लघुकथा। इसे छोटी विधा मानकर हम इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते। यह कहना है पांच हजार से भी अधिक लघुकथाएं लिख चुके बेल ऐर (मॉरीशस) के विश्व-विख्यात साहित्यकार रामदेव धुरंधर का। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा आयोजित ‘वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय लघुकथा-सम्मेलन’ में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि लघुकथा छोटी होने के बावजूद गंभीर भावों की अभिव्यक्ति और बड़े उद्देश्यों की पूर्ति में सक्षम है। इससे पूर्व राष्ट्रपति के विशेष कार्याधिकारी डॉ राकेश दुबे ने बतौर मुख्य अतिथि प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि आज के इस विशाल अंतरराष्ट्रीय लघुकथा-सम्मेलन में जहां एक ओर नए लघुकथाकार पहली बार लघुकथा-पाठ कर रहे हैं, वहीं प्रतिष्ठित लघुकथाकारों द्वारा अपनी सर्वश्रेष्ठ तथा विश्व-स्तरीय लघुकथाएं प्रस्तुत की जा रही हैं। पूर्व राजनयिक और केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार, नई दिल्ली के सहायक निदेशक डॉ दीपक पांडेय ने कहा कि लघुकथा अपने वामन पगों से विराट संसार को नापने की क्षमता रखती है। इस अवसर पर चीफट्रस्टी और वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ रामनिवास ‘मानव’ ने विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि हर देश और भाषा की अपनी संस्कृति होती है। अतः एक ही फॉर्मेट के आधार पर पूरे विश्व की लघुकथाओं का मूल्यांकन करना उचित नहीं है।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के जिला अध्यक्ष डॉ जितेंद्र भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत डॉ पंकज गौड़ के कुशल संचालन में संपन्न हुए इस भव्य लघुकथा-सम्मेलन में बाईस देशों के अट्ठाईस लघुकथाकारों की सहभागिता रही। इस अवसर पर टोक्यो (जापान) की डॉ रमा पूर्णिमा शर्मा ने अजनबी, सुवा (फीजी) की उत्तरा गुरुदयाल ने उम्मीद का दिया, सुवा (फिजी) के ही अमित अहवत ने गिरमिट-गाथा, ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार ‘हैप्पी’ ने आदमी कहीं का, सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) की डॉ भावना कुंअर ने मुखौटे और प्रदीप कुंअर ने नि:शब्द, क्वालालंपुर (मलेशिया) के राजू छेत्री ‘अपुरो’ ने हैसियत, काठमांडू (नेपाल) के श्रीओम श्रेष्ठ ‘रोदन’ ने अलग रास्ता और डॉ पुष्करराज भट्ट ने दिवाली की रौनक, चितवन (नेपाल) की रचना शर्मा ने दस रुपये का ब्याज, आबूधाबी सिटी (आबूधाबी) की ललिता मिश्रा ने आधुनिक कौन?, दुबई सिटी (दुबई) के डॉ नितिन उपाध्ये ने महुआ के फूल, दोहा (कतर) की डॉ मानसी शर्मा ने साथी हाथ बढ़ाना, बेल ऐर (मॉरीशस) के रामदेव धुरंधर ने देवी का मंदिर, मोका (मॉरीशस) की ही कल्पना लालजी ने सपनों की उड़ान, अकरा (घाना) की मीनाक्षी सौरभ ने ज्ञान, सोफिया (बुल्गारिया) की डॉ मोना कौशिक ने ठंडी धूप, ब्रुसेल्स (बेल्जियम) के कपिल कुमार ने रामलीला, कोलोन (जर्मनी) की डॉ शिप्रा शिल्पी ने एक नया आकाश, स्टॉकहोम (स्वीडन) के सुरेश पांडे ने कंबल, ओस्लो (नॉर्वे) के डॉ सुरेशचंद्र शुक्ल ने विदेशी माल, फिलाडेल्फिया (अमेरिका) की डॉ मीरा सिंह ने अधिकार, वर्जिनियां (अमेरिका) की मंजू श्रीवास्तव ने बेगैरत इंसान, टोरंटो (कनाडा) की प्रीति अग्रवाल ‘अनुजा’ ने अधिकार, पोर्ट आॅफ स्पेन (त्रिनिडाड) के डॉ शिवकुमार निगम ने इम्यूनिटी का राज तथा भारत से सिरसा की डॉ शील कौशिक ने परख, नारनौल के डॉ पंकज गौड़ ने यादें, डॉ सत्यवीर ‘मानव’ ने लौट आया नरेन और डॉ रामनिवास ‘मानव’ ने अनलौटे श्रीराम लघुकथा का पाठ किया, जिन्हें पर्याप्त सराहना मिली। कार्यक्रम के अंत में डॉ शील कौशिक द्वारा सम्मेलन में पढ़ी गई लघुकथाओं की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की गई।



