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नेपाल में एमसीसी का भ्रामक प्रचार तथा चिनी प्रभाव : संतोष मेहता

 

 

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संतोष मेहता, काठमांडू । लगभग तीन वर्षों से एमसीसी के बारे में जो भी बहस हुई है, उसने नेपाल को अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में  हल्का बना दिया है। राजनेता हो या कोई और, एमसीसी के विरोध मे सामाजिक संजाल के कुछ कमेंट्स और फेसबुक, यूट्यूब पर कॉन्सेप्ट्स को सुनकर ऐसा लगता है कि ये कहीं से परिचालित हैं l कई टिप्पणीकारों का टिप्पणी इतनी काल्पनिक है कि लगता है उन्होंने एमसीसी दस्तावेज़ का अध्ययन किया भी है या नही। सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार भी हो रहा है। गांव-गांव में भ्रम फैलाया जा रहा है, कुछ लोग तो अभियान ही चला रहे है । एमसीसी को मंजूरी देने से पहले आम जनता के संदेह को दूर करना ही समझदारी होगी।

दरअसल, एमसीसी का विरोध करना राष्ट्रहित में नहीं था, इसलिए मुझे मजबूर होकर एमसीसी के पक्ष में लिखना पड़ा। एक देशभक्त नागरिक के रूप में यह मेरा कर्तव्य भी है।

नेपाल जैसे देश में, जहां हमारा देश अपने नियमित खर्च को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है, हम अपने देश को विकासोन्मुख बनाने के लिए विश्व बैंक और अन्य देशों से पहले ही कई ऋण ले चुके हैं। हमें विकास का छलांग मारनी है और उस छलांग के लिए हमारे पास पर्याप्त पैसा नहीं है, हम पुराने कर्ज को चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। इसके अलावा, लगभग ६० अरब रुपये की विदेशी मुद्रा सब्सिडी उस अर्थव्यवस्था के लिए कोई छोटी राशि नहीं है। यह राशि ऐसे समय में नेपाली अर्थव्यवस्था में तरलता लाती है जब दो साल की कोरोना आपदा के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है और विकास सहायता हर जगह ठप है। यह नेपाल के विदेशी मुद्रा भंडार में जितना योगदान देता है, वह नेपाल की अर्थव्यवस्था कि तरलता को बचाए रखने में भी मदद करेगी।

नेपाल को मिलने वाले अनुदानों में संभवत: सबसे पारदर्शी एमसीसी है। लेकिन, दुर्भाग्य से, इस पारदर्शिता ने अफवाह फैलाने वालों की मदद की। संयुक्त राज्य अमेरिका में किसी भी अन्य विकास भागीदार की तुलना में एमसीसी एक अधिक पारदर्शी और आवश्यक परियोजना है। यदि नेपाल सीमा पार बिधुत व्यापार में सफल हो जाता है, तो नेपाल के लिए त्रिपक्षीय व्यापार करना आसान हो जाएगा और नेपाल ऊर्जा क्षेत्र के माध्यम से अपनी अर्थव्यवस्था का विकास करना सुनिश्चित करेगा। इस परियोजना सफलता के बाद लगभग 2000 के.वी.  बिजली का निर्यात करने कि सम्भावना है, इसलिए यह ट्रांसमिशन लाइन नेपाल के आर्थिक विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाएगी।

अमेरिका को क्या मिलता है, इतनी मदद करने की कोशिश क्यों ? ‘दाल में कुछ काला है’ जैसा सवाल कुछ लोग जोडौ से खड़ा भी कर रहे है। इसका लंबा जवाब देने की जरूरत नहीं है। एमसीसी नेपाल मे बहुत आगे बढ चुकी है करिब ६०० करोड खर्च भी हो चुका है, एक लम्बा प्रोसेस पार कर यह अनुदान आज इस अवास्था मे आ पहुची है। ये  भी हो सक्ता अमेरिका बदलती भू-राजनीति के बीच वह नेपाल के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वसे भी अमेरिकी सरकार खुद को लोकतंत्र के नेता के रूप में बनाए रखने के लिए विकासशील देशों को दुनिया में उनकी विश्वसनीयता बनाए रखने में सहायता करती रही है। सहायता प्रदान करने के लिए, एमसीसी ने लोक कल्याण बजट, लोकतांत्रिक प्रथाओं और खुली अर्थव्यवस्था जैसे संकेतक विकसित किए हैं। संकेतकों के अनुसार, वे न्यूनतम योग्यता तक पहुंचने के बाद ही सहयोग प्राप्ति के योग्य पात्र होंगे। शुरू से ही विकास में भागीदार रहे नेपाल को भी इसी योग्यता के आधार पर चुना गया है। जब कोइ दौड़ में भाग ले और पुरस्कार एकत्र करने की समय पर इन्कार वा आनाकानी कर दे तो आयोजक को बेचैनी हो जाती है। एमसीसी सन्दर्भ मे संयुक्त राज्य अमेरिका का हाल आयोजकों जैसा ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा दिए गए सहयोग और मित्रता से हमें क्यों डरना चाहिए ? ९ वर्षों से जिस खेल मे सहभागी है तो अब पुरस्कृत होने मे क्या बुराइ है ।

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हो सकता है कि यह परियोजना को लागू करने के लिए अमेरिकी पक्ष की उत्सुकता इसलिए भी हो कि एमसीसी की वैश्विक छवि को खराब असर ना हो। संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से नेपाल को सहयोग करता रहा है और उसे ऐसा करना जारी भी रखना चाहिए। बिगत मे शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास आदि के क्षेत्र में दी जाने वाली सहायता देश हित में सिद्ध हुई है। इसलिए अब आगे भी, क्षतिग्रस्त सड़क के बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण और पर्याप्त बिजली का उत्पादन और निर्यात करने में सक्षम बनाना और इन सभी के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना नेपाल को समृद्ध बनाना है। इसकेलिए 2017 में एमसीसी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ, नेपाल को 500 मिलियन डॉलर का अनुदान मिलने वाला है।

एमसीसी कार्यक्रम तहत ३०० किलोमीटर की बिधुत प्रसारण लाइनें (बुटवल से भारत के लिए प्रसारण लाइन सहित), तीन सबस्टेशन, ७७ किलोमीटर सड़क मरम्मत और कुछ तकनीकी सहायता शामिल हैं। कार्यक्रम को चलाने के लिए मंत्रिपरिषद के निर्णय के अनुसार एमसीए-नेपाल की स्थापना की गई है, जो नेपाल सरकार के एक निकाय के रूप में कार्य करता है। मालूम हो कि एमसीसी की टीम 2010 में नेपाल आई थी और 2011 में नेपाल को औपचारिक पत्र भेजा गया था। 14 सितंबर 2017 को एमसीए-नेपाल और एमसीसी के बीच हुए समझौते के क्रियान्वयन की आवश्यक प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया है। संसद से अनुमोदन के बाद ही मुख्य कार्य होना है लेकिन 4 साल बाद भी एमसीसी लागू करने की प्रक्रिया में आगे नहीं बढ़ पाई है।

एमसीसी के बारे में भ्रम और वास्तविकताएं क्या हैं ?

एमसीसी के बारे में व्यापक भ्रांतियों फैलाई जा रही है, जैसे अमेरिकी सेना मुख्य रूप से एमसीसी के माध्यम से नेपाल में प्रवेश करेगी। इसी तरह, एमसीसी की व्याख्या पर विवाद के मामले में, अमेरिकी कानून के अनुसार सुलझाया जाएगा और यह ट्रांसमिशन लाइन के निर्माण के लिए भारत की पूर्व सहमति आवश्यक है, जो हमारी संप्रभुता को खतरे में डाल देगा। और एमसीसी से प्राप्त आय व्यय का ऑडिट का प्रावधान अमेरिकी सरकार को होगा, अनुचित है। आदि। एमसीसी के सन्दर्भ मे सरकार द्वारा आयोजित सर्बदलिय बैठक के बाद नेपाल मजदुर किसान पार्टी के सांसद प्रेम सुवाल द्वारा एमसीसी के सन्दर्भ  जो भ्रन्तिया फैलाई गइ है वह भी इसीतरह का है l

लेकिन वास्तविकता अलग है: संयुक्त राज्य अमेरिका ने दुनिया में जहाँ भी सैन्य ठिकाने स्थापित किए हैं, सभी दितिय  विश्व युद्ध के दौरान या उसके बाद स्थापित किए गए थे। अमेरिका ने गरीबी को कम करने में मदद के लिए कोई कैंप  स्थापित नहीं किया गया है। एमसीसी दस्तावेजों में सैन्यीकरण शब्द का उल्लेख नहीं है। इसके बजाय, दस्तावेज़ में कहा गया है कि “एमसीसी से प्राप्त सहायता का उपयोग सैन्य, पुलिस, मिलिशिया, राष्ट्रीय गार्ड और अन्य अर्धसैनिक संगठनों या इकाइयों को सहायता या प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए नहीं किया जाएगा।” हालाँकि, अफवाहें फैल रही हैं कि इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी के तहत ही एमसीसी है और इसी तहत नेपाल में एक अमेरिकी सैन्य अड्डा स्थापित किया जाएगा। परन्तु एमसीसी परियोजना तथाकथित इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी से वर्षों पुरानी है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह चीनी शक्ति का सामना की तैयारी कर रही है। इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी IPS की अवधारणा का जन्म तब नहीं हुआ था जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने विकासशील देशों की सहायता के उद्देश्य से एमसीसी की स्थापना की। एमसीसी को दुनिया के 50 से अधिक देशों में लागू किया जा रहा है। ये देश न केवल एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हैं, बल्कि पूरी दुनिया में हैं। अगर यह आईपीएस के अधीन होता तो इसे इसी क्षेत्र में लागू किया जाना चाहिए था। इस तथ्य के सामने और ज्यादा भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है कि MCC इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी का एक हिस्सा है ।

सोशल मीडिया पर अफवाहें हैं कि इराक, अफगानिस्तान की तरह अमेरिकी सैनिक नेपाल में आ रहे हैं, लेकिन उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि उन देशों में एमसीसी लागू नहीं किया गया है। एमसीसी अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पारित कानून के तहत दुनिया के गरीब देशों की मदद करने के लिए स्थापित एक कोष है। यह एक विकासशील देश को एक शक्तिशाली राष्ट्र का सहयोग है। चूंकि नेपाल ने 500 मिलियन रुपये की एमसीसी सहायता पर हस्ताक्षर किए हैं, यह पहला देश भी नही है, कुछ  मुलुक जैसे आर्मेनिया, बेनिन, बुर्किना फासो, काबो वर्डे, अल सल्वाडोर, जॉर्जिया, घाना, होंडुरास, इंडोनेशिया, जॉर्डन, लेसोथो, मलावी, मोल्दोवा, मंगोलिया, मोरक्को, मोज़ाम्बिक, नामीबिया, निकारागुआ, फिलीपींस, सेनेगल, सेनेगल मे एमसीसी कॉम्पैक्ट लागू किया गया है। क्या अमेरिकी सैनिक उपरोक्त देशों में आए थे? क्या वे देश अमेरिका के कब्जे में हैं ? जब पता लगाएंगे, तो भ्रम के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।

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चूंकि एमसीसी समझौता एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, नेपाल और एमसीसी के समझौते में उसी अंतरराष्ट्रीय अभ्यास का पालन किया गया है। समझौते में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि विवाद को अमेरिकी कानून के अनुसार सुलझाया जाएगा। अनुबंध में कहा गया है कि कार्यक्रम के संचालन के लिए आवश्यक कार्य, सामान या सेवाओं की खरीद एमसीसी के खरीद दिशानिर्देशों के अनुसार होगी। हमारे सार्वजनिक खरीद अधिनियम का अनुच्छेद 67 इस बाधा को दूर करता है कि “इस अधिनियम में जो कुछ भी लिखा गया हो, यदि खरीद नेपाल सरकार और दाता पक्ष के बीच समझौते के अनुसार उस दाता पार्टी के खरीद दिशानिर्देशों के अनुसार किया जा सकता  है, इस अधिनियम के अनुसार खरीद प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।” विदेशी सहायता की शुरुआत से यह प्रथा रही है। नेपाल का पहले भी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक, आदि) के साथ ऋण सहायता प्राप्त करने के सन्दर्भ मे जो समझौते है इसितारह हैं। यह प्राबधान कहीं और होना देशद्रोह नहीं है, लेकिन एमसीसी में देशद्रोह क्यों हुआ l  एमसीसी एक अंतरराष्ट्रीय सन्धि समझौता के तहत होने के कारण ही नेपाल सरकार के कानुन मन्त्रालय खुद संसद से पास करने की सिफारिस की थी तदनुरुप संसदीय सचिबालाय मे उक्त बिधेयक दर्ता किया गया है l

एमसीसी के तहत प्रमुख कार्यों में से एक बुटवल से भारत तक अंतरास्ट्रीय ट्रांसमिशन लाइन का निर्माण है। और क्या भारत की सहमति के बिना भारत की ट्रांसमिशन लाइन से जुड़ना संभव है ? हालांकि समझौते में यह नहीं कहा गया था कि भारत की पूर्व सहमति आवश्यक है, लेकिन कार्यान्वयन के लिए भारत की पूर्व सहमति आवश्यक है। हमारी बिजली उत्पादन यदि भारत खरिद करने से इन्कार कर देती तो उत्पादन और इतनी लगानी बेकार हो जाता इसिलिए अमेरिका निश्चिन्त होना चाहता हो l हालाकी भारत के साथ् इस मुद्दे पर नेपाल का अलग से सहमति हो चुकी है l इसी अंतरास्ट्रीय ट्रांसमिशन लाइन के तहत हमारी बिजली भारत तथा बंगलादेश मे बेच सकते हैं। यह लाइन हमारी समरिधि के लिए लाइफ लाइन भी है l

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इसी तरह लेखा परिक्षन के सवाल पर मिलेनियम चैलेंज कॉम्पेक्ट की धारा 3.2 में प्रावधान है कि एमसीसी से प्राप्त निधियों की लेखापरीक्षन एमसीसी द्वारा अनुमोदित एक स्वतंत्र लेखा परीक्षक द्वारा की जाएगी, न कि अमेरिकी सरकार द्वारा। इसी खंड में लिखा गया है कि यह प्रावधान नेपाल के महालेखा परीक्षक को लेखा परीक्षन से वंचित नहीं करेगा और महालेखा परीक्षक का कार्यालय एमसीए नेपाल की हर साल होने वाले खर्च का लेखा-जोखा भी करता रहा है।

राजनीतिक दलों की निष्क्रियता और गैरजिम्मेदारी से परियोजना के क्रियान्वयन की उम्मीद धुंधली होती जा रही है । ज्यादातर र्याडिकल कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि के पार्टिया सम्मिलित गठबन्धन सरकार ही एक ठोस निर्णय नही करपा रही है चुकी कम्युनिस्ट नेता एमसीसी के विरोधी प्रतीत होते हैं। उनलोगौ का स्कुलिंग ही अमेरिका मतलब साम्राज्यबादी शक्ति तथा भारत मतलब विस्तारवादी शक्ति है, ये दोनौ देश किसी भी देश का सार्वभौमिकता बिरोधी है । यहि ज्ञान जो बिस्व कम्युनिस्ट सर्वसत्तावादियौ ने नेपाली कम्युनिस्ट को दिया है, पता नही कब् इस ज्ञान से निजात मिलेगा l हालांकि, एमसीसी के मामाले मे जो बिरोध दिखाई देती है ऐसा लगता है कि कुछ और प्रभावशाली टेकनिक इस्तेमाल किया गया है, अन्यथा तथ्यों और तर्क के उपयोग से एमसीसी की यह गांठ खुलनी चाहिए। हमें एमसीसी के खिलाफ बाहरी शक्ति द्वारा प्रायोजित की संभावना का अध्ययन करने की जरूरत है।

साफ है कि चीन को नेपाल में एमसीसी पसंद नहीं है। पिछले साल से, चीनी विश्लेषक (जो निस्संदेह बीजिंग सरकार के लिए बोलते हैं) एमसीसी के कट्टर विरोधी अभिव्यक्ति दे रहे है, चीनी अखबार पोर्टलों में लगातार एमसीसी के खिलाफ बयान बाजी आती रही है। कोई भी आसानी से ही मान सकता है कि चीन नेपाली की स्वतन्त्र निर्णय लेने कि क्षमता को प्रभावित करने के लिए कुछ कर रहा है l एक बात तो स्पष्ट हो गया है कि तत्कालीन सभामुख कृष्ण बहादुर महारा और उसके बाद के सभामुख अग्नि प्रसाद सपकोटा ने पुष्प कमल दाहाल के निर्देशन में सदन में एमसीसी विधेयक पेश नहीं किया। तथ्य यह है कि यह देश संसदीय प्रणाली द्वारा शासित है, इसका मतलब है कि प्रतिनिधि सभा में सबसे गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे पर एक खुली, पारदर्शी और गंभीर बहस होनी चाहिए थी, अभी भी वही कम्युनिस्ट नेतालोग सदन मे एमसीसी टेबुल के खिलाफ है। वे इस तरह की बहस नहीं होने देना चाहते। ऐसा लगता है कि पुष्प कमल दाहाल सदन में अपना प्रभाव साबित कर संसद के बाहर से ‘क्रांतिकारी’ बनकर परियोजना को ‘रद्द’ करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए एमसीसी के मुद्दे को गठबंधन सरकार की नीति और कार्यक्रम में भी शामिल नहीं होने दिया गया l  एमसीसी को अब सदन में प्रवेश कराना चाहिए और प्रतिनिधि सभा में इसे स्वीकार या अस्वीकार करते हुए प्रतिनिधि सभा में बहस करनी चाहिए। यह भी एमसीसी की गांठ को खोलने का सबसे आसान तरीका है।

यदि अब नेपाल एमसीसी समझौते से पीछे हटता है, भले ही इसका कवर पर कोई प्रभाव न पड़े, तो इसका अंतरराष्ट्रीय संबंधों और देश की विश्वसनीयता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में देश का भार हल्का होगा और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में नेपाल का विश्वास धीरे-धीरे कम होगा। जब नेपाल समझौते से हटेगा तो इससे न केवल देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में विश्वसनीयता का सवाल उठेगा, बल्कि इसका अंतरराष्ट्रीय वजन भी कम होगा। गैर-अनुपालन वाले देश के रूप में नेपाल की छवि खराब होगी, विदेशी निवेशकों को अविश्वास का संदेश जाएगा, जो खतरनाक है।

सन्तोष मेहता
नेता लोसपा

 

 

 

 

 

 

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1 thought on “नेपाल में एमसीसी का भ्रामक प्रचार तथा चिनी प्रभाव : संतोष मेहता

  1. Have you read about developments of Japan after Hiroshima blast? Pls read first then you can plan for national development.

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