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जीवन का कोई मोल नहीं है : डा रेखा सिन्हा

 

सोचो तो

कई दिनों से देख रहे हम
रात की रानी खिली नहीं है ,
काई शैवाल सड़कों पर जन्मे
कहीं सुगंध का मेल नहीं है ।

सब हत चिंता में हैं पागल
जीवन का कोई मोल नहीं है ,
बिखरी आशा है क्षण क्षण
दिन का सूरज खिला नहीं है ।

कितने कुबेर हैं घर में बैठे
ठाठ अभी भी बनी हुई है ,
भरी तिजोरी की गठरी से
मन की तृष्णा हटी नहीं है ।

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कल तक वायदे करने वाले
आज न जाने कहाँ छिपे हैं,
डर है उनको जान बड़ा है
जनमत की चिंता अभी नहीं है।

एक चीन से दुनिया काँपी
फैली कराल मुँह को व्यापी,
सिंह गर्जना आज नहीं तो
ढीठ को डरना कभी नहीं है ।

पीठ दिखा नहीं ललकार उठो
जनमत भी है साथ खड़ा ,
मानवता को पीड़ित करनेवाले
दण्डित करना अपराध नहीं है ।

डा रेखा सिन्हा
राजगीर नालंदा

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