किसान आन्दोलनों के झरोखों से दिखता किसान की हालात : कैलाश महतो
कैलाश महतो, पराशी । शर्द के इस मौसम में किसानों के सहभागिता बिना का किसान आन्दोलन अभी मधेश के राजमार्गों को गर्म कर रखा है । राजमार्गों और अन्य सडकों पर पसरे ठण्ड को ज्यादा नहीं भी, तो कुछ न कुछ हदतक सर्दी में गर्मी दिया जा रहा है । सर्दी से राहत देने बाले तप्कों और समूहों को धन्यवाद ।
आजसे तीन साल पहले काठमाण्डौ के एक मल में जासर यादव ने दुवई में काम करने बाले एक बसन्त कुशवाहा से मिलवाया था । भेटघाट के क्रम में कुशवाहा जी ने स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन और उसके भविष्य के बारे में पूछा था । मैंने उन्हें मधेश को सडकों पर ही आने की बात कही थी । उन्होंने स्वतन्त्र मधेश को लेकर सडक पर कब और कितने लोगों के साथ आन्दोलन होने का सवाल किया था । मैंने उन्हें आने बाले अगहन से लेकर माघ का महीना उचित होने की बात कही । उनका कहना रहा कि वह आन्दोलन हिंसक होकर मधेश के प्रतिकुलता में दम तोडेगी । उनके अनुसार स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन का वह आन्दोलन ही बेकार और खतरनाक था । बेचारे हमारे भी कफी के पैसे तिरकर दुवई के लिए रवाना हुए ।
बसन्त जी के जुबानी अडचन जो भी रहे, उसके विपरीत हमने दाबा किया था कि स्वतन्त्र मधेश का आन्दोलन हर हाल में किया जायेगा, और वह आन्दोलन मधेश को अन्तिम पूर्ण सफलता दिलायेगा । उन्होंने हमारे आन्दोलन को रिस्क भरा आन्दोलन कहकर विदाई ली ।
हमारे विश्वास को विश्वास तब मिला, जब २०७७ जेठ ७ गते के दिन तत्कालीन नेकपा के एक पोलिट ब्यूरो सदस्य, तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली जी के करीबी माने जाने बाले और मेरे एक मित्र ने हमारे निवास पर हमसे मिलने के क्रम में धन्यवाद करते हुए बताया कि हमने सरकार से सहमती करके देश विखण्डन और पहाड़ियों को मधेश छोडने से बचाया । हमने उनसे थप स्पष्ट करने के लिए जब अनुरोध किया तो उन्होंने बताया कि अगर स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन सरकार से सहमती न की होती तो मधेश के साथ दो बडे ऐतिहासिक घटनायें हुई होतीं । पहला यह कि आजके समयतक मधेश एक स्वतन्त्र देश हुआ होता । वह अगर न होता तो मधेश में ५-१० प्रतिशत वही सीधे सादे पहाडी चेहरे के लोग रह जाते, जिनके पास पहाड़ी सुरक्षित स्थानों या बस्तियों में बास करने की आर्थिक हैसियत नहीं है । कारण में उन्होंने बताया कि उनके टोलियों के मधेश अध्ययन भ्रमण में यह स्पष्ट हुआ था कि मधेश की तकरीबन ८०% जनता की मांग स्वतन्त्र मधेश और सीके नेतृत्व रहा था । इस बात को प्रधानमंत्री ओली जी समेत ने सुनकर हक्का वक्का होकर अपने सहयोगी नेताओं से कहा था, ” कमरेडहरु, म पनि खड्ग ओली हो । म हर संभव प्रयास गर्छु मधेशलाई नेपाल बनाई राख्न । ढुक्क हुनोस् । तर एउटा कुरा के मान्दिनु पर्छ भने कथम कदाचित सीके र मधेशले मान्दै मानेनन् भने के गर्ने ? सीकेले यस्तो अहिंसात्मक आन्दोलन थालेको छ कि राज्य र सरकारले हिंसाको कल्पना समेत गर्न अप्ठ्यारो छ । केही त्यस्तो भयो कि दुनियांले हामीलाई बांकी न राख्ला । त्यस्तो अबस्थामा के गर्ने ? मधेशलाई छोडिदिनेभन्दा उत्तम उपाय के नै हुन्छ र ? सधैंको मधेश, मधेशी र मधेश आन्दोलनको कचकचबाट मुक्ति पाउनु पनि ठीकै होला । र दुनियांमा नेपाल मात्रै टुक्रिने हो र, कमरेडहरु ? संसारमा धेरॆ देश टुटेर न यत्रा देश बनेका छन् !”
सही में कहा जाय तो स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन का वह शान्तिपूर्ण एवं अहिंसात्मक आन्दोलन उत्कर्ष पर था । नेतृत्व ने
थोडा सा भी संयमता अपनाई होती तो मधेश नेकपा के उस मित्र के अनुसार के दो अवस्थाओं से लेकर तीसरे स्थान का मालिक होता ।
आज मधेश में उसी नेतृत्व में जो हिंसात्मक आन्दोलन जारी है, इससे आन्दोलनरत संगठन को कितना लाभ होगा – यह कहना मुश्किल है । मगर वर्तमान सरकार के मुखिया पार्टी को सम्पूर्ण लाभ मिलना तय है । क्योंकि गहन उधेरबुन करने पर इस आन्दोन में सरकार के मुखिया का ही षड्यन्त्रात्मक सहयोग है । आन्दोलन पश्चात आन्दोलन नेतृत्व के पूराने शक्ति से भी गठजोड़ होना तय है ।
कुछ वरिष्ट राजनीतिक विश्लेषकों की विश्लेषण अगर सही सावित हो तो उनके अनुसार मधेश में उठाये गये किसान नाम का आन्दोलन से सरकारी नेतृत्व मधेश में मौजूदा मधेश आधारित दलों को कमजोर बनाकर एक नयी बडी पार्टी निर्माण कर उसके सहयोग से मधेशी पार्टीसहित का स्थायी सरकार बनाने की भावी रणनीतिक तैयारी है । सरकारी नेतृत्व दलों का मानना भी यही है कि कोई सरकार बनाने के लिए मधेश के नाम पर रहे विभिन्न पार्टियों से असभ्य और बेतुके बार्गेनिङ्गों से बचा जा सकता है ।
गंभीर करने बाली बात एक यह भी है कि कल्हतक जनताराज कायम, मधेश स्वराज लागू, भ्रष्टाचार का विरोध और दश लाख की रोजगारी को अपना राजनीतिक व चुनावी मुद्दा बनाने बाले नेतृत्व अचानक पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली और ८ बूंदे राजनीतिक सहमति कार्यान्वयन न होने तक मधेश में चुनाव ही न होने देने के मुद्दों को हाइज्याक करना । जिन्होंने अपने कई अन्तरवार्ताओं में यह कहा है कि पूर्ण समानुपातिक निर्वाचन प्रणाली से मधेश के सारे समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता, उन्होंने इसके महत्व को कहाँ से, किससे, कब और कैसे समझ लिया, यह भी खोज की विषय बन गयी है ।
मधेश में उर्जा आज भी उसी स्तर में मौजूद है । लोग चाहे कुछ भी कह लें कि मधेश अब नहीं लडेगा, कितना लडेगा, किसके लिए लडेगा, आदि इत्यादि । मधेश हरदम लडेगा, बार बार लडेगा, समास्या समाधान न होनेतक लडेगा, अपने लिए लडेगा । कल्हतक लोग यही कहते थे कि अब मधेश में आन्दोलन नहीं हो सकता । यह दलिल देने बाले लोगों के लिए पाठ होना चाहिए कि बिमार आदमी तबतक नये नये अस्पताल और डाक्टर का तलास करते हैं, जबतक उसके पास जान है, जिने की चाह है और लडने की क्षमता है । लडता वही है, जो विमार है, अस्वस्थ है, कमजोर है, गरीब है, पीड़ित है, दमित और दलित है और ठगे सताये गये शोषित समाज है । शासक, पूंजिपति, तस्कर, तानाशाह और दलाल प्रवृत्ति के लोग वैसे शोषित लोगों के शक्तियों को कमजोर करने ले लिए हमेशा यही कहते हैं कि अब वे न लडें ।
वि.स. २००७ से २०३३ तक आधे दर्जन से ज्यादा बार किसानों ने देश के विभिन्न जिलों व क्षेत्रों में विद्रोह किया है । सैकडों अन्नदाताओं की सरकारों ने जानें ली हैं । कई सम्झौते किये गये । मगर किसान की समस्याएँ घटने के विपरीत नाटकीय रुप में बढता रहा है । किसान के उन्हीं समस्याओं को लेकर मधेश में एक नये पार्टी ने किसानों के समस्याओं को खत्म करने का सूत्ररहित आन्दोलन शुरू किया है जिसका किसान समस्या समाधान के नाम पर चुनावी रोटी सेकने की जल्दबाजी है, वहीं आजसे सप्तरी के हनुमान नगर से अपने भ्रष्टाचार और अहंकार की रोटी बचाने के लिए जसपा नामक अस्थिर मुद्दा और चरित्र के पार्टी कथित किसान आन्दोलन के विरोध में सडकों पर प्रतिकारक के रुप में दहाड लगानन शुरु किया है ।
अब मधेश इन दो आतातयी, बेइमान और मुद्दा बेचुवे नेतृ्त्वों से परेशान होना तय है । एक ने डेढ दशक से मधेश को लूटा है तो दूसरे
ने चन्द वर्षों में ही संगठन का नाम बदला, मुद्दे बेचे और उत्कर्ष पर पहुँचे मधेश आन्दोलन की सौदाबाजी की । जैसा उस कथित वैज्ञानिक विद्वान् का चरित्र है, कथित किसान आन्दोलन को भी न अपने लाभ के के उत्कर्ष पर पहुँचाकर किसी के हाथों बेच डाले ।
मधेश को अब इस परिस्थिति में इन दोनों विरोध और प्रतिविरोध के टकरावों से बचकर सुरक्षित अवतरण पाना बेहद जरुरी है ।


