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कांग्रेस में रूपान्तरण और हस्तान्तरण का संकेत : लिलानाथ गौतम 

 

 

अन्ततः नेपाली कांग्रेस की १४वीं पार्टी महाधिवेशन सम्पन्न हो गया है । अधिक लोगों के पूर्वानुमान अनुसार पार्टी सभापति में शेरबहादुर देउवा ही निर्वाचित हो गए हैं । लेकिन अनुमान के विपरित कुछ अलग मतपरिणाम भी आया है । वह है– पार्टी सभापति के अलावा अन्य महत्वपूर्ण पदों में निर्वाचित पदाधिकारी । हां, १४वें महाधिवेशन में उपसभापति तथा महामन्त्री जैसे महत्वपूर्ण पदों में अनुमान के विपरित कुछ अलग पात्र विजयी हुए हैं । वे हैं– गगन थापा, विश्वप्रकाश शर्मा और धनराज गुरुङ आदि । कांग्रेस के भीतर ही कई लोगों के लिए यह आश्चर्य की बात है, किसी के लिए अपेक्षित परिणाम भी । जो भी हो, थापा और शर्मा महामन्त्री में और गुरुङ का उप–सभापति पद में विजयी होना कांग्रेस में रूपान्तरण और नई पीढ़ी को हस्तान्तरण का संकेत है ।

कांग्रेस की आन्तरिक राजनीति में बारबार जो अभ्यास होता आ रहा है, उसको देखकर बहुत लोग कहते थे कि इस बार भी महत्वपूर्ण पदाधिकारी के साथ देउवा पैनल ही पार्टी में हावी हो जाएंगे । केन्द्रीकृत नेतृत्व, नेतृत्व में रहनेवालों की मनमानी राजनीतिक अभ्यास, उसके अनुसार प्रशिक्षित महाधिवेशन प्रतिनिधियों की चयन आदि के कारण ऐसा अनुमान हो रहा था । लेकिन परिणाम अनुमान से कुछ विपरित दिखाई दिया । अब कांग्रेस में एक अपेक्षा है– अब विगत की तरह नेतृत्व की ओर से मनमानी नहीं होगी, सम्पूर्ण शक्ति नेतृत्व में सीमित नहीं रहेगी और उसी शक्ति के इर्दगिर्द घूम कर व्यक्तिगत लाभ हासिल करनेवालों के कब्जे में पार्टी नहीं रहेगी । अनुमान है कि अब कांग्रेस में विधि और नीति का अभ्यास शुरु होगा । हां, पार्टी को परम्परावादी चिन्तन और प्रशिक्षण से मुक्त बना कर कांग्रेस में रूपान्तरण और हस्तान्तरण की मांग भी हो रही है । इसके लिए थापा, शर्मा और गुरुङ को उपर्युक्त पात्र के रूप में देखा जा रहा है ।

आश्चर्य की बात तो यह भी है कि थापा और शर्मा कांग्रेस पदाधिकारी में निर्वाचित होने के बाद इसकी चर्चा सिर्फ कांग्रेस के भीतर ही नहीं, उससे कहीं अधिक चर्चा कांग्रेस से बाहर हो गई । राजनीतिक चेतना की दृष्टिकोण से साक्षर लेकिन संगठित राजनीति से बाहर रहे युवा समूह लम्बे समय से नेपाल की राजनीति में नई पीढी को हस्तान्तरण की मांग कर रहे थे । यह समूह भी इसको सकारात्मक रूप में ले रहा है । स्वयम् कांग्रेस के भीतर भी थापा, शर्मा और गुरुङ ऐसे पात्र हैं, जो पार्टी नेतृत्व हस्तान्तरण के लिए विगत ४ साल से आवाज बुलंद कर रहे थे । पार्टी सर्कल से बाहर रहे युवा पीढ़ी भी इन लोगों की विजय में खुशी व्यक्त कर रहे हैं, जो एक प्रकार का जनमत भी है । महामन्त्री जैसे महत्वपूर्ण पद में युवाओं के प्रतिनिधि पात्र माने जाने वाले चेहरे तो आ आए हैं, लेकिन निर्वाचित अन्य पदाधिकारी तथा केन्द्रीय सदस्यों में सभापति देउवा पक्षधर ही अधिक निर्वाचित हो गए हैं, जिनकी संख्या दो–तिहाई से भी अधिक हैं । जिसके चलते कांग्रेस के सामने एक प्रश्न उठ सकता है– आगामी दिनों में अब कांग्रेस बहुमत के आधार पर चलेगी या जनमत के आधार पर ? हां, अब कांग्रेस में शेरबहादुुर देउवा के पक्ष में बहुमत है, लेकिन जनमत थापा और शर्मा के पक्ष में है । सामान्य अनुमान कर सकते हैं कि अब इन दो शक्ति के बीच कांग्रेस के भीतर संघर्ष चलनेवाला है, इस संघर्ष में जिनका पलड़ा भारी होगा, वही कांग्रेस का भविष्य तय करेगा ।

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वैसे तो पार्टी महाधिवेशन के बाद आयोजित प्रथम सर्वदलीय बैठक में प्रधानमन्त्री भी रहे पार्टी सभापति देउवा पार्टी महामन्त्री गगन कुमार थापा को अपने साथ लेकर सहभागी हुए थे । इसको देखकर कांग्रेस के भीतर कुछ लोग कानाफूसी कर रहे थे– देउवा अब युवाओं को साथ में लेकर चलने का संकेत दे रहे हैं । लेकिन विगत देखें तो देउवा काम यह संकेत उनके चरित्र से बिल्कुल अलग है । प्रश्न उठ रहा है– क्या अब देउवा सच में ही पार्टी में रूपान्तरण और नई पीढी को हस्तान्तरण के लिए तैयार हैं ? इसमें तत्काल अनुमान लगाना गलत साबित हो सकता है । लेकिन एक अनुमान लगा सकते हैं– अब देउवा विगत की तरह पार्टी के भीतर मनमानी नहीं कर पाएंगे । क्योंकि पार्टी के भीतर बहुमत पदाधिकारी तो उनके पक्षधर हैं, लेकिन पदाधिकारी में निर्वाचित थापा और शर्मा उनको ऐसा करने नहीं देंगे ।

हां, उप–सभापति में निर्वाचित गुरुङ तथा महामन्त्री में निर्वाचित थापा और शर्मा के कारण बहुत लोग कांग्रेस में परिवर्तन की आशा कर रहे हैं । क्योंकि वे लोग कांग्रेस के भीतर युवा के प्रतिनिधि पात्र हैं । महामन्त्री पद में निर्वाचित होने के बाद पार्टी के भीतर उन लोगों की ओर से निर्वाह होनेवाली भूमिका और क्रियाकलाप से ही कांग्रेस का भविष्य निर्धारण होनेवाला है, इसमें कोई भी शंका नहीं है । पार्टी सभापति में निर्वाचित होनेवाले व्यक्ति की कार्यशैली, परम्परागत सोच और अभ्यास में अब कुछ परिवर्तन आने की सम्भावना है, जो पार्टी रूपान्तरण के लिए एक प्रयास बन सकता है ।

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पिछले चुनावी परिणाम के अनुसार देश में लगभग दो तिहाई जनमत प्राप्त कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनी थी । चार साल पहले चर्चा–परिचर्चा हुई थी कि यह इतिहास में ही शक्तिशाली सरकार है । राजनीतिक दृष्टिकोण से तटस्थ रहे बहुत सारे लोग शक्तिशाली सरकार से कुछ महत्वपूर्ण सकारात्मक परिणाम की अपेक्षा कर रहे थे । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया । उलटा ही केपीशर्मा ओली नेतृत्व के सरकार प्रति लोग निराश होते चले गए । ऐसे लोगों के लिए भी थापा और शर्मा आशावादी पात्र हैं, जो आगामी चुनाव कांग्रेस के पक्ष में बनाने के लिए सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं । लेकिन महाधिवेशन के समय कांग्रेस के भीतर जो गुट–उपगुट दिखाई दिया है, उसको अन्त नहीं किया जाता है तो ऐसे अनुमान सिर्फ अनुमान में ही सीमित हो सकता है । हां, विगत दिनों की तरह महाधिवेशन में प्रतिस्पर्धा करनेवालों का समूह पार्टी के भीतर शक्तिशाली हो जाता है और कांग्रेस आपस में ही झगड़ने में व्यस्त रहती है तो कांग्रेस रूपान्तरण की प्रतीक्षा करनेवाले कांग्रेसीजन से लेकर कम्युनिष्ट विचारधारा के विपरित रहे जनमत को निराशा ही हाथ लगेगी ।

सभापति पद के लिए ४० प्रतिशत मत प्राप्त करनेवाले प्रतिस्पर्धी शेखर कोइराला ने पराजय होने के बाद प्रथम प्रतिक्रिया स्वरूप कहा है– ‘मैं विगत के अभ्यास अनुसार बँटवारे के लिए पार्टी सभापति को कोई भी दवाब नहीं दूँगा । विधि और प्रक्रिया अनुसार पार्टी संचालन के लिए मेरा सहयोग हरदम रहेगा । ’ अपने प्रतिस्पर्धी नेता की ओर से इसतरह की स्पष्ट प्रतिक्रिया आना देउवा के लिए सुखद पक्ष है । इसीतरह महाधिवेशन में विरोधी समूह के रूप में खड़े होनेवाले कुछ शीर्ष नेता द्वितीय चरण का चुनाव होने से पहले ही उनके समूह में समाहित भी हो गए । इसतरह देउवा समूह में जानेवाले व्यक्ति ऐसे पात्र हैं, जो विगत ४ साल से नेतृत्व परिवर्तन के लिए ऊँचा स्वर कर रहे थे । हां, ४ साल से देउवा को ‘असफल पार्टी सभापति’ कहनेवाले, ‘पार्टी को पुनः नेतृत्व प्रदान करने के लिए देउवा लायक पात्र नहीं है’ कहनेवाले प्रकाशमान सिंह, विमलेन्द्र निधि तथा विश्वप्रकाश शर्मा जैसे व्यक्तित्व अन्ततः देउवा समूह में दिखाई दिए । खुद को तटस्थ बतानेवाले वरिष्ठ नेता रामचन्द्र पौडेल और तत्कालीन पार्टी महामन्त्री शशांक कोइराला ने भी अघोषित रूप में देउवा को ही समर्थन किया है । इन लोगों के समर्थन से अति उत्साहित होकर अगर देउवा विगत की तरह ही पार्टी को विधि–विधान से बाहर रखने की अभ्यास करते हैं, अपनी इच्छा को ही पार्टी की विधि–विधान बनाने के लिए लगे रहते हैं तो अपेक्षा अनुसार कांग्रेस में रूपान्तरण सम्भव नहीं है ।

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अगर ऐसा ही हो जाता है तो नेकपा एमाले के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमन्त्री केपीशर्मा ओली का कथन सच साबित हो सकता है । पिछली बार देउवा प्रधानमन्त्री हो जाने के बाद आयोजित प्रथम संसद् अधिवेशन में ओली ने कहा था कि आगामी चुनाव में फिर भी एमाले ही उच्च जनमत के साथ सरकार को नेतृत्व प्रदान करेगी । व्यंग्यात्मक रूप में उन्होंने आगे कहा था– ‘सरकार को नेतृत्व प्रदान करने के लिए एमाले पार्टी को सर्वोच्च अदालत के परमादेश की आवश्यकता नहीं है । ’ १४वें महाधिवेशन के बाद अगर आम जनता में कांग्रेस रूपान्तरण का आभास नहीं हो जाता है तो केपी ओली का यह कथन सच भी हो सकता है । क्योंकि विगत की तरह कांग्रेस से नाराज होकर कम्युनिष्ट को और कम्युनिष्ट से नाराज होकर कांग्रेस को वोट देनेवालो की संख्या अब कम होती जा रही है । मतदाताओं में दिखाई दे रहा यह रुपान्तरण और हस्तान्तरण को कांग्रेस सम्बोधन नहीं कर पाती है तो कांग्रेस रूपान्तरण और हस्तान्तरण का नारा भी सिर्फ भाषण में सीमित हो सकता है ।

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