कैलाश महतो, पराशी । यूनेस्को के रिपोर्ट अनुसार – सत्ता (authority) वह शक्ति (Power) है, जो स्वीकृत (Accepted), प्रतिष्ठित (Distinguished), ज्ञात (Known) और औचित्यपूर्ण (Justified) होता है । चन्द शब्दों में कहें तो सत्ता ही शक्ति और शक्ति ही सत्ता है ।
सत्ता का उदय तब होता है जब शासक और शासित दो वर्गों और समूहों के बीच में आपसी सम्बन्ध स्थापित होता है । सत्ता वैसे सरकार की शक्ति और उसके कृयाकलापों से सम्बन्धित रबैयों को दर्शाता है ।
सत्ता के अनेक रुप होते हैं । जैसे; धार्मिक सत्ता, अध्यात्मिक सत्ता, राजनीतिक सत्ता, राजकीय सत्ता, सामाजिक सत्ता, आर्थिक सत्ता, वैचारिक सत्ता, पारिवारिक सत्ता, आदि, इत्यादि । अरिस्टोटल के अनुसार संसार का सबसे प्रथम और पुराना सत्ता पारिवारिक सत्ता है । विवाह संसार का सबसे पूराना सत्ता संस्था रहा है ।
मानव विकास के क्रम में सत्ता हमेशा उलट पुलट होता रहा है । जमाना कभी ऐसा भी रहा कि राजनयिक और राजनीतिक सत्तों से भी शक्तिशाली धार्मिक तथा अध्यात्मिक सत्ता रहा था । बडे बडे सम्राट और राजा महाराजा भी कुछ धार्मिक पंडितों और पुरोहितों के निर्देश बिना राजनीतिक कोई निर्णय नहीं ले पाते थे । यहाँ तक कि वैज्ञानिक आधारों तक को उनके धार्मिक मतान्धता अन्तिम रूप और फैसला दिया करता था । मगर समय करवट लेता गया । धार्मिक उन्माद, अन्ध विश्वास और पाखण्डों के टक्कटर में कोपर्निकस, ग्यालिलिओ, चार्वाक जैसे अध्ययन और खोज ने विकास की । पंडित, पुरोहित और पादरियों के सामने सशक्त वैज्ञानिक आधारें खडी हुईं और देखते ही देखते धर्म, ज्ञान, विश्वास और परम्पराओं पर विज्ञान ने अपना झण्डा फहराया । विचार बदले, मानसिकता बदली और राजनीति में क्रान्तिकारी बदलाव आया । धार्मिक मठाधिशों में सीमित सत्ता राजा से होते हुए जनता और जनता के मार्फत वह सत्ता संसद और सरकार में तब्दील हुई ।
जो और जैसा भी हो, रंग और रुप भले ही बदल गये हों, मगर सत्ता तो शक्तिशाली ही होती है । सत्ता में ही शक्ति होने के कारण मानव पाषाण और गृहस्थी युग से इसके लिए कई संघर्ष और युद्ध किये हैं । वे सत्ता संघर्ष और युद्धें आन्तरिक और बाह्य तथा घरायसी और पड़ोसीय दोनों रहे हैं । पति पत्नी बीच की लडाई, बाप और बेटे बीच में टकराव, भाइ भाइ के बीच मारकाट जैसे घटनायें भी इतिहास में कैद है । उसका पुनरावृत्ति सत्ता के रंगमञ्चों पर आज भी कायम है ।
चूँकि सत्ता संघर्ष के दौरान ही २०६४ चैत्र ७ गते के दिन रौतहट के गौर में एक अकल्पनीय और अशोभनीय मानव नरसंहार की घटना घटी । वैसे वह पहला नरसंहार नहीं था । वास्तव में वह मधेशी जनता के उपर सदियों से लादे गये दमन और अत्याचार का एक हिंसक भाडास था । दूसरी तरफ २०६३ माघ ५ गते के दिन रमेश महतो के प्रति राज्य और उसके निगरानी में हुए विभत्स हत्या का बदला था । तीसरे ढंग से हम देखे तो वह मधेशी जनता के आवाज पर प्रायोजित बन्देज लगाने के विरुद्ध का सशक्त प्रतिकार था । उसे कोई कानुनी जामा पहनाने की कोशिश हो तो उससे कैयन भयंकर परिस्थितियाँ निर्माण होना तय है, जो कुछ लोग इस उक्साहट में है कि गौर घटना के दोषियों पर कार्रवाही हो । क्योंकि मूल दोषी तत्कालीन माओवादी रहा और सहायक दोषी राज्य है ।
गौर का वह घटना निस्संदेह मानव इतिहास को शर्मसार करने बाला है । मगर उस घटना से राज्य को एक सीख मिली, आक्रान्ताओं में संसय पैदा हुआ और संभावित वैसे अन्य घटनाओं पर अंकुश लगा । मगर उसके १४ साल बाद फिर उस घटना को मलजल करने की जो साजिश हो रही है, यह बेहद चिन्तन करने की बात है ।
गौर घटना को पुनरावृत्त करने की जो ख्बावी पोलाऊ है, यह केवल और केवल सत्ता और उस नरसंहार की आँख मिचोली है । अगर किसी को यह लगता है कि २०६४ के अवस्था में राज्य है तो राज्य को यह पता है कि उसका अंजाम क्या होता है । इसिलिए राज्य तो ऐसे लफडों से तोबा ही करेगा । मगर यह जरुर है कि सत्ता की उहापोह में मधेश के दो लाल बुझक्कड को एक दूसरे का जानी दुश्मन बनाने के काम में राज्य और सत्ता दोनों आग में घी डालेगा । इसकी नींव २०७५ फाल्गुन २४ गते को ही पड चुका है ।
आश्चर्य की बात यह है कि जिस गौर घटना के दोषियों को लेकर उनपर कानुनी कार्रवाई करने की मांग सडक पर रहे एक पार्टी करती आ रही है, उसीके राष्ट्रीय वरिष्ट उपाध्यक्ष उसी जिला के गरुडा बाजार के एक सभा में अधिकार प्राप्ति खातिर गौर घटनातक को अन्जाम देने को अपने नेता कार्यकर्ताओं को निर्देश देता है, और संयोग से उसी घटना को पुनरावृत्ति देने के लिए नेपाल सरकार की एक मन्त्री तक ने हुंकार भर डाली है । यह तो भवितव्य की बात है, मगर देखना यह होगा कि उस घटना के साथ आखिर कौन सा राज जुडा है कि दोनों ३६ के आंकडे बाले दलों ने उस नरसंहार को अपना भाग्य रेखा मान बैठे हैं ।
वैसे लक्की ड्र से उपेन्द्र यादव की सहयोगी नेतृ बनी रेणु यादव सत्ता के लिए हर राजनीतिक लीक को पार करने में माहिर रही हैं । मगर यह सावित है कि सत्ता से आदमी सभ्यता नहीं सीख पाता । भैंसी दुध देने वाली एक उपकारी जानवर है । उसका दुध केवल रेणु जी नहीं पीतीं, रेणु यादव इतर के लोग भी पीते हैं । मगर इसका मतलब यह नहीं कि वह दुध किसी को गौर का नरसंहार करवाता है । भैंसी के दुध को अगर किसी दुर्दशा से जोडा जाय तो फिर यह भैंसी और उसके दुध का अपमान है ।
मामला और संभावना कुछ भी हो, मगर एक बात सत्य है कि सत्ता की आग में दोनों बुरी तरह कसमकश में हैं । एक को डर सता रहा है कि कहीं जनमत बाले सत्ता न हथिया लें तो दूसरी तरफ अपनी गिरती हुई साख और प्रतिष्ठा को भी कम से कम बरकरार रखने हेतु सत्ता को एक मात्र अन्तिम अस्त्र मानने को बाध्य जनमत अपने अनुयायियों को राजनीतिक तौर पर एडजस्ट करना चाहता है । लडाई सत्ता कहीं चली न जाये और कार्यकर्ता टिकाने का एक मात्र उपाय सत्ता होने के बीच की है । बांकी सब तपसिल की बाते हैं ।
गौर करने बाली बात यह भी है कि सत्ता में रहे लोगों से सत्ता अपने पास लाने या कुछ अंश पानेतक के लिए सडक पर दिखने बाले जनमत के पास न तो कोई ठोस मुद्दा है, न कोई ठोस तरकीब । आलम यह है कि वह इतना बेतहाश है कि उसे यहाँ तक पता नहीं कि आन्दोलन का जड क्या है । न आन्दोलन की निश्चित गति है, न एक ठोस मुद्दा । वह हर दिन मुद्दा बदल लेता है । हर दिन कोर्स चेन्ज कर लेता है । यह एक प्रकार की बौखलाहट है । यह पूर्ण असफलता है ।
विश्लेषकों का कहना अगर जायज है तो सत्ता के गुलाम अंशियार और उसके आगोस में समा जाने को बेताव दोनों शक्ति एक मुद्दे पर मिले, साझा कोर्स तय करें और पूरे मधेश को साथ लेकर आगे चलें । इसी में मधेश और उनका भी कल्याण है ।