नेपाल में “एमसिसी के भूत” का विध्वंस : बिम्मी कालिन्दी शर्मा
बिम्मी कालिन्दी शर्मा, बीरगंज, (व्यंग्य)| अभी नेपाल नाम का यह देश मसान घाट हो गया है क्यों कि यहां अभी चारों तरफ “एमसिसी” नाम का भूत विध्वंस मचा रहा है । जो नेपाली कोरोना से भी नहीं डरा वह एमसिसी से ऐसे डर रहा है यह एमसिसी का भूत सचमूच नेपाल को खा ही जाएगा । पर नेपाल बचा ही कितना है जो एमसिसी के बहाने से अमेरिका खा जाएगा । ब्रेड के टुकड़े जैसा तो देश है जिसे नेता बेईमानी से कुतर-कुतर कर और छोटा कर रहे हैं । एमसिसी के मामले को ले कर नेता ऐसे बंट गए है जैसे खोवा खाने के बिल्लिंया आपस में झगडा करती है और बीच मे ईस का फायदा बंदर उठा ले जाता है । अभी यह चलाख बंदर का काम चीन कर रहा है जो एमसिसी परियोजना को नेपाल से सदा के लिए विदा होने में ही अपनी भलाई देख रहा है । चीन अपनी ही भलाई कर के मलाई खाना चाहता है ।
कभी भारत का हस्तक्षेप नेपाल में ज्यादा बढ्ने पर यंहा के कथित बुद्धिजिवी चिंतिंत रहते थे पर अब जब चीन का हस्तक्षेप ज्यादा बढ गया उन्हें कोई चिंता नहीं है । चीन तो चिनी जैसा मीठा है वह नेपाल का बुरा थोडे ही चाहेगा या करेगा ? भले ही ईस चिनी के कारण नेपालियों को डायबिटीज हो जाए । कोई बात नहीं दवा भी तो चीन ही देगा और तिब्बत की तरह नेपाल को बफर स्टेट बना देगा । चीन तो परम हितैषी पडोसी है लोन दे-दे कर उसी लोन की नदी में नेपाल को डुबा कर कभी उबरने नहीं देगा । ईसी लिए चीन पिछे से अपने ही देशवासियों को पत्थर मारने के लिए उकसा रहा है । पत्थर चीन का है पर फेंकने वाले हाथ नेपालियों का ही है । चीन की कुटनीति को समझना बहुत टेढी खीर है ।
तिब्बत खीर का वह कटोरा है जिसे अमेरिका नाम की बिल्ली झपटा मार कर वह कटोरी को.ही गिरा देना चाहता है । ईस के लिए वह चीन के ही पडोसी भारत और नेपाल को प्रयोग कर रहा है । यह गुढ की बात चीन भलिभांति जानता है कि अमेरिका की नजर तिब्बत पर है । पूरी दुनिया को अपने उत्पादनों से कब्जे में ले कर उपद्रव मचाने वाला चीन तिब्बत के लिए बहुत गंभीर है । तिब्बत कंही स्वतंत्र हो गया चीन का रुतबा बिश्व मानचित्र में घट जाएगा ईसी लिए वह हर हाल में सतर्क है और तिब्बत को किसी भी हालात में रेत की तरह तिब्बत को अपने हाथ से फिसलने देना नहीं चाहता । चीन में प्रजातंत्र का मुहं बंद है पर बांकी सब खूला है । विकास तो चीन में ईतना हुआ है कि अमेरिका भी मात खा कर हतप्रभ है । ईसी लिए वह चीन को पछाडना चाहता है । अब ईतनी दूर से तो चीन को पटखनी नहीं दे सकता ईसी लिए पडोस में ही डेरा-डंडा डाल कर चीन को कमजोर करना चाहता है । चीन ने पूरी दुनिया को कोभिड-कोराना उपहार दे कर मानसिक और शारीरिक रुप से कमजोर बनाया ही था । अब अमेरिका की बारी है वह नेपाल को एमसिसी परियोजना उपहार में दे कर चीन को कमजोर बनाना चाहता है ।
यदि एमसिसी परियोजना नेपाल में शुरु हो गया तो अमेरिकी सेना नेपाल में आ जाएगें और नेपाल और चीन दोनो को परेशान करेगा । यही डर दिखा कर नेपाल से एमसिसी को अमेरिका वापस करने के लिए सारी कवायद हो रही है । अमेरिकी सेना नेपाल के बहाने कंही तिब्बत की ओर आंख न उठा ले ईसी डर से चीन शकुनी कि तरह पाशे फेंक रहा है और नेपाल दुर्योधन बन गया है । पूरा देश रणभूमि बन गया हे विदुर तो कोई है नहीं सब कंही न कंही से प्रायोजित है भिष्म कि तरह नमक खा कर मौन है । ईस महाभारत को अंत करने के लिए कृष्ण चाहिए पर यंहा तो अर्जुन और गाडिंव दोनों नदारद है ।
सब से छिछले और बीन पेंदी के लोटा जैसे नजर आ रहे हैं नेपाल के नागरिक । जिनको मालुम ही नहीं है क्या गलत । वह तो धृतराष्ट्र कि तरह अंधे हो कर ऐसे बात कर रहे हैं कि जैसे नेपाल एक आत्मनिर्भर और सक्षम देश है जिसने कभी कोई वैदेशिक सहयोग नहीं ली । पर सच्चाई यह है कि किसी वैदेशिक सहयोग के बिना नेपाल में कोई परियोजना पूरी नहीं हूई है । चाहे वीरगञ्ज चिनी कारखाना हो या जनकपुर सिगरेट कारखाना । ईन सब को विदेशियों ने ही बनाया । तब एमसिसी का विरोध क्यों नहीं हुआ ? अमेरिका की डिभी लाटरी यदि भाग्य से खूल गई तो यही नेपाली खुशी से पागल हो जाते है । और यही नेपाली एमसिसी परियोजना के नेपाल में लागू करने को ले कर पागल बन कर बौरा रहे हैं । कैसा दोहरा चरित्र है न ईनका ? डिभी भर कर खुद अमेरिका जा कर अमेरिकी नागरिक बन जाएंगे हमेशा के लिए । पर एमसिसी को कुछ साल के लिए नेपाल में टिकने नहीं देगें । विधुतीय ट्रान्शमिशन लाईन और सडक बनाने के लिए अमेरिकी परियोजना एमसिसी को नेपाल में मंजूरी के लिए लाया गया है । पर यंहा के उदंड नागरिक कथित राष्ट्रवाद के नाम पर देश के विकास को ही ठप्प कर के अपनी ही भौतिक संपत्ति का तोडफोड कर रहे हैं । है न यह कालिदास जैसे जिस टहनी पर बैठा हैं उसी को काट रहे हैं ।
नहीं तो विरोध का क्या तुक है ? चीन का ही दुसरा पडोसी देश मंगोलिया में यही एमसिसी परियोजना लागु कर के वंहा पिने के पानी कि किल्लत को हटाने के लिए निर्माण कार्य जोरों पर हैं । और नेपाल में उसी एमसिसी कुछ नाम पर विध्वंस मचा हुआ हे । नेपाल के एमसिसी परियोजना सिर्फ ५५ अरब का है जबकि मंगोलिया की ईसी एमसिसी परियोजना का खर्च ९३ अरब है । फिर भी उंहा कोई विरोध नही काम चालू है । न वह अमेरिकी सेना आ रही है न उस से चीन को परेशानी है । वास्तव मे नेपालियों को घी नहीं पचता । हड्डी कुतरने की जो आदत है । जंहा से जैसे हड्डी मिला उसी के आगे पिछे दूम हिलाएंगें और वह जिसको भौंकने और काट्ने को कहेगें उसी को भौकेगें और काटेगें भी । बिजली किल्लत को कम करने और लोडसेडिंग हटाने “अरुण थर्ड” को बिश्व बैंक के माध्यम से निर्माण होने वाली परियोजना को ईन्ही कथित राष्ट्रवादी और देशभक्त नागरिकों के कारण हो गया था । कंही एमसिसी भी वही सावित न हो जाए हाय दैया ! 🤔😍😣


