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‘कृत्तिवास शिव का ही नाम है’‘एकैश्वर्ये स्थितोऽपि प्रणतबहुफले यः स्वयं कृत्तिवासाः।

 

बहादुर मिश्र

 

भगवान् शिव के अनेक पवित्र नामों में एक नाम ‘कृत्तिवास’ है। इसका प्रयोग कालिदास के नाटक ‘मालविकाग्निमित्रम्’ तथा महाकाव्य ‘कुमारसंभवम्’ (1/54) में तो हुआ ही है, ‘शिवपुराण’ के रुद्रसंहिता चतुर्थ (कुमार) खण्ड एवं काशीखण्ड के 64 वें अध्याय में भी विस्तार से देखा जा सकता है। बंगला-रामायण के प्रणेता का नाम भी ‘कृत्तिवास’ ही है।

‘मालविकाग्निमित्रम्’ का मंगलाचरण ‘कृत्तिवास’-स्मरण से ही होता है-

‘‘एकैश्वर्ये स्थितोऽपि प्रणतबहुफले यः स्वयं कृत्तिवासाः।

कान्तासम्मिश्रदेहोऽप्य विषयमनसां यः पुरस्ताद् यतीनाम्।।

अष्टाभिर्यस्य कृत्स्नं जगदपि तनभिर्विभ्रत्ने नाभिमान:।

सन्मार्गालोकनाय व्यपनयतु स वस्तामसीं वृत्तिमीश:।।’’

अर्थात् भक्तों को बहुत फल देने का ऐश्वर्य अपने पास होते हुए भी जो स्वयं हाथी की खाल ओढ़े रहते हैं, शरीर के साथ पत्नी को चिपकाए रखने के बावजूद विषय-वासना से मुक्त मन वाले योगियों में श्रेष्ठ हैं तथा अपने आठ रूपों से जगत् को धारण करते हुए भी अभिमानशून्य हैं, ऐसे भगवान् कृत्तिवास पाप की ओर ले जाने वाली आपकी बुद्धि को मिटा दें, ताकि आप सन्मार्ग पर चल सकें।

‘कुमार सम्भवम्’ के प्रथम सर्ग का 54 वाँ छन्द देखा जाए, जिसमें महाकवि कालिदास ने कृत्तिवास नामधारी शिव की तपस्या का उल्लेख किया है-

‘‘स कृत्तिवासस्तपसे यतात्मा गंगा प्रवाहोक्षितदेवदारुः।

प्रस्थं हिमाद्रेर्मृगनाभिगन्धि किञ्चित्क्वणत्किन्नर मध्युवासः।।

अर्थात् गजचर्मधारी जितेन्द्रिय भगवान शंकर तपस्या करने हेतु हिमालय के किसी रमणीय शिखर पर रहा करते थे, जहाँ गंगा के जलप्रवाह से सिंचित देवदारु के अनेक पेड़ खड़े थे, चारों ओर कस्तूरी मृगों की सुगन्ध फैली थी तथा किन्नरों के जोड़े सदैव गायन करते रहते थे।

चलिए, अब हमलोग ‘कृत्तिवास’ की भाषिक संरचना तथा इसके व्युत्पत्तिजन्य अर्थ पर विचार करें।

‘कृत्तिवास’ समस्त पद है, जो ‘कृत्ति’ तथा ‘वास’ से मिलकर बना है। इसका मूल रूप ‘कृतिवासस्’ होता है, जैसे- चन्द्रमा का ‘चन्द्रमस्’। कृती छेदने (6/144) –> कृत +क्तिन् = कृत्तिः का प्रमुख शाब्दिक अर्थ चर्म (खाल) होता हैै। इसका दूसरा अर्थ भोजपत्र/भोजवृक्ष होता है। चर्म (खाल) शरीर को चारों ओर से आवेष्ठित रखती है – घेरे रखती है। आच्छादन – ढँकने के अर्थ में प्रयुक्त ‘वस्’ धातु में ‘असुन्’ प्रत्यय के योग से व्युत्पन्न ‘वासस्’ का अर्थ वस्त्र या परिधान होता है। इसतरह, ‘कृत्तिवास’ का अर्थ हुआ- कृत्ति (चर्म) ही है जिसका परिधान, अर्थात् वह (शिव) (कृत्ति: गजासुरस्य चर्म्म वासोऽस्य।)

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अब प्रश्न है, यह चर्म किस पशु, राक्षस या प्राणी का है? उत्तर है महिषासुर के पुत्र ‘गजासुर’ के शरीर का। आप जानते ही हैं कि देवताओं की सम्मिलित शक्ति दुर्गा ने अत्याचारी महिषासुर का वध किया था। उसका पुत्र ‘गजासुर’ तभी से प्रतिशोध की आग में जल रहा था। भगवान आशुतोष को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर उसने इच्छित वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान यह था कि जिस किसी ने काम-वासना को जीत लिया है, वही उसे मार सकता है, अन्य कोई नहीं। परिणामस्वरूप, वह अपने पिता की तरह ही उद्दण्ड और अत्याचारी हो गया। देवताओं की सामूहिक प्रार्थना पर त्रिशूलधारी शिव ने गजासुर का काम तमाम कर दिया। ऐसा वे इसलिए कर सके; क्योंकि उन्होंने कामदेव को अपने त्रिनेत्र से भस्मीभूत कर ‘कामारि’ का अभिधान ग्रहण किया था।

प्राण त्यागने से ठीक पहले ‘गजासुर’ ने शिव से वचन ले लिया कि वे न केवल उसके चर्म (शरीर की खाल) को परिधान बनाकर धारण करेंगे, बल्कि ‘कृतिवासेश्वर’ के रूप में स्थापित होकर उसके नाम को अमर भी कर देंगे। भगवान शिव ‘एवमस्तु’ कहने के बाद वाराणसी में स्थापित हो गये। ये पंक्तियाँ देखी जाएँ –

‘‘इदं पुण्यशरीरं ते क्षेत्रेऽस्मिन् मुक्तिसाधने।

मम लिंगं भवत्वत्र सर्वेषां मुक्तिदायकम्।

कृत्तिवासेश्वरं नाम महापातकनाशनम्।

सर्वेषामेव लिंगानां शिरोभूतमिदं वरम्।

यावन्ति सन्ति लिंगानि वाराणस्यां महान्त्यपि।

उत्तम तावातामेतदुत्तमांगवदुत्तरम्।। (काशीखण्ड)

उमाकान्त

‘शिव’ के पर्यायवाची शब्द के रूप में ‘उमाकान्त’ कम लोकप्रिय नहीं है। ‘उमा’ और ‘कान्त’ -इन दो शब्दों से मिलकर बने यौगिक रूप उमाकान्त का अर्थ होता है- उमा( पार्वती) का कान्त (पति)। उमाया: कान्त: उमाकान्त: । इसतरह, विग्रह करने पर यह षष्ठी तत्पुरुष का उदाहरण बनता है। दूसरी ओर उमा का कान्त है जो, अर्थात् वह (शिव)- इस रूप में किया गया विग्रह इसे व्यधिकरण बहुव्रीहि समास का उदाहरण बनाता है। व्यधिकरण बहुव्रीहि वहाँ होता है, जहाँ पदों का अधिकरण भिन्न-भिन्न होता है। उमाया: कान्त: यो सो उमाकान्त: । यहाँ ‘उमा’ का प्रयोग षष्ठी विभक्ति के साथ हुआ है, जबकि ‘कान्त:’ का प्रथमा के साथ। इसतरह, षष्ठी और प्रथमा दो भिन्न अधिकरण हुए। फलस्वरूप, ‘उमाकान्त’ व्यधिकरण बहुव्रीहि का उदाहरण कहलाएगा। ‘उमाकान्त’ के पूर्वार्ध ‘उमा’ पर पहले ही विचार किया जा चुका है।सम्प्रति इसके उत्तरार्ध ‘कान्त’ पर विमर्श करना अभिप्रेत है।

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इच्छार्थक/कामनार्थक धातु कन् -> कम् में भूतकालिक प्रत्यय ‘क्त’ के योग से कान्त: रूप बनता है- कमु कान्तौ (1/302) आत्मनेपदी -कामयते (संस्कृत-धातु-काेष:/ सं. युधिष्ठिर मीमांसक:)। इसका अर्थ होता है – प्रेमी या पति अथवा प्रेम करने वाला पति। दूसरी ओर ‘कान्ता’ का अर्थ होगा- प्रेम करने वाली/प्रेयसी पत्नी/बिलवेड वाइफ। कालिदास-कृत ‘मेघदूतम्’ के प्रथम छन्द में प्रयुक्त ‘कान्ता’ पद इसी अर्थ का वाचक है – “कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात् प्रमत्त:”।

इसप्रकार, ‘उमाकान्त’ का अर्थ होगा – उमा को चाहने वाला पति अर्थात् भरपूर प्रेम करने वाला पति, इसे अंग्रेजी में लविंग हसबैंड कहते हैं । कालिदास ने उनके इस रूप को कुमारसम्भवम् के अष्टम सर्ग में मनोयोगपूर्वक दिखाया है –

“स प्रियामुख रसं दिवानिशं हर्षवृद्धिजननं सिसेविषु: ।

दर्शन प्रणयितामदृश्यतामाजगाम विजयानिवेदित: ।।90।।”

अर्थात् प्रिया (उमा) के आनंदवर्धक अधरों का रस अहर्निश पीने के इच्छुक शंकर जी की ऐसी दशा हो गयी कि ‘विजया’ द्वारा यह संदेश पाकर भी कि आपके दर्शनार्थ प्रियजन उपस्थित हुए हैं, वे बैठे रह जाते थे, अर्थात् प्रिय पत्नी उमा को छोड़कर नहीं जाते थे ।

हम जानते हैं कि शिव की पूर्व पत्नी ‘सती’ ही अगले जन्म में उमा/ पार्वती बनकर अवतरित हुई थी। मेना (मैनाक पर्वत) और हिमवान् को क्रमशः माता-पिता बनने का सुयोग प्राप्त हुआ था।

उमेश/उमेश्वर :

उमा+ईश= उमेश का सामान्य अर्थ होता है – हिमवान् और मेना (मैनाक) की पुत्री उमा का ईश, अर्थात् पति। सन्धि की भाषा में यहाँ गुण स्वर सन्धि है। आद्गुणः (1/6/87) सूत्र के अनुसार, ‘‘अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेश: स्यात्। उपेन्द्र:/गंगोदकम् ,अर्थात् अवर्ण से अच् परे होने पर पूर्व और पर – दोनों स्थानों में एक गुण आदेश हो; यथा- उपेन्द्र और गंगोदक। दूसरे शब्दों में अ और आ को आत् कहते हैं। अ या आ के ठीक बाद इ या ई आए तो ‘ए’ होता है, अ या आ के परे उ या ऊ आए तो ‘ओ’ होता है, अ या आ के परे ऋ आए तो ‘अर्’ होता है; जैसे- देव+इन्द्र = देवेन्द्र, देव+ईश = देवेश, सूर्य+उदय = सूर्योदय, जल+ऊर्मि = जलोर्मि, देव+ऋषि =देवर्षि, महा+ऋषि= महर्षि।

ध्यातव्य है कि ‘उमेश’ में ‘आ’(उमा) के परे ‘ई’ का प्रयोग हुआ है। इसलिए, उपरिलिखित सूत्र के अनुसार यहाँ ‘उमेश’ के रूप में सन्धि हुई है।

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समास की दृष्टि से ‘उमेश’ षष्ठी तत्पुरुष का उदाहरण है। द्रष्टव्य – षष्ठी (2/2/8), अर्थात् सुबन्तेन प्राग्वत्। राज-पुरुषः। षष्ठ्यन्त का सुबन्त के साथ समास हो। राज-पुरुषः में ‘राज्ञः’ इस षष्ठ्यन्त का ‘पुरुषः’ नामक सुबन्त के साथ समास हुआ है। ‘राजपुरुषः’ का लौकिक विग्रह राज्ञः पुरुष और अलौकिक विग्रह ‘राजन् ङ्स् पुरुष सु है।

इसी सूत्र के आधार पर ‘उमेश:’ का लौकिक विग्रह ‘उमायाः ईश:’ (उमा का ईश) होगा, जबकि अलौकिक विग्रह उमा ङ्स् ईश सु है।

‘उमा’ के तीन-चार निर्वचनात्मक अर्थ मिलते हैं –

(क) उ = शिव, मा = लक्ष्मी के समान पत्नी, अर्थात् पार्वती।

ओः – शिवस्य लक्ष्मी इव पत्नी या सा उमा अर्थात् शिव की लक्ष्मी!

(ख) उं – शिवं माति पतित्वेन, अर्थात् उ (शिव) को पतिभाव से देखने -पूजने -स्वीकारने वाली नारी उमा कहलायी।

(ग) उ मेति मात्रा तपसो निषिद्धा पश्चादुमाख्यां सुमुखी जगाम (कुमारसम्भवम् : कालिदास, 1/26), अर्थात् माता मेना के द्वारा यह कहकर मना किये जाने पर कि ओह! बस अब (शिव की तपस्या ) मत करो। बहुत हो गया। इसी से वह उमा कहलायी।

अतः, उमा का अर्थ यहाँ उस अविवाहिता पार्वती से है, जो शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी। इसी उमा के ईश (पति) को उमेश कहते हैं।

अब ‘उमेश’ के परार्ध ‘ईश’ पर विचार कर लिया जाए। ऐश्वर्यार्थक ईश् धातु (ईश् ऐश्वर्ये; 2/10) में पुल्लिंग ‘अच्’ प्रत्यय के योग से ‘ईश’ बनता है, जिसका अर्थ स्वामी/अपनाने वाला/ शक्तिशाली/ सर्वोच्च/प्रभुतासम्पन्न होता है। ईश ही वह परम शक्ति है, जो जीवों का (यहाँ उमा के सन्दर्भ में) ईशन या ‘शासन करता है।

पुनश्च, ‘ईश’ में ‘वरच्’ प्रत्यय के योग से ईश्वर  बनता है। इसका अर्थ किंचित् विशिष्ट होता है; यथा – ईशों में वरीय या वरिष्ठ, अर्थात् परम शक्तिशाली, सर्वोच्च शासक, सर्वप्रभुतासम्पन्न। कुल मिलाकर, उमेश का अर्थ हुआ — उमा का परम प्रभुतासम्पन्न पति। जब पति प्रभुतासम्पन्न होगा, तब प्रकारान्तर से पत्नी भी होगी। व्याकरणिक दृष्टि से उत्तरपद प्रधान होने के बावजूद व्यावहारिक दृष्टि से पूर्व पद की बलवत्ता स्वयंसिद्ध है।

महाशिवरात्रि की मंगलमय शुभकामनाएँ

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