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“नारा दिवस” व्यग्ंय:- बिम्मी कालिन्दी शर्मा,

 

बिरगंज, (व्यग्ंय) बिम्मी कालिन्दी शर्मा ।
आज नारी दिवस है पर यह नारी दिवस कम “नारा दिवस” बन कर रह गया है । हर साल नारी के हक, अधिकार और हीत में बडे-बडे नारे लगाए जाते हैं.पर वास्तविकता की जमीन पर ईस नारे की औकात पायजामे का नाडा जितना भी नहीं है । पांच सितारा होटल यें बडे-बडे दावों और वादों के साथ नारी दिवस मनाने की ऐसी कवायद की जाती है जिसे देख सुन कर ऐसा लगता है की नारी का श्राद्ध किया जा रहा है और उनके हक अधिकार का पिंड यह पितृसत्तात्मक समाज और सोच दोनों खुद ही.खा जाते है ।
यदि ऐसा नही है तो नारी हर जगह पीडित क्यों होती है ? कंही शारीरीक रुप से तो कंही मानसिक रुप से महिलाओं का शोषण हो ही रहा है । आप संसद या मंत्री मंडल मे ही देखिए वंहा कितने प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व कर रही है ? कहने को तो ईस देश में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की संख्या है फिर क्यों.महिलाए ही पिछडी हूई है और उन का अस्तित्व हमेशा जोखिम में क्यो रहता है ? किसी आदमखोर पुरुश द्वारा रेप किए जाने पर भी समाज की सारी सहानुभूति रेप से पीडित महिला को नहीं मिलता और रेपिस्ट पुरुष सीना ताने बिना लाज शर्म के चलता है । महिलाओं से उनके शरीर की सूचिता कि दूहाई देने वाला समाज रही रेपिस्ट पुरुष के लिए सजा कि मांग करने मे क्यो पिछे हटता है ? वजह साफ है नियम कानून बनाने वाला भी पुरुष उसे लागू करने वाले भी पितृसत्ता के ही रखवाले हैं तो यंहा पीडित महिला को ईंसाफ मिलेगा भी तो कैसे ?
यह अनुदार समाज कर रहा है कि महिला कितने खूले वस्त्र खोले और अपनी जुबान भी औरत कितना खोले और बंद रखे । महिलाओं के प्रति समाज सच में बहुत ही अनुदार, नकारात्मक और आक्रामक है । ज्यादातर घरों में महिलाओं कि स्थिति पिंजड़े में बंद तोते कि तरह है जिसका पर काट कर उतना ही बोलना सिखाया या कहा जाता है जिससे उनका.निर्वाह हो जाए । समाज कि बदतर सोच का आलम यह है कि सुबह मुर्गा बांग दे तो अच्छा माना जाता है पर यदि मूर्गी ने भी बांग दे दिया तो सबके कान खडे हो जाते है कि ऐसा गजब कैसे हो गया है ?
धिरे-धिरे महिलाएं भी आगे आ रही है । पढ लिख कर आत्मनिर्भर बन रही है । यह हवा का ताजा झोंका है जो समाज के सभी हिस्सों को मन माफिक लग रहा है । अभी भी ज्यादातर महिलाओं के जीवन का केंद्र चूल्हा चौका ही जो वह खुद राजीखुशी या वाध्यता से ईसमें कैद हो जाती है । क्योंकि परिवार या समाज यही चाहता है । कुर्बानी भले ही स्त्रीलिंगीं चौपायों न दी जाती हो पर घरों में परिवार की आन-बान-शान की.खातिर महिलाओं को ही कर्तव्य की वलिवेदी पर चढ कर कुर्बानी.देनी पडती है । अभी भी महिलाओं के जीवन में शिक्षा और रोजगार सेकेंडरी है और शादी ही प्राईमरी है । जब तक ऐसा होता रहेगा तब काहे का नारी दिवस ?
बस एक दिन अच्छे कपडे गहने पहन कर पांच सितारा होटल में पैसिंल हील कखटखटाते हुए जाना और नारी के सम्मान में.दो -चार शब्द और पुरुषों और पितृसत्तात्मक समाजको गाली दे कर अपनी भडास निकाल ली । बस हो गया हरेक साल मनाया जाने वाला नारी दिवस का कर्मकांड पूरा । नारी के श्रम का कंहा मूल्य है ? गिट्टी कुट्ती और दिहाडी में बच्चा पीठ में लाद कर ईंटे ढोती औरत की बैबसी और लाचार पर कंहा है समाज और सरकार की नजर ? उन्हे भी ईस दिन के लिए मीठे लफ्जों में बोलने वाली सुंदर और सुघड नारी ही चाहिए । हासिए पर रह कर भी ईस सृष्टि को चलायमान कर रही उन सारी गतिशील महिला पात्रों के प्रति यह समाज ईतना उदासीन क्यों है ? औरत के श्रम का मूल्य क्यों नहीं है ? नौ महिने तक गर्भाशय की झोली में बच्चे को रख कर भी औरत जितना श्रम कर लेती है उतना श्रम कोई पुरुष सारी जिंदगी भी नही कर पाता है । फिर भी पुरुष का ही अभिमान ज्यादा है कि उसके पास अतुलनीय बल और हिम्मत है । और यह बल और हिम्मत कंहा चला जाता हे जब किसी औरत के मर्जी के खिलाफ उसके शरीर को नोचता है ? मर्द तो हर दिन.हर क्षण औरत के शरीर के साथ युद्ध करता और जबरजस्ति विजेता भी बन जाता है । कभी तन कहा बजाय औरत के मन.को सहला कर देखे, हवश में नहीं होश में रह कर औरत से प्यार करे और उसके आत्मसम्मान की रक्षा करे तब साल में एक दिन नारी दिवस मनाने की नौबत ही न आए । पर पुरुषों को तो अपनी सत्ता चलानी है वह चाहे संसद में हो या महिला के शरीर पर । उसने तो बस खेलना ही सिखा है किसी नारी के मन के तडप को पुरुष क्या समझे जंहा औरत भावना नहीं सिर्फ भोग्या है ।
आए दिन लडकियों का रेप होता है । रेपिस्ट को आन द स्पट ही शूट कर देने वाले कानून लागू करने कि बजाय यह देश समाज और पितृसत्तात्मक सोच के लोग उसी रेपिस्ट के पक्ष में नारे लगाते हैं और उसके पक्ष में फाल्तु की वकालत कर के बचाव करते हैं । और जो.पीडिता है उसको ही गलत बता कर उसकी शूचिता पर प्रश्नचिन्ह लगा देते हैं । यह न्यायाधीश बन कर फैसला.देने वाले वही लोग है जिनकी बेटी या बहन रेप की शिकार नहीं हूई है । यदि ईनकी अबनी बेटी या बहन को कोई छेड भी दे तो उसकी प्रतिरक्षा में वकिल बन कर जिरह करने लगेगें । सब नियम.कानून अपने मन मुताबिक ही चाहिए । दुसरे की बेटी तो कूडा है उसके लिए संवेदना तो दूर सहानुभूति भी नहीं जताते ।
लडकियों का चरित्र यही लोग प्याज कि तरह छिलते है और आंसू देते है । रेप होने के बाद कौन सी लडकी की मानसिक स्थिति सही होती है कि वह अपने पर बिती दर्दनाक घटना को बताएगी । यह दु:ख वही जान सकता है जिस पर बिता है । बांकी समाज तो तमाशाइयों का भीड है जिसे पितृसत्ता के घोडे हिनहिनाते हुए अपने ही तय रास्ते पर ले जाना चाहते हैं । जंहा रेप पीडित महिला के लिए जीवन भर की बदनामी और घाव और पीडक का स-सम्मान रीहाई । यही होता रहा है । यदि हिम्मत है, महिला के अधिकार की रक्षा करना चाहते हैं तो रूप के खिलाफ कडे कानून बनाए और लागू करें । तभी नारी दिवस सार्थ होगी और उसको मनाने का भी कोई औचित्य होगा । वरना नारी दिवस सिर्फ “नारा दिवस” ही सावित होगा मूठ्ठीभर की आभिजात्य समृद्ध महिला के अपने कपडे, गहने और केशविन्यास करने और पांच सितारा होटल में लंच करने का दिन बन कर रह जाएगा

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