बांके जिला में शिक्षा के प्रथम स्तम्भ पण्डित भगवानदीन चौबे (उर्फ मन्नाबाबा) : सच्चिदानन्द चौबे
सच्चिदानन्द चौबे, नेपालगंज, अंक फरवरी, 022, हिमालिनी ।
वर्तमान लुम्बिनी प्रदेश नं.–५ में अवस्थित बाँके जिला की व्यवसायिक राजधानी नेपालगन्ज के निवासी पण्डित भगवानदीनचौबे – उर्फ मन्नाबाबा इस क्षेत्र के शिक्षा के प्रथम स्तम्भ के रूप में जाने पहचाने जाते हैं । आपका जन्म माता लक्ष्मी देवी के पावन कोख से चतुर्थ सन्तान के रूप में एक सात्विक–आध्यात्मिक ब्राह्मण कुल में बि. सं. १९१५ तदनुसार सन् १८५८ ई. में हुवा था ।आपके बाबा पं. औसेरी प्रसादचौबे एवं पितानारायण प्रसादचौबे संस्कृत भाषा के उद्भट विद्वान थे ।
आपकी प्रारम्भिक शिक्षा घर में हुई बाद में इन्हें पुस्तैनी घर रायबरेली पढ़ने के लिये भेज दिया गया । वहां पर इन्होंने अँग्रेजी–उर्दू– हिन्दी भाषा लेकर मिडिल पास किया । गणित और संस्कृत के भी आप प्रखर ज्ञाता थे । रायबरेली में ही इन्होंने महाजनी (बही–खाता ) लिखने का अभ्यास किया फिर इन्होंने अदालत में लिखन्दारी सीखा और कुछ वर्ष यही काम किया । आपको कानून की किताब “ताजेरातहिन्द” के दफा–उपदफा सब मुहँजबानी याद थे । आपके तीन बडेÞ भाई सागर,बद्री और काशी थे यज्ञोपवीत के बाद काशी में संस्कृत पढने चले गये थे । सभी पढ़ लिखकर आये सभी को इनके पिता ने काम पर लगा दिया सागर के नाम से ६५ बीघा पक्का जमीन खरीद दिया ।
उस जगह में खेती किसानी कराने के लिये यहाँ मन्नाबाबा को भी बुला लिया और उन दोनों भाइयों को खेत देख रेख के लिये खेत के पास ही आपने चार घर बनवा दिया ४–५ घर मजदूरों के लिये भी बनवा दिया ।
वहीं पर मन्ना बाबा को रहने के लिये उनके पिता ने भेज दिया । मन्ना बाबा वहीं रहने लगे ।वहाँ के सब लोग उस १०–१२ घर के पुरवा को मन्नाबाबा का पुरवा कहने लगे बाद में वही गाँव अपभृंश होकर मानपुर हो गया वहाँ की जमीन इनके बड़े भाई सागर के नाम थी अतः इन्होंने उसका अविभारा सागर को सौंप कर अपने दूसरे भाई काशी के साथ रहने के लिये आ गये बाँके जिला नेपालगन्ज के त्रिभुवन चौक में दक्षिण कृष्ण मन्दिर के पीछे शिवगोपाल, बद्री और काशी के तीन घर थे काशी के कोई परिवार नहीं था अतः उन्हीं के घर में इन्होंने सर्वप्रथम सन् १८९५ ई.में गुरु पाठशाला का शुभारम्भ किया । एक लम्बी दालान को को गोबर मिट्टी से लिपवा पुतवा कर उसमें टाट पट्टी बिछवा कर पढाई प्रारम्भ किया । नेपालगन्ज के बाजार में लगभग सभी धर्म–वर्ग के लोग थे ।
जिसमें वैश्यवर्ग का बाहुल्य था जिनका प्रमुख धंधा व्यापार था गाँवों में कुर्मी, काछी,काँदू, मुराऊ आदि की बहुलता थी । शिक्षा का कहीं नामों निशान नहीं था । केवल ब्राह्मण लोग संस्कृत भाषा पढते थे । वेद–वेदाँत के साथ–साथ ज्योतिष कर्मकाण्ड, आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी । पढाई का माध्यम हिन्दी और लिपि देवनागरी थी । अतः इनके विद्यालय में प्रारम्भ में भाषा और गणित ही केवल पढाई जाती रही, गिनती,पहाड़ा, पौवा, अध्धा,पौना,सवैया,अढैया, ढयोंचा, प्योंचा, वडा एकन्ना विकट पहाड़ा याद हो जाने के बाद धार्मिक पुस्तकों के साथ महाजनी गुरु भी पढ़ाए जाने लगे । मूलधन ,मिश्रधन, ब्याज, चक्रविधि ब्याज, तौल, नाप आदि का ज्ञान कराया जाता था । बच्चे खडि़या मिट्टी–कोयला से काठ की पट्टी पर पहले लिखने का अभ्यास करते थे फिर–कागज पर लिखते थे । यह क्रम अनवरत चलता रहा । इसी विद्यालय में इनके पुत्र शिवकुमार चौबे इनके भाई बद्री के पुत्र भीमशंकर एवं सागर के पुत्र राम चन्द्र , बिन्दाचरन के पुत्र महावीर चौबे, कृष्ण गोपाल टण्डन, सीता रामहल वाई, राम प्रसाद ढेवा, हमारे पिता पं.गोवद्र्धन प्रसादचौबे आदि ने शिक्षा पाई ।
आप एक संस्कृत, हिन्दी, अग्रेंजी, उर्दू, मुडिया भाषा के परम विद्वान थे आप वकालत भी करते थे । आपके बड़े भाई सागर उस समय के सबसे बड़े पहलवान भी थे । वे दो–दो मन के अनाज के बोरों को बगल में दाब लेते बोरों को उछाल कर छल्ली के ऊपर फेंक देते थे । इन्हीं के अखाडेÞ में अन्य लोगों के साथ में मन्ना बाबा भी कसरत करते थे अतः ये भी हृष्ट– पुष्ट सुगठित बदनवाले एक सामान्य लम्वाई के व्यक्ति थे । धोती –कुर्ता –अंगौंछा, फतुहीइन के अंग वस्त्र थे । जाड़े में चौबन्दी एवं रुइहा पहनते थे तखत पर सोते थे । दाल–रोटी, साग, दूध, मट्ठा, घी इन्हें बहुत प्रिय थे । फलों में आम इन्हें बहुत प्रिय था ।
आप बच्चों को देवी देवताओं की प्रार्थनाएँ, श्लोकों को संस्कृत एवं हिन्दी में सिखाते थे । सुलेख लिखाना, इमला बोलना बच्चो को व्यायाम एवं स्वाध्याय के लिये वहुत सी बातें सिखाते थे । किसी के साथ न अन्याय करते थे न अन्याय सहन करते थे । कोई भी समस्या होती थी तो लोग इनके पास आते थे ये बड़े ही सहज ढंग से उसे सुलझा देते थे ।
उनकी कई विगहा जगह आज भी मानपुर में ऐलानी पडी है । उन्हीं की जमीन पर महाकाली का मन्दिर बना है । इनकी बहुत जमीन मुंशी असगर, केदार नाथ टण्डन, कृष्ण कुमार शर्मा आदि ने इनके वशंज बाबूराम उर्फ पुत्तीलाल चौबे की मृत्यु के बाद उनके परिवार को कर्ज देकर अपने नाम लिखा लिया । बाबूराम उर्फ पुत्तीलाल चौबे ने एक दूसरा विवाह राजापुर ( बर्दिया) में किया था उनका दिनेश कुमार चौबे नाम का पुत्र अभी भी ऐलानी जगह के लिए प्रयासरत है । आप सदैव सन्ध्या, पूजन, हवन आदि नित्य कर्म करते थे भूखे, असहायों की सहायता करते थे । गाय,कुत्ते एवं कौवा के लिए रोज ग्रास निकालते । आल्हा एवं भजन गाने के शौकीन थे । ढोलक बजा लेते थे । फागुन महीने में फगुवा गाते । बहुत ही मिलनसार स्वभाव था । जीवन के अन्तिम क्षणों वे पूर्णतया विरक्त हो गए थे और एक साधारण बीमारी के बाद सन् १९४३ दिसम्वर २५ के दिन वे गोलोक वासी हो गए । आज उनकी पुण्यतिथि पर मैं अपने समस्त पविार के साथ भावभीनी श्रद्धाञ्जलि अर्पण करता हूँ । भगवान उनकी दिवंगत आत्मा को शान्ति देंवे ।
नेपालगन्ज–११ भवानीबाग (बाँके) लुम्बिनी प्रदेश, नेपल
सच्चिदानंद चौबे न

