संगति का असर
गणेश कुमार लाल:पुराने जमाने में एक देश के राजा थे भैरव सिंह। उस राज्य में राजा के देश भक्त प्रधानमन्त्री थे मोहन सिंह राठौर। लोग उन्हें राठौर कह कर पुकारा करते थे। एक दिन राठौर ने महसूस किया कि राजा भैरव सिंह दरबारियों की झूठी तारीफ से अपनी नम्रता खोते जा रहे हैं और उनकी भाषा भी अशिष्ट हो गई है। यह देख कर उन्होंने राजा को अपनी गलती का अहसास कराना जरूरी समझा। अपनी बनायी योजनानुसार एक दिन प्रधानमन्त्री राठौर ने राजा से बात करते हुए उन पर ऐसी टिप्पणी कर दी, जो राजा को पसंद नहीं आयी और वे बहुत क्रोधित हो गए। लेकिन राठौर ने जानबूझ कर राजा से वैसी बाते करते रहे। 
आखिरकार राजा से रहा नहीं गया तो वे आवेग में बोले- प्रधानमन्त्री राठौर अपने राजा की शान में इस तरह की वात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हर्ुइ – सच है कि तुम बुद्धिमान हो और मैं तुम्हारी बुद्धिमत्ता से प्रभावित हूँ। लेकिन इस का यह अर्थ नहीं कि तुम मुझे कुछ भी कहते रहो। मैं यह भी देख रहा हूँ कि आजकल तुम्हारा व्यवहार असभ्य होता जा रहा है। तुम्हारी भाषा मजाक और शिष्टता की सीमा को पर कर रही है।
प्रधानमन्त्री राजा के क्रोधी स्वभाव को देख कर हाजिरजबाबी से बडÞी नम्रता के साथ बोले- क्षमा करें हुजूर, किन्तु इस में सारी गलती मेरी नहीं है, यह सब मेरी संगति का असर है। कहते हैं न कि संगति व साथी हमारे व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
रौठोर ने बुद्धिमता से राजा हैरान रह गए, क्योंकि राठौर अपना अधिकतर समय राजा के साथ ही बिताया करते थे। इस प्रकार उन्हें अपने बदलते व्यवहार का एहसास हुआ और उन्हों ने उसे सुधारने का संकल्प किया।
इस कहानी के माध्यम से यह पता चलता है कि चापलुसी व झूठी प्रशंसा से व्यक्ति अपने गुणों को ताक पर रख कर असभ्य व अशिष्ट व्यवहार करने लगता है। इसलिए कार्यालय में चापलुसी व झूठी प्रशंसा पर खुश होने के बजाय अपने काम और गुणों को निखारने पर ध्यान देना चाहिए। िि
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