Wed. Apr 24th, 2024

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) परियोजना पर चीन की नेपाल के साथ नहीं बनी बात



चीन के विदेश मंत्री वांग यी की नेपाल यात्रा के बीच दोनों देश बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) परियोजनाओं और उससे जुड़े ऋणों पर एक समझौते पर हस्ताक्षर करने में एक बार फिर विफल रहे। नेपाल ने  कहा कि वह किसी भी परियोजना को स्वीकार नहीं करेगा जो चीन की किसी शर्तों पर की जाएगी।
नेपाल के विदेश मंत्री नारायण खडका और उनके समकक्ष वांग यी के बीच शनिवार को आर्थिक और तकनीकी सहयोग, द्विपक्षीय व्यापार पर प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता हुई। इस वार्ता में नेपाल और चीन के बीच कुल नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं जिसमें बीआरआइ पर कोई भी समझौता नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि नेपाल ने मई 2017 में बीआरआइ फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन परियोजना कार्यान्वयन समझौते को अंतिम रूप देने के साथ-साथ चीनी निवेशकों द्वारा भूमि हड़पने और अपर्याप्त मुआवजे के स्थानीय लोगों के कड़े विरोध सहित कई बाधाओं के कारण एक भी परियोजना शुरू नहीं हुई है।

नेपाल ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि परियोजनाओं के चयन के लिए एक संयुक्त तंत्र होना चाहिए, अनुदान को वरीयता दी जानी चाहिए लेकिन यदि ऋण की आवश्यकता है तो ऋण ब्याज दो प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और ऋण के लिए पुनर्भुगतान का समय तय किया जाना चाहिए।

नेपाल का इसी के साथ कहना है कि पुनर्भुगतान का समय अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुसार या विश्व बैंक, एशियाई विकास द्वारा लगाए गए ब्याज दर के अनुसार होना चाहिए। नेपाल ने एक यह भी शर्त रखी थी कि इस परियोजनाओं में प्रतिस्पर्धी बोली होनी चाहिए और वे सभी के लिए खुली होनी चाहिए, न कि केवल चीनी फर्मों के लिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अपनी इस परियोजना से हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर राज करने की कोशिश कर रहा है। इस परियोजना के तहत उसने पाकिस्तान में भी निवेश किया है और अब वह नेपाल में भी करना चाह रहा है। इसके तहत ड्रैगन सड़कों का जाल बिछाकर भारत को घेरना चाह रहा है। चीन दक्षिण एशिया और हिन्द महासागर क्षेत्र में इस योजना के जरिए भारत को पीछे कर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश में है।



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1 thought on “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआइ) परियोजना पर चीन की नेपाल के साथ नहीं बनी बात

  1. Kerung – Kathmandu high altitude Rail link technically may be feasible with very high cost but ecologically /environmentally not sustainable and economically not feasible. This issue was discussed in an International Webinar, mid 2020

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