भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक-पुरुष थे श्रीराम : डॉ ‘मानव’
इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल द्वारा रामनवमी पर कवि-सम्मेलन आयोजित
नारनौल। इंद्रप्रस्थ लिटरेचर फेस्टिवल की हरियाणा इकाई द्वारा रामनवमी के सुअवसर पर, 51वें कार्यक्रम के रूप में, एक भव्य राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन का आयोजन गत शाम किया गया। रेखा शर्मा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती-वंदना के उपरांत संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ चंद्रमणि ब्रह्मदत्त के प्रेरक सान्निध्य और डॉ बबीता गर्ग के कुशल संचालन में संपन्न हुए इस वर्चुअल कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता हरियाणा साहित्य अकादमी, पंचकूला की पूर्व निदेशक डॉ मुक्ता ने की, वहीं वरिष्ठ साहित्यकार और सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) में हिंदी-विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ रामनिवास ‘मानव’ इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम के प्रारंभ में संस्था की प्रदेशाध्यक्ष डॉ कृष्णा आर्या ने अतिथियों का स्वागत करते हुए परिचय प्रस्तुत किया तथा महासचिव परमानंद दीवान ने संस्था की गतिविधियों पर प्रकाश डाला। तत्पश्चात् कवि-सम्मेलन में डॉ रामनिवास ‘मानव’, डॉ मुक्ता, डॉ कृष्णा आर्या, परमानंद दीवान और डॉ बबीता गर्ग के अतिरिक्त मोनिका शर्मा (गुरुग्राम), डॉ इंदिरा गुप्ता (भिवाड़ी), लता नोवाल (मुंबई), मुकुट अग्रवाल और ममता ‘अरुणा’ (रेवाड़ी), दीनदयाल दीक्षित (हरिद्वार), आभा साहनी (पंचकूला), नीरजा शर्मा और शीला गहलावत (चंडीगढ़), कविता यादव (दिल्ली), रेखा शर्मा और मंजीत तुर्का (अंबाला), पृथ्वीसिंह बेनीवाल (हिसार), रवि शर्मा और भारतभूषण तायल (नारनौल) आदि एक दर्जन कवियों ने काव्य-पाठ किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए डॉ ‘मानव’ ने कहा कि प्रभु श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम और मानवता के आदर्श तो थे ही, भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक-पुरुष भी थे। उन्होंने दोहा-पाठ भी किया। उनके इस दोहे को बहुत सराहा गया- अरी व्यवस्था धन्य तू, रचती क्या-क्या रास। रावण सत्ता भोगते, और राम वनवास।। डॉ मुक्ता ने ‘कब रे मिलोगे राम? मन बावरा पुकारे सुबहो-शाम।’ कहकर राम के प्रति अपनी मिलनातुरता प्रकट की, तो परमानंद दीवान ने रामनाम को सभी दु:खों की दवा बताते हुए कहा- राम का नाम ही रामबाण है। दिलवाता सब दुखों से त्राण है। डॉ कृष्णा आर्या ने अपने हरियाणवी गीत के माध्यम से वनवास को जाती हुई माता सीता की मनोदशा का कुछ इस प्रकार चित्रण किया- महलां की राणी सीता जंगल मैं चाली। आंख्यां सैं बहण लागग्या नीर रामजी। डॉ बबीता गर्ग ने ‘तैर रहा है प्रश्न हवा में, हैं कहां राम हमारे?’ प्रश्न द्वारा प्रभु श्रीराम के संबंध में अपने मन की जिज्ञासा प्रकट करते हुए स्वयं उसका उत्तर भी दिया है, तो डॉ रेखा शर्मा ने ‘हे कौशलेय श्रीराम, तुमसे ही भारत अभिराम।’ कहकर भगवान राम को भारत का गौरव बताया। मनजीत तुर्का ने रामनवमी पर भगवान राम को नमन करते हुए खुशी मनाने का आह्वान किया- रामनवमी शुभ अवसर है रामजन्म का। आओ शीश झुकाएं, मिलकर खुशी मनाएं। भारतभूषण तायल का कहना था- पुण्य उदय सब आज हो गये। पूर्ण सारे काज हो गये। पुलकित रोम-रोम करता है राघव की जयकार। रवि शर्मा ने प्रभु राम को विभिन्न विशेषणों से विभूषित करते हुए फरमाया- पूजा और वरदान हैं राम। गौरव के प्रतिमान हैं राम। मानव की पहचान हैं राम। घर-घर के भगवान हैं राम। मोनिका शर्मा ने मधुर स्वर में अपनी गज़ल प्रस्तुत की, जिसके इस शेर को खूब सराहा गया- हम अक्सर बेरहम हवा से रोज बगावत करते हैं। नहीं छुपाते मुंह को तम से, नहीं शिकायत करते हैं। अंत में डाॅ भारतभूषण वर्मा (असंध) ने समीक्षक के रूप में पठित कविताओं की समीक्षा प्रस्तुत की। लगभग ढाई घंटों तक चले इस कवि-सम्मेलन में पठित रामभक्ति से ओतप्रोत रचनाओं को श्रोताओं की भरपूर सराहना मिली।


