प्रेम की आराधना और अभिनंदन की अभिव्यंजना है, बसंत चौधरी की कविताएँ : रामदयाल राकेश

रामदयाल राकेश
बसन्त चौधरी को प्रेम और प्रकृति का कवि माना जा सकता है । इनकी काव्य–रचना के ये दो प्राणतत्व माने जा सकते हैं । प्रेम की अर्चना आराधना और अभिनंदन की अभिव्यंजना उनके काव्य में सहज ही मिल जाती है । उन्होंने प्रयत्नपूर्वक नहीं प्राकृतिक रूप में इसकी अभ्यर्थना की है । प्रकृति का प्रत्येक उपादान इन्हें प्रिय है । प्रकृति उन्हें सम्मोहित करती है । प्रकृति का सम्मोहन उनके प्राण में समाया हुआ सा प्रतीत होता है । इस भाव की सरल, सहज और स्वच्छ अभिव्यक्ति निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में द्रष्टव्य है–
“ऐसा सुन्दर नेह प्रकृति का
कहाँ भुला देना संभव है
उलझ जाऊँ इस नश्वर जग में
ये भी तो नहीं सभंव है ।” (पृ. १४३)
नीले नम में उमड़ते–घुमड़ते, काले–काले बादल, प्रेम रस में भीगे सने आवारा बादल का अवलोकन करना प्रकृति के कवि को ही–भाता है । क्षण–क्षण में बादलों का रंग रूप बदलना कवि को अच्छा लगता है । प्रकृति के प्रांगण को प्रेम रस से सिंचित करने का सौन्दर्य कवि की आँखों से ओझल होने का नाम नहीं लेता है । बादल की नई–उद्भावना, नई कल्पना और संकल्पना कवि के मौलिक चिंतन का प्रमाण है । बादल को नर्म रुई के गालों जैसे अछूता और अकल्पनीय एहसास है, जिसे कवि ने संभालकर, संजोकर और सुसज्जित कर हमारे समक्ष प्रस्तुत कर नया सौन्दर्य बोध को परोसा है ? जो टटका है और हम को टकटकी लगाकर बादल के बहुरुपिए रूप को विहंगम दृष्टि से निहारने के लिए प्रेरित और प्रभावित करता है यथा–
“नर्म रुई के गोलों जैसे
उड़ते हुए बादल÷हवा से इश्क करके,
उस पर चढ़ मँड़राते बादल
अपनी प्रियतमा को रिझाने,
कभी श्वेत, श्याम, रतनारे बादल
उसकी खातिर रूप बदलते
बहुरुपिए बादल ।” (पृ. १५९)
प्रकृति का सबसे प्रिय तत्व पानी जो प्राणियों के लिए अति आवश्यक माना जाता है । दूसरे शब्दों में कहें तो जल ही जीवन है । पानी का जीवन परोपकारी होता है । वह निरन्तर प्रवाहित होकर जगत और जीवन को ऊर्जा प्रदान करता है । चट्टानों से चोट खाकर भी वह नहीं थकता, नहीं रुकता और नहीं थमता अपने गन्तव्य सागर में समाहित होकर अपने अस्तित्व और अस्मिता का अवसान अन्त में कर देता है । यही उसकी नियति है फिर भी परोपकारी भावना को तिरोहित नहीं होने देता । सेवा भाव ही उसका प्राकृतिक स्वभाव है । पानी इसी संदेश को संप्रेषित करता हुआ आदि से अन्त तक प्रवाहित होता रहा है । कवि के शब्दों में–
“जीवन में मैंने उनको भी
आँखें मींच कर दिया समर्पण,
तन से, मन से जीवन मेरा
……………………..
सेवा भाव जीवन मेरा ।” (पृ. १६४)
प्राकृतिक सौन्दर्य के पारखी कवि बसंत चौधरी ने प्रकृति के अनूठे, अनोखे और अछूते रूप और रंग को अपनी काव्य रचना से प्रत्यक्ष अनुभव कराया है अपने पाठकों को, जो अद्भुत और अविस्मरणीय है यथा–
“अद्भुत और बेमिसाल है !
ये प्रकृति का ही तो कमाल है
जो अदृश्य है, यत्र तत्र ही नहीं,
सर्वव्यापी है, सर्वत्र है । प्रकृति ! (पृष्ठ–१३२)
प्रकृति के कवि बसंत पौष माह की सुबह का सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करने में भी पीछे नहीं पड़ते हैं । पौष माह बहुत ठंढ़ माह के रूप में प्रसिद्ध है । कवि ने कितनी बारीकी से इसका वर्णन किया है, जिसमें पौष की ठंढ़ भी मात खा जाती है । द्रष्टव्य है पंक्तियाँ–
पौष की सुबह । चारो ओर धुन्ध
घना कोहरा । ओस से ढकी दूब
सिहराती शीत लहर । जमता हुआ तापमान
ठण्ड की गिरफ्त में । अकड़ा हुआ… तन–बदन । (पृष्ठ–६०)
‘भोर का सूरज’ शीर्षक कविता में भी कवि ने सूर्य की स्निग्ध और सौदर्यमयी पहली किरण को काव्यात्मक आवरण देकर अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार दी है, जिसमे नयापन दिख पड़ता है । भोर का सूरज की अनुपम और अद्भुत छवि छटा का वर्णन भी मनमोहक और मनोरम लगता है । इस समय के सौन्दर्य का अवलोकन कर स्वयं सूर्य भी ठिठक सा लगा है । कवि के शब्दों में–
“तुम्हारे चेहरे से । जैसे ही टकराई
सूर्य की पहली किरण । देखकर अद्भुत छटा को
निखर उठी और हो गयी रंगीन । भास्कर भी जरा ठिठके ।” (पृ. १५८)
प्रकृति के कण–कण से और प्रकृति के किसलय–किसलय से कवि को परिचय है, प्यार है । संवेदनशील कवि बसंत को ऐसा लगता है कि वृक्षों की आंखें भी अद्भुत, श्रृंगार से सुसज्जित हैं । किसलय व कलियों में प्रस्फुटित हो गया है । फूलों से लदे पौधे भी मानो मदिरा पीकर लहरा रहे हैं, झूम रहे हैं, इठला रहे हैं और मदमस्त हैं । कवि के शब्दों में–
“अनुपम आभा लिए किसलय । हरित क्रांति के संवाहक ।
वृक्षों की शाखें । अद्भुत श्रृंगार किए हुए ।
खिल रही हैं कलियाँ फूलों से लदे पौधे इतरा रहे हैं ।
जैसे मदपान किए हुए हों । (पृ. ८२)
कवि बसंत चौधरी की काव्यिक रचना–संसार का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है प्रेम । सच्चा प्रेम के बारे में कहा जाता है कि इसमें स्वर्गीय सुषमा समायी हुई होती है । अंग्रेजी साहित्य के प्रद्धिस कवि शेली के शब्दों में–
Derotion Watts the mind abore
and hearen itself ousuands in love
कवि ने अपने काव्यसंग्रह ‘अनके पल और मैं’ में प्रेम की त्रिवेणी प्रवाहित करने में सफलता प्राप्त की है । यह प्रेम प्रेमी और प्रेमिका में, पति और पत्नी में, माता–पिता और बिटिया में प्रवाहित हुआ सा प्रतीत होता है । प्रेम के अनेक रूप होते हैं और इस सभी रूपों में पवित्रता और शुद्धता की सुगंध भरी होती है । कवि का सम्पूर्ण रचना संसार प्रेम से सराबोर सा लगता है । ‘बिटिया’ शीर्षक कविता में बिंटिया प्रति के पवित्र प्रेम को इस तरह प्रकट किया गया है–
“तुलसी सी ज्यों पुजित पावन है, पूजन की सामग्री बिटिया, दो–दो कुल की लाज निभाए, सात जन्म तक रानी बिटिया ।” (पृष्ठ ६२)
कवि बसंत चौधरी ‘प्रेम का संदेश’ संप्रेषण में सफल हैं । इसमें हृदय की स्वच्छता है, आत्मा की शुद्धता है और प्रेम को न भूलने की प्रतिज्ञा है, प्रण है । इसमें वासना की बू नहीं है । यह शारीरिक प्रेम नहीं है, जिसमें सेक्स की भावना प्रबल होती है । यह ‘आत्मिक’ प्रेम है, जो चिरन्तन, चिरनवीन और चिरशाश्वत है । शारीरिक आकर्षण और चमक–दमक में जो दैहिक प्रेम है, उसमें तपन एवं जलन की अनुभूति होती है, लेकिन आत्मिक प्रेम में शीतलता होती है, जो मन–प्राण को आजीवन शीतलता का एहसास दिलाती है । कवि के शब्दों में–
“तुम रहे ख्वाबों में हरदम
और दिल के पास भी है
वीथियाँ अनजान है सब
पर कदम सब जानते हैं ।
जब मिले खुलकर हँसे
भूल कर सारे गिले
रह गयीं बाँहें बिलखती ।” (पृ. ७८)
सच्चे प्रेम की धड़कन मानव के अस्तित्व को बरकरार रखने में कामयाब होती है । प्रेमी के अस्तित्व का एहसास प्रियतमा को होता है और प्रियतमा के अस्तित्व का एहसास प्रेमी को होता रहता है । यह एहसास ही प्रेम के फूल को खिलाने में सहायक होता है । एक दूसरे के बिना किसी का वजूद बरकरार नहीं रह पाता है । कवि इस एहसास से प्रेमिका को बेदखल और बदहवास नहीं करना चाहता है । वह बराबर यह यकीं दिलाता रहता है । यही तो प्रेमी जीवन का प्रमाण है । कवि के शब्दों में–
“तुम्हें पता है ? जब तुम नहीं होती । तुम्हारे बिना
तुम्हारे होने का, यह एहसास । मेरे सारे वजूद में
मोहब्बत को फूल खिला देता है । तुम्हे पाने का शौक बढ़ा देता है ।
तुम्हारे बिना अकेला अधूरा हूँ, फिर भी, प्रिय ! तुम मेरी हो
इस यकीन की वजह से । जिन्दा हूँ । (पृ ८१)
ममतामयी माँ का आँचल वात्सल्य प्रेम से पगा होता है । जब बचपन को यह वात्सल्य प्राप्त हो जाता है ? तब उनके संभावनाओं के द्वार स्वतः खुल जाते है । कवि बसंत मानवीय संवेदना के कवि हैं । इस कथन के समर्थन में प्रस्तुत हैं ये काव्य पंक्तियाँ–
“संवेदनाएं । और कभी भूख से बिल बिलाते ।
बचपन को जब मिल जाता है । माँ का वात्सल्य भरा आँचल ।
आँखों में सजते हैं तब । भविष्य के सुनहर सपने ।
जब संवेदनाओं की जगह । जाग्रत होती हैं । भविष्य के लिए
असीमित संभावनाएं । (पृ. ८९)
ऐसा ही निश्चल प्रेम छलकता है कवि के हृदय में, जब उन्हें पिता की याद सताती है । पिता के प्रेम बिना कवि का जीवन अधूरा है । इसका जीवंत एहसास कवि की इन पंक्तियों में है–
“मुझे एक मौका ऐसा दे दें । ऐ मेरी जिन्दगी ! झुक जाउँ
पिता के पैरो पर, कर सकूं उनकी बन्दगी । बस ! एक बार !
एक बार ! ये मौका दे दे मुझे । उन बिना कितना अधूरा हूँ,
ये कैसे समझाऊँ तुझे ।” (पृष्ठ १०५)
सच्चे प्रेम की पुकार स्पष्ट रूप में सुनाई पड़ती है कवि की इन काव्य पंक्तियों में । कवि अपने अस्तित्व को अपनी प्रेमिका के अस्तित्व में विलीन करने हेतु बेकरार हैं, व्याकुल हैं । अपने हृदय में पनपते और पलते प्रेम के रंग में सम्पूर्ण बसुधा को रंगने के लिए प्रतिबद्ध हैं । इसी आस्था और विश्वास की वाणी देने का प्रयास किया है निम्न पंक्तियों में–
प्रिय आओ ! हम और तुम मिल कर करें ! एक दूसरे के लिए आराधना !
भूल जाएं अपने अस्तित्व की । अलग पहचान को ।
रख ले अपने पवित्र प्रेम की । आस्था के विश्वास को ।
और रंग डालें । हमारी पावन आकांक्षाओं को ।
रंगभरी तूलिका से । सम्पूर्ण बसुन्धरा का परिधान । (पृ. ९६)
प्रेम की प्यास कवि को तड़पाती है । अन्तर्मन की पीड़ा को सहेजकर रखने पर भी शरीर में सिहरन की अनुभूति कराती है । शरीर सावनी फुहार में भीगने पर भी जेठ की दोपहरी की तपन से झुलस रहा है, वर्षा की शीतल पुरवैया हवा पुनः मिलन की आशा में पीर जगाती रहती है । फाल्गुन माह बांसती माह होने पर भी प्रेम की प्यास बुझाने में समर्पन होने पर कवि इस प्यास की अनुभूति का सवाल उठाने के लिए विवश है । शरीर की प्यास बुझाने में असमर्थ है । फाल्गुन माह में भी प्रेम अधूरा होने पर कवि अधीर होने पर विवश है । कवि ने इस प्रेम की अधूरी अगन को इस प्रकार अभिव्यक्ति देने में सफल हैं–
“अब फागुन में प्रीत अधूरी
सराबोर होनेवाली है
जनमों से जिस खातिर तड़पे
वह पूरी होनेवाली है
पीर पुरातन बुझ जाएगी
फिर भी
तन की प्यास सवाली । (पृ. ७७)
प्रेम के दो पक्ष हैं– संयोग और वियोग । कवि बसंत ने प्रेम के संयोग पक्ष का वर्णन बड़े मनोहर और मधुर ढंग से किया है, जो पाठकों को भी मुग्ध कर देता है । प्रेमी और प्रेमिका के मिलन का सुखद पक्ष कितना आह्लादकारी होता है और संवेदनात्मक अनुभूति की अभिव्यंजना कितनी मनमोहक होती है, इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है–
“संयोग, बिखर गयी । जिसने चीर दिया मुझे कहीं, भीतर तक ।” (पृ. ११४)
कवि बसंत ने प्यार किया है, कोई गुनाह नहीं, कोई अपराध नहीं । इसे डंके की चोट पर स्वीकार करते हुए उद्घोष करने में कोई संकोच, लाज हिचक, शर्म न कोई गिला को अनुभव करना सच्चे प्रेम की कसौटी है । वह स्वतन्त्र और स्वछन्द होकर इसका इजहार करने में भी कोई छल–छद्म या आडम्बर का अनुभव नहीं करते । जैसी उनकी कविताएं छन्दमुक्त हैं, कोई इसमे बंधन नहीं है–
“मेरी सारी राग–रागिनी । छन्दमुक्त मेरी कविताएं
नये पुराने सपनो का जग । जाग्रत रहते रात और दिन
श्वांस–श्वांस, दिल की धड़कन में । तुम ही तुम तो रची बसी हो ।
बोलो । फिर क्यों तुम आतंकित हो ? (पृ. १३५)
कवि बसंत ने प्रेमी–प्रेमिका के प्रेम तक ही अपने लगाव को सीमित नहीं रखा है । इनके प्रेम का विस्तार ईश्वर प्रेम तक पाया जाता है । उन्होंने स्वीकारा है कि उनके शब्दों में यह सामथ्र्य नहीं है कि ईश्वर के भाव रूप का वर्णन कर सके सविस्तार । उदाहरण प्रस्तुत है–
“शब्द में सामथ्र्य कहा है
ईश्वर के भाव–रूप के वर्णन की ।
इसीलिए विधाता ने यह दायित्व
नयनों को सौंपा है । (पृ. १४६)
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि बसंत चौधरी प्रकृति और प्रेम के कवि हैं । इनके काव्य रचना संसार में प्राकृतिक और प्रेमिल भावना घनीभूत है, सम्मिश्रित है ।

