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प्रधानमंत्री मोदी की लुम्बिनी यात्रा- संयोग या प्रयोग : ललित झा

 

ललित झा, आजकल विश्व कूटनीति मे प्रधानमंत्री मोदी सबसे ब्यस्ततम राजनेताओ मे से एक है जिनसे मिलने दुनियाँ के बड़े बड़े राजनेता नई दिल्ली पहुँच रहे हैं l जरूरत होने पर मोदी जी स्वयं भी भारत से बाहर कई यूरोपीय देशों के महत्वपूर्ण दौरे पर गये है जिसमे फ्रांस जर्मनी समेत यूरोप के कई अन्य देश शामिल है l रूस युक्रेन युद्ध को लेकर पूरी दुनियाँ तनाव मे है और इस युद्ध को किसी भी तरह से रोकना चाहते है l रूस युक्रेन युद्ध को रोकने के लिए हो रहे वैश्विक प्रयासों मे मोदी जी एक महत्वपूर्ण किरदार है. इसके लिये वह विश्व के सभी प्रमुख देश फ्रांस जर्मनी ब्रिटेन अमेरिका रूस तथा युक्रेन के साथ निरंतर संबाद मे व्यस्त है l इसके साथ ही भारत के पड़ोसी देशों में भी आजकल आर्थिक और राजनीतिक संकट कोहराम मचाये हुये हैं. जहाँ एक तरफ श्रीलंका मालदीव जैसे देशों में भीषण आर्थिक संकट के कारण आम जनजीवन अस्त व्यस्त है वहीं पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में राजनीतिक संकट से स्थिति बिकराल बनती जा रही है , नेपाल और बंगलादेश की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नही है ऐसे वैश्विक भूराजनीतिक परिदृश्य में मोदी का लुम्बिनी भ्रमण काफी मायने रखता है l क्योंकि हाल ही मे अप्रेल महिना मे ही नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा राजकीय भ्रमण पर नई दिल्ली गये थे जहाँ सभी द्विपक्षीय मसलों पर उनकी प्रधानमंत्री मोदी से महत्वपूर्ण बातचीत हुई थी कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुआ था.. इसके ठीक सवा महीने बाद ही प्रधानमंत्री मोदी का एक दिवसीय भ्रमण पर लुम्बिनी आना अपने आप मे काफी मायने रखता हैl कुटनीतिक विश्लेषकों के बीच आजकल यह चर्चा का विषय बना हुआ है आखिर प्रधानमंत्री मोदी के लुम्बिनी भ्रमण का उद्देश्य क्या है ? क्या यह भ्रमण महज एक संयोग मात्र है या फिर एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रयोग ??

क्या यह सिर्फ एक धार्मिक सांस्कृतिक भ्रमण था या फिर इसका कोई कुटनीतिक मकसद भी था ? इस संदर्भ में जहाँ एक तरफ भारतीय विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा का कहना है “भारत नेपाल के बीच सदियों से सभ्यतागत और पीपुल टू पीपुल संबंध बहुत प्रगाढ़ रहा है, इसी को और मजबूत बनाने की एक पहल है” l वहीँ कुछ राजनीतिक जानकारों की माने तो मोदी जी के लुम्बिनी भ्रमण के कई राजनीतिक एबम कुटनीतिक निहितार्थ है. बुद्ध जयंती पर प्रधानमंत्री मोदी का लुम्बिनी भ्रमण का मकसद था यह स्पष्ट राजनीतिक संदेश देना की महात्मा बुद्ध का जन्म लुम्बिनी मे हुआ था, इसको लेकर भारत के मन में कोई संशय नही है l क्योंकि कुछ भारत विरोधी तत्व इस विषय को लेकर अनावश्यक विवाद उत्पन्न करते रहे हैं ताकि दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबधों मे दरार उत्पन्न किया जा सके.. कई बार कुछ लोगों ने इस मुद्दे को खूब हवा भी दिया लेकिन अब यह उम्मीद किया जा सकता है कि मोदी जी के लुम्बिनी भ्रमण से यह राजनीतिक विवाद सदा के लिए खत्म हो गया है l
इस भ्रमण का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य है पूरे लुम्बिनी क्षेत्र में चीन की मजबूत उपस्थिति से उत्पन्न प्रभाव को संतुलित करना. लुम्बिनी और आसपास के क्षेत्रों में चीन की मजबूत उपस्थिति है.. वह बौद्ध धर्म का कुटनीतिक प्रयोग कर लुम्बिनी मे अपनी पहुँच तथा राजनीतिक प्रभाव को सुदृढ़ कर रहा है l सिर्फ चीन ही क्यों, दक्षिण पूर्व एशिया के कई बौद्ध धर्मावलंबी देश लुम्बिनी मे बुद्ध विहार का निर्माण किया हुआ है l बौद्ध धर्म का जन्मदाता और समृद्ध विरासत होने के बावजूद लुम्बिनी मे भारत की उपस्थिति नगण्य रही है.. यह अपने आप मे आश्चर्यजनक है कि बौद्ध धर्म में इतना समृद्ध विरासत होने के बावजूद वहाँ भारत की उपस्थिति इतनी कमजोर क्यों है ? संभवतः इसी स्थिति को बदलने हेतु मोदी जी ने अंतराष्ट्रिय बौद्ध कल्चर एंड हेरिटेज सेंटर का शिल्यानाश किया है ताकि बौद्ध धर्म से जुड़े दोनों देशों के समृद्ध विरासत को संरक्षण संबर्धन कर भारत नेपाल संबंध को नया आयाम दिया जा सके l बुद्ध सर्किट का संयुक्त विकास देशों के लिए आर्थिक एबम सांस्कृतिक रूप से काफी लाभदायक हो सकता है. मोदी के लुम्बिनी भ्रमण को कुछ लोग धार्मिक कूटनीति तो कुछ लोग सांस्कृतिक कूटनीति बता रहे हैं लेकिन इसके संदेश और संकेत काफी गहरे व व्यापक है क्योंकि मोदी का इतिहास रहा है एक साथ कई कार्यों को अंजाम देने का l उनका यह लुम्बिनी भ्रमण धर्म संस्कृति राजनीति और कूटनीति का मिला जुला एक रूप है जिसमें धर्म भी है संस्कृति भी है, राजनीति भी है और कूटनीति भी.. इसमें बौद्ध पर्यटन के असीमित विकास का सपना भी है और भूराजनीतिक निहितार्थ भी है.. लुम्बिनी भ्रमण के राजनीतिक एबम सामरिक उद्देश्यों की अगर बात की जाय तो पिछले कुछ वर्षों से ऐसा देखा जा रहा है कि चीन यद्दपि वह स्वयं धर्म को नही मानता फिर भी वह बौद्ध धर्म का अधिकतम उपयोग कर अपने राजनीतिक एबम कुटनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करने मे लगा हुआ है. दुर्भाग्य से अबतक इस क्षेत्र में भारत की उपस्थिति अत्यंत कमजोर रही है.. मोदी जी के लुम्बिनी भ्रमण से स्थिति में साकारात्मक् परिवर्तन की उम्मीद है,, देर से ही सही परंतु भारत नेपाल संबंध के लिये यह एक अच्छी पहल है l बौद्ध धर्म से संबद्ध भारत के पास बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, राजगीर, नालंदा और श्रावस्ती जैसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है, यदि इसमें लुम्बिनी को मिलाकर दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से बुद्ध सर्किट का विकास किया जाय तो इससे न सिर्फ क्षेत्र में चीन का प्रभाव कम होगा बल्कि बुद्ध कूटनीति के सहारे पर्यटन विकास को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया जा सकता है l·

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प्रधानमंत्री मोदी के विचारों से ऐसा लगता है जैसे उनके लिए नेपाल काफी मायने रखता है यदि कुछ मुद्दों को छोर दिया जाय तो अपनी नीतियों मे वह नेपाल भारत रिश्तों को कितना अहमियत देते हैं यह इस बात से पता चलता है कि वह अपने आठ वर्षों के कार्यकाल में पांचवी बार नेपाल आ चुके हैं और अभी कितनी बार और आयेंगे कुछ कहा नही जा सकता है l आठ वर्ष मे पांचवी बार नेपाल भ्रमण करना यह स्पष्ट संकेत है कि प्रधानमंत्री मोदी के मन में नेपाल के प्रति गहरा व आत्मीय लगाव है.. उन्हें हिमालय के आगोश में विराजमान बाबा पशुपतिनाथ, मोक्ष प्रदाता बाबा मुक्तिनाथ, जनकनंदिनी माता जानकी की भूमि जनकपुरधाम तथा लुम्बिनी से गहरा लगाव है तभी तो वह नेपाल की पावन धरा पर खिंचे चले आते है.. यह मोदी जी का नेपाल के प्रति प्रेम को दर्शाता है l लुम्बिनी मे आयोजित मुख्य समारोह को संबोधित करते हुये उन्होंने स्वयं कहा कि ” नेपाल भ्रमण पर आकर मुझे राजनीति से अलग, एक विशेष आध्यात्मिक अनुभूति होता है “. अपने लुम्बिनी भ्रमण को अविष्मर्णिये बताते हुये कहा.. ” ” “यहाँ की ऊर्जा, यहाँ की चेतना एक अलग ही ऐहसास देती है” l उनके इस कथन से की ” नेपाल के बिना तो हमारे श्री राम भी अधूरे है ” यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके मन में नेपाल के प्रति कितनी गहरी आस्था और लगाव है l “भारत नेपाल संबंध को उन्होंने हिमालय जैसा अटल और प्राचीन बताया “.: इस संदर्भ में जनता समाजवादी पार्टी के नेता प्रदेश सांसद राम आशीष यादव कहते हैं मोदी जी को नेपाल से गहरा आध्यात्मिक लगाव है.. वो खुद एक आध्यात्मिक व सांस्कृतिक व्यक्ति है इसलिए उनका झुकाव नेपाल के प्रति अधिक रहता है l उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से आग्रह करते हुये कहा कि “एक समृद्ध और सुखी नेपाल का सपना भारत के चातुर्दिक् सहयोग के बिना असंभव है इसलिए उन्हें भारत के विकास के साथ साथ नेपाल के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए l उन्होंने उनके लुम्बिनी भ्रमण को ऐतिहासिक भ्रमण बताया.. लुम्बिनी मे मोदी जी के आत्मियतापूर्न अच्छे weविचारों से समूचे नेपाली आम जनमानस मे साकारात्मक संदेश प्रवाहित हुआ है लेकिन कुछ कुटनीतिक विश्लेषकों के नजर में नेपाल के दृष्टिकोण से यह भ्रमण उपलब्धिमूलक नही रहा . भारतीय दृष्टिकोण से लुम्बिनी भ्रमण चाहे जितना साकारात्मक अर्थ रखता हो मगर नेपाल के दृष्टिकोण से यह कुछ खाश उपलब्धिपूर्ण नही रहा.. भारत मे नेपाल के पूर्व राजदूत रहे दीप कुमार उपाध्याय का मानना है कि “नेपाल लम्बे समय से सीमा संबंधी नक्शा विवाद का शांतिपूर्ण कुटनीतिक समाधान निकालने के लिए कुटनीतिक बातचीत की मांग करता रहा है लेकिन भारत नेपाल के इस चिर प्रतिक्षित मांग पर कोई पहल नही कर रहा है l लुम्बिनी भ्रमण के दौरान भी दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल स्तरीय वार्ता में कोई खास प्रगति नही होना दुखद है.. इसी तरह नेपाल का दूसरा चिर प्रतिक्षित मांग भैरहवा स्थित गौतम बुद्ध अंतराष्ट्रिय विमानस्थल को लेकर रहा है जिसका उसी दिन उदघाटन भी हुआ है.जिस दिन मोदी लुम्बिनी मे थे.. इस संदर्भ में भी भारत के तरफ से कोई आश्वाशन नही मिलने से नेपाल के कुटनीतिक हलकों मे कुछ मायूसी है l इस संदर्भ में सामरिक विश्लेषकों के अनुसार मोदी जी के लुम्बिनी भ्रमण का सबसे महत्वपूर्ण भूराजनीतिक संदेश यह है कि ” नेपाल को भारत की सामरिक सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशील बनना होगा .. भारत नेपाल अंतराष्ट्रिय सीमा के समीप भैरहवा एयरपोर्ट का निर्माण, चीन की नॉर्थ वेस्ट सिविल ऐवियेसन कंपनी द्वारा किया गया है जो अंतराष्ट्रिय सीमा के बिल्कुल नजदीक है.. वहाँ से गोरखपुर एयरबेस की दूरी भी ज्यादा नही है.. ऐसे में नेपाल के इस निर्णय से भारत खुश नही है “. जानकारों की माने तो प्रधानमंत्री मोदी इसलिए ही भैरहवा एयरपोर्ट पर लैंड करने के बदले सीधे लुम्बिनी मे नव निर्मित हेलिपैड पर हेलिकॉप्टर से उतरे जो अपने आप मे आश्चर्यजनक था.. वो चाहते तो अपने विशेष विमान से कुशीनगर एयरपोर्ट से सीधा भैरहवा एयरपोर्ट पहुँच सकते थे.. वो चाहते तो प्रधानमंत्री देउवा के साथ मिलकर वह भी भैरहवा अंतराष्ट्रिय एयरपोर्ट का संयुक्त रूप से उद्घाटन कर सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नही किया.. इसका संदेश स्पष्ट है नेपाल को कोई भी बड़ी व महत्वपूर्ण परियोजनाओं के निर्माण का जिम्मा चीन को देते वक्त, भारत की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखना चाहिए..

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वैसे बहुत लोगों का यह भी मानना है कि मोदी जी का लुम्बिनी भ्रमण महज एक संयोग है.. वह आध्यात्मिक एबम धार्मिक व्यक्ति है इसलिए वह वैशाख पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी आये थे.. वहीं अधिकांश लोगों का यह भी मानना है कि उनका लुम्बिनी भ्रमण एक सोची समझी कूटनीतिक प्रयोग है जिसके गहरे राजनीतिक धार्मिक, सांस्कृतिक एबम भूराजनीतिक सामरिक उद्देश्य है l बहरहाल लुम्बिनी भ्रमण का उद्देश्य चाहे जो भी हो मगर इससे पुरे नेपाल मे एक साकारात्मक संदेश गया है.. मोदी जी के आत्मियतापूर्न ओजस्वी तथा भावपूर्ण विचारों से भारत के प्रति साकारात्मक माहौल का निर्माण हुआ है. इस आत्मियतापूर्न विचारों में निरंतरता बनाये रखनी होगी अन्यथा परिणाम वही ढाक के तीन पात जैसा हो सकता है जैसा मोदी जी के पशुपतिनाथ और जनकपुर भ्रमण के बाद हुआ था l माता सीता की धरती जनकपुर के विकास के लिये मोदी जी ने एक अरब आर्थिक सहायता देने की घोषणा किया था, मंत्रमुग्ध कर देनेवाला भाषण दिया था, मगर पाँच वर्ष बितने के बावजूद, जनकपुर के लिये किया गया घोषणा अब तक घोषणा मे ही सिमटी हुयी है, जिससे आम नेपाली लोगोँ मे निराशा उत्पन्न होती है l वैसे तो किसी भी भ्रमण का अलग अलग दृष्टिकोण से विश्लेषण किया जा सकता है.. कुल मिलाकर देखें तो लुम्बिनी भ्रमण, भारत नेपाल संबंध के लिये एक अच्छी पहल है जिसके काफी दूरगामी राजनीतिक, धार्मिक एबम सांस्कृतिक उपलब्धि हाशिल् किया जा सकता है बसर्ते घोषणाओ का क्रियान्वयन सही तरीके से हो..

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