डायनासोर जैसे ही ईंसान का ईमान भी लुप्त हो रहा है :बिम्मी कालिन्दी शर्मा
” बेईमानी का कैक्टस” !

बिम्मी कालिन्दी शर्म, वीरगंज, (व्यंग्य) । सरस्वती नदी पहले ईसी धरति में बहती थी । पर वह धिरे-धिरे विलुप्त हो कर श्री बद्रीनाथ धाम के पास माणा गाँव में स्थित भीमपूल में ही रह गई हैं । अब सरस्वती नदी का प्रत्यक्ष दर्शन वंही होता है । सरस्वती नदी हम ईंसानों की अकर्मण्यता, झूट और फरेब से आजित हो कर ईस धरति से विलुप्त हो गई । ठीक वैसे ही ईस धरति से ईंसान का ईमान भी विलुप्त हो रहा है । आपको सौ में से ९९ बेईमान और एक ईमानदार मील जाए तो वह भी बहुत है । यह बेईमान कंकडो का जमाना है यंहा साबुत चावल जैसे ईमानदार लोग मिलना अब बस कोरी कल्पना है । क्योंकि ईमान को ताबुत में बंद कर के उस में कील ठोंक कर दफन कर दिया गया है ।
आपने डायनासोर को देखा है ? नहीं न मैनें भी नहीं देखा है । वह लाखों साल पहले पृथ्वी से विलुप्त हो गया । क्यो कि वह बहुत भारी भरकम था । उसके चलने से पृथ्वी डोलने लगती थी । अपने बहुत भारी शरीर के साथ जैसे तैसे चलने वाला यह डायनासोर नाम का जीव अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष नही कर पाया और धिरे धिरे पृथ्वी से विलुप्त हो गया । अब डायनासोर को हम किस्से कहानियों और सिर्फ सिनेमा में ही पढ, सुन और देख पाते है हकिकत में नहीं ।
अब डायनासोर जैसे ही लुप्त होने के कगार पर है ईंसान का ईमान । बेईमानी से भरी ईस दुनिया में ईमान भी खुद को टिकाने के लिए संघर्ष कर तो रहा है पर बेचारा टीक नहीं पा रहा है । ईक ईमान को घेर कर चारों तरफ से मक्कारी, अनैतिकता, बेईमानी और झूट ईस पर वार कर रहे हैं तो यह निहत्था ईमान कितने समय और कैसे टीक पाएगा ? ईमान की हालत अभिमन्यु जैसी हो गई है । जो बेईमानी और छल के व्यूह में फंस गया है और बाहर निकल नहीं पा रहा है । जब बाहर निकल नहीं पाएगा तो अंदर ही अंदर ईमान का मरना निश्चित है ।
आज चारों तरफ हाहाकार है । सभी को आगे बढ्ने की जल्दी है । ईस आगे बढ्ने और सफलता प्राप्त करने के चक्कर में वह अपने आगे जो खडे है उन पर वार करने या गला काट्ने से भी नहीं हिचकता । आज का ईंसान जैसे भी हो जितना चाहता है । ईसके लिए वह साम, दाम, दंड और भेद के सारे हथकंडे भी अपनाने से गुरेज नहीं करता । ‘बाई हूक बाई क्रूक’ कर के वह जैसे भी शीखर पर पहुंचना चाहता है जिसके लिए वह उसी सोपान को भी लात मारने से परहेज नहीं करता ताकि कोई दुसरा उस सोपान पर चढ न सके ।
सब से आगे होने और शीखर पर पहुंचने की होड में ईंसान ने सब से पहले अपने ईमान को ही तिलांजली दे दिया । अब वह हर गलत काम करने के लिए तैयार है जिससे उसे फायदा होता हो । ईमानदारी से न धन कमाया जा सकता है न मन मुताबिक सफलता जल्द से जल्द आपके कदम चूम सकती है । ईसी लिए ईंसान ने सब से पहले ईमान का चोला ही उतार कर फेंक दिया । अब वह निर्वस्त्र है और बेईमानी के दरिया में गोते लगा रहा है । अब नंगे नहाने वालों के लिए निचोडकर सुखाने के लिए कुछ होना भी तो चाहिए । सत्य, ईमानदारी, नैतिकता और विवेक का गला दबा कर छल और प्रपंच की गूंडागर्दी चारो और मची हूई है । अब किसी को अपने अंदर झांकने की फुर्सत नहीं है । आत्मा और ईमान दोनों ही मर चूका है ।
डायनासोर तो लाखों साल पहले लुप्त हो गया । वह विशाल जीव था अन्य जिवों का भक्षण करता था । अच्छा ही हुआ हमेशा के लिए खत्म हो गया । अब उसी के तर्ज पर ईमान भी धिरे धिरे लुप्त हो रहा है । जंहा भी देखिए ईमान नदारद है । घर, परिवार, समाज, देश और दुनिया कंही भी ईमान और नैतिकता नहीं दिखेगी । सब से ज्यादा ईमान का संकट राजनीति में हैं ईसी लिए वंहा नेता की जगह चमचे और गुंडे पनप रहे हैं । पूरे परिदृश्य से डायनासोर की तरह ईमान भी गायब है । जैसे पृथ्वी में पाए जाने वाले जिवों के बारे में जब चर्चा होगी या उनका ईतिहास लिखा जाएगा तब विलुप्त हो चूके डायनासोर के बारें में भी लिखा जाएगा । उसकी तरह मानव और समाजका जब समाज शास्त्रीय विवेचन होगा तब ईमान और मानवता का ईतिहास भी जरुर लिखा जाएगा । पर तब तक डायनासोर कि तरह यह ईमान नाम का ‘जीव’ ईस देश या दुनिया से हमेशा के लिए विलुप्त हो चूका होगा ।
डायनासोर को तो किसी ने नहीं देखा बस उसके बारे में सुना है । पर ईमान को हर दिन मरते और बेइमानी को अट्टहास करते हम हर दिन देखते और सुनने हैं । और ईस बेईमानी को मलजल कर के सिंचन हमीं लोगों ने किया है । तभी न यह बेईमानी का कैक्टस दिन दूना रात चौगुना बढ कर सब को घेर रहा है । हम बेईमानी के सेज पर सो कर सुंदर सपना देखना चाहते हैं और चाहते हैं की सत्य की सुबह से आंख खूले । पर आंख खुलेगी कैसे ईस पर तो बेईमानी की पट्टी बंधी हूई है । ईमान तो पानी की तरह बह गया और बेईमानी का रेत ही हाथ में बचा है और हम उस रेत को भी हाथ से झाडते नहीं । और बेईमानी के रेत पर तो झूट और फरेब का कैक्टस ही उगेगा न ? तो ईस कैक्टस को काटेगा कौन ?

