स्थानीय चुनाव और मधेश : वृषेशचन्द्र लाल
संसद और सरकार दोनों संविधान के द्वारा प्रदत्त नागरिकता का अधिकार भी मधेशी नागरिक को नहीं देना चाहती है और संविधान के प्रावधानों से अलग कानून के माध्यम से बन्देज लगाना चाहती है ।
वृषेशचन्द्र लाल, जनकपुर धाम । स्थानीय तह के चुनाव के परिणाम आ गये हैं । मतदान में सहभागिता और परिणामों से लोगों में राजनीतिक प्रणाली अर्थात् संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक शासन व्यवस्था के प्रति कोई दुराव नहीं देखी गई । चुनाव के परिणामों से राजतन्त्र समर्थकों के प्रति कोई दिलचस्पी जगी है ऐसा भी कहीं कुछ भी दिखाई नही दिया । निश्चय ही यह सन्तोष की बात है । परन्तु नेतृत्व , उनकी कार्यशैली, राजनीतिक दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का चरम अभाव, नेताओं की असहमति से असहिष्णुता और प्रतिशोध की भावना, चुनावों के दौरान उम्मीदवार के चयन में और प्रतिनिधित्व के अन्य अवसरों पर कार्यकर्ताओं से भेदभाव तथा खरीद–बिक्री के व्यवहार का मतदाताओं ने पूरी एकता से जम कर विरोध किया है । नेपाल के राजनीतिक दलों में तेजी से फैली इन विकृतियों के प्रति जबर्दस्त आक्रोश व्यक्त किया गया है । जहाँ–जहाँ विकल्प मिला है, लोगों ने खुल कर विकल्प के पक्ष में मत प्रदान किया है और जहाँ उन्हें अपेक्षित विकल्प नहीं मिला है, मतदाताओं ने आक्रोश व्यक्त करने का कोई न कोई अपनी ही शैली ढूढ़ निकाला है ।
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक नेपाली काँग्रेस कुल ७५३ पालिकाओं में ३२४ स्थानों पर प्रमुख या अध्यक्ष का कार्यकारी स्थान प्राप्त कर अग्र स्थान पर है । नेकपा एमाले ने २०३ और माओवादियों ने १२१ स्थान प्राप्त किया है । संविधान के घोषणा के बाद के चुनावों में लोगों ने नेपाली काँग्रेस की ढुलमुल नीति और देश के प्रमुख मुद्दों पर निर्णयहीनतापूर्ण उहापोह से तङ्ग आ कर कम्युनिस्टों को विकल्प के तौर पर चुना था । मधेश में तथाकथित मधेश केन्द्रित दलों को आगे बढ़ाया था । स्थानीय तह के सम्पन्न इस चुनाव में जनता ने कम्युनिस्टों से मोहभंग का स्पष्ट संकेत दिया है । कम्युनिस्टों का दूसरा संस्करण उपेन्द्र यादव और अशोक–बाबुरामजी की पार्टी भी जनाक्रोश का शिकार हुआ है । लोगों ने लोसपा को केपी ओली के पिछलग्गू बनने की गद्दारी पर जबर्दस्त सबक सिखाया है ।
कम्युनिस्ट नेताओं में सर्वसत्तावादी मनोविज्ञान की कार्यशैली, चरम भ्रष्टाचार के लिए सत्ता का अधिकतम दुरुपयोग, साम्यवादियों का ‘नया वर्ग’ सृजित करने का लक्ष्य, हाथ बढ़ा कर गला दबाने वाली नीति अन्तर्गत भागबन्डा की रणनीति के आधार पर अधिक से अधिक जगहों पर कब्जा जमाना, आदि कम्युनिस्टों से मोह भंग का प्रमुख कारण दिखाई दिया । कर्मचारीतन्त्र, सुरक्षा क्षेत्र, न्यायपालिका, उद्योग और व्यवसाय सम्बन्धित क्षेत्र सभी जगहों पर कम्युनिस्टों की अनुचित धावा लोगों को रास नहीं आई । वामपन्थियों के द्वारा सम्पूर्ण राज्य–प्रणाली को जिस तरह से प्रभाव में लेने का प्रयास किया गया उसे लोगों ने गम्भीरता से लिया है । संविधान निर्माण और उसके बाद के दिनों में वामपन्थियों ने जम कर उग्रराष्ट्रवाद का सहारा लिया था और लोगों को भ्रमित करने में सफल भी रहा था लेकिन धीरे–धीरे उनकी इस चाल के भीतर का खोखलापन सामने उभर कर आ गया है । वैदेशिक सुसम्बन्ध में बेमतलब अकारण नई समस्यायें सृजित करना भी इन्हें भारी पड़ा है । उग्रराष्ट्रवादी भारत विरोध के भ्रमजाल से प्राप्त तत्कालीन लाभ से वामपन्थी उत्साहित हो कर अनर्गल प्रलाप करने लगे थे । वामपन्थियों के खिलाप लोगों में देखी गई सचेतना इन अनर्थक हानिकारक गतिविधियों का अस्वीकृतिकरण भी है । इसके अलावा झूठा बड़बोलापन, संविधान को मार्गदर्शक न समझ कर शासन के लिए औजार भर समझना, देश और समाज के लिए शब्दों के अलावा कुछ कर सकने की क्षमता का अभाव और भ्रष्टाचार के लिए सत्ता का खुला अनुचित प्रयोग को भी जनमत ने नकार दिया है । एक स्वनाम धन्य नेता की सत्ता प्राप्ति के लिए जोड़तोड़ और राजनीतिक ठगी में महारती भी लोगों के बीच हास्य का विषय ही बना रहा ।
ऐसा नहीं कि लोग नेपाली काँग्रेस और इसके नेतृत्व से खुश हैं । जहाँ–जहाँ उन्हें अपेक्षाकृत ठीक–ठाक विकल्प मिला मतदाताओं ने काँग्रेस को शिकस्त देने की कोशिश की । स्थानीय तह के निर्वाचन में स्वतन्त्र उम्मीदवारों ने मतदाताओं को अपेक्षाकृत अधिक आकर्षित किया है । विजयी अधिकतर स्वतन्त्र उम्मीदवार नेपाली काँग्रेस से हैं और वे फिर से नेपाली काँग्रेस या किसी अन्य दल में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उनका विजय काँग्रेस के नेतृत्व और उनकी कार्यशैली पर हथौड़ा का पुरजोर प्रहार ही है । नेतृत्व की मनमानी, सत्ता या पकड़ के लिए वर्चस्व की मानसिकता तथा प्रमुख मुद्दों पर काँग्रेस में पसरा हुआ किंकर्तव्यविमूढता लोगों के लिए नेपाली काँग्रेस का नकारात्मक पक्ष के रूप में खड़ा रहा । इन सभी कारणों से लोगों के सामने काँग्रेस पर प्रहार या कम्युनिस्टों से दूरी के बीच एक को चुनने का सवाल खड़ा था । विकल्प मिलने पर लोगों ने दोनों पर प्रहार किया है और जहाँ परिस्थिति कुछ अलग था लोगों ने कम्युनिस्टों को दरकिनार करना ही उचित समझा है । इस से लोकतन्त्र के प्रति जनता का प्रतिवद्धता स्पष्ट दिखाई देता है । लोगों ने देश में लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की निरन्तरता की गारन्टी सुनिश्चित करने की कोशिश की है ।
मधेश और स्थानीय चुनाव
स्थानीय चुनाव को मधेश के लोगों ने महत्व के साथ और गम्भीरता से लिया है । समग्र में देखा जाय तो लोग स्थानीय नेतृत्व के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारों में उनकी जनघुलनशीलता, योजनाबद्ध स्थायी विकास के सन्दर्भ में उनकी दृष्टि, व्यवहारिक सोच तथा उम्मीदवार स्वयं की विश्वसनीयता पर अधिक ध्यान दिया है । कुछ हद तक अस्वीकार्य चरित्र और आचार को वहिष्कृत करने की कोशिश भी की गई है । यह संतोष का विषय माना जा सकता है । मधेश में कुछ दशकों से देखा जा रहा जातिवादी सिण्डिकेटी जकड़न हलांकि इस बार भी उतना ही देखा गया ।
स्थानीय तह के निर्वाचन के दौरान मधेश में मधेश आन्दोलन से परिभाषित मुद्दों की चर्चा बहुत ही कम हुई । तराई–मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के आलावा अन्य पार्टियों ने इस पर बहस के लिए जोड़ ही नहीं दिया । लोगों ने भी इस में रुचि नहीं दिखाई । यह सब से दुखद पक्ष है । यह सही है कि स्थानीय तह राजनीतिक मुद्दों से कहीं अधिक स्थानीय विकास, मानवीय सूचकांक में वृद्धि और लोगों के औपचारिक कानूनी दैनन्दिनी से सम्बन्धित है । फिर भी, राजनीतिक प्रवाह से कुछ भी बाहर और अलग नहीं है । अगर हम राजनीतिक प्रवाह को अनुकूल बनाये नहीं रखेंगे तो विकास और हर कुछ नकारात्मक दिशा की ओर ढुलक जाएगा । मधेश आन्दोलन ने समानता, पहचान तथा सम्मानयुक्त समान नागरिक अधिकार की जो बयार सृजित की है उसकी गति भी धीमी पड़ जाएगी । वर्तमान में संघीयता और स्वशासन के क्षेत्र में जो भी स्थिति है उसके बारे चाहे जो भी जो कुछ दावा कर ले लेकिन यह वास्तव में मधेश आन्दोलन, शहीदों की शहादत और आन्दोलनकारियों के रक्त की ही उपलब्धि है ।
ऐसा क्यों हुआ ? इस बार मधेशी जनता ने अपने ही मुद्दों के बारे में उम्मीदवारों से प्रतिवद्धता नहीं मांगी, क्यों ? उग्रराष्ट्रवाद के स्थान पर पहचानयुक्त विविधता से अलंकृत राष्ट्रवाद और सभी क्षेत्रों के लोगों के लिए समान अविभेदी नागरिक अधिकार हमारे लिए अहम्, अपरिहार्य और निर्विकल्प हैं । अगर हम इसके लिए सचेत नहीं रहेंगे तो वर्चस्ववाद की परत फिर से और अधिक मोटी होती चली जाएगी । फिर भी ऐसा क्यों हुआ ? कारण स्पष्ट है, मधेश ने जिस भूमिका के लिए तथाकथित मधेश केन्द्रित राजनीतिक दलों को संगठित होने के लिए समर्थन और सहयोग दिया था, उनसे ही मधेशियों में चरम निराशा है । अब तो वे दल अपने को मधेशियों का दल भी नहीं कहते । राष्ट्रीय दल का नगारा पीटते हैं । क्षेत्रीय समस्या और आवश्यकता के समाधान की राह ढूँढना तो दूर क्षेत्रीयता के नाम से ही नाक–भौं सिकोड़ते हैं । मधेश के नाम पर विगत में मधेशी जनता का समर्थन प्राप्त किए राजनीतिक दलों ने अब अपने नाम से भी ‘मधेश’ शब्द को हटा दिया है । मधेशियों को संगठित करने के बदले अपनी–अपनी पार्टियों को अपनी जात और कुटुम्ब के लिए औजार के रूप में प्रयोग किया है । किसी भी सरकार में पद प्राप्ति और पैसा के लिए मधेश के स्वनाम धन्य नेतागण नैतिकता के सभी पहलूओं को ताक पर रख कर उनके ही झोले में मधेशियों से प्राप्त मत और ताकत को उड़ेल दिया जिन्होंने निर्लज्जता से मधेश आन्दोलन का दमन किया था, शहीदों के प्राण की आहुति ली थी और शान्तिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे निहत्थे जनता पर गोलीयाँ बरसाई थी । इन नेताओं ने सत्ता स्वार्थ के लिए मधेश विद्रोह के दमन के लिए जिम्मेदार लोगों के साथ अपवित्र गठबन्धन किया । मधेश के प्रति निचले दर्जे तक असह्य मधेश विरोधी नेतृत्व का समर्थन किया । इस सन्दर्भ में देखा जाय तो सभी का चरित्र एक सा प्रमाणित हुआ है । अपने आपको मधेश का मसीहा और रहनुमा कहनेवाले भी सत्ता और सरकार के लिए बेलिहाज एक जैसा ही व्यवहार किया है ।
स्वशासन के क्षेत्र में भी मधेशी समाज को अपने ही प्रतिनिधियों से निराशा हुई है । मधेश प्रदेश में सरकार बनी मगर कोई अन्तर महसूस नहीं हुआ । प्रादेशिक सरकार किसी भी दिशा में स्पष्टता का संकेत नहीं दे सकी । क्या है लक्ष्य और प्रदेश को किस दिशा में ले जाना है सोचना भी मुनासिब नहीं समझा गया । विकास और सम्पन्नता तथा अन्य प्रदेशों से मानवीय सूचकांक में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगारी जैसे पिछड़े क्षेत्र में सुधार के लिए किसी भी विकसित रणनीति पर कभी कोई चर्चा नहीं हुई । आयोग और प्रतिष्ठानें खड़ी हुईं मगर ध्येय सक्षमता या सेवा में वृद्धि करना नहीं, अपनों को आसन पर बैठाना ही रहा । अल्पकालीन या दीर्घकालीन योजनाओं से लोग रुबरु भी न हो सके । आये दिन भ्रष्टाचार के नये–नये तरीके इजाद किये गये । बजट का निर्माण और ध्येय सिर्फ खरीद के लिए समर्पित देखा गया ताकि भरपूर कमीशन प्राप्त किया जा सके । बिना योजना और आवश्यक कानूनी व्यवस्था–प्रवन्ध के भी खरीद को आगे बढ़ा कर बजट का दुरुपयोग किया गया । इन सभी विकृतियों को रोकने की बात तो दूर पार्टी और सरकार के सभी लोग समेटने में ही लगे रहे जैसे उन्हें मालूम हो कि अवसर बस कुछ वर्षों के लिए ही है ।
मधेशियों में निराशा के ये जायज कारण हैं और इसके अलावा भी और बहुत सारे कारण होंगे । जैसे, अपनी दिशा खुद तय नहीं कर सकना, सत्ता समीकरण के लोभ से या उग्रराष्ट्रवाद से डर कर निकटतम पड़ोसी के विरोध में खामखाह शामिल हो जाना, आदि–इत्यादि । इन सभी के वावजूद मधेशी जनता का मधेश आन्दोलन के मुद्दों से विमुख होने की प्रक्रिया दुखद है । मधेश आन्दोलन का एजेन्डा महान है । यह सिर्फ मधेश के लिए ही नहीं सम्पूर्ण देश के लिए अपरिहार्य है । आज देश भर में पहचान, समावेशिता, स्वशासन, विभेद से मुक्ति के सन्दर्भ में जितनी भी बातें उठ रही हैं, उन सभी का समाधान मधेश आन्दोलन के मुद्दों के सम्बोधन से ही प्राप्त हो सकेगा । और यह सम्बोधन कराने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी मधेशियों के ही कन्धे पर है । आन्दोलन और विद्रोह जनता करती है, मगर मांगों का सम्वोधन और उपलब्धियों का संस्थायीकरण जनता की राजनीतिक संगठन एवं नेतृत्व ही करा सकता है ।
बेशक, मधेश विद्रोह के बाद से मधेशियों के नेतृत्व के आसन पर जबरन बैठे हुए लोगों ने गद्दारी की है । संगठन और राजनीतिक दल को अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति बनाने का षडयन्त्र किया है । उन्हें बदलना होगा । मधेशियों का अपना नया राजनीतिक संगठन का निर्माण करना होगा जो आन्दोलन के मुद्दों के मामले में विचलित न हो और जो मधेश से सम्बन्धित मामलों पर स्वतन्त्रता से निर्णय ले सके । राज्य की अधिकांश नीतियाँ हमेशा से मधेशियों के लिए विभेदपूर्ण रहता आया है जिसका वर्तमान में ज्वलन्त उदाहरण संसद द्वारा लम्बे समय से लम्बित नागरिकता का विधेयक है । संसद और सरकार दोनों संविधान के द्वारा प्रदत्त नागरिकता का अधिकार भी मधेशी नागरिक को नहीं देना चाहती है और संविधान के प्रावधानों से अलग कानून के माध्यम से बन्देज लगाना चाहती है । मधेशी दक्षिणी सीमा पर हैं तो जरुरी है कि भारत से हमारा सम्बन्ध हर वक्त सद्भाव और सौहार्द्रपूणर््ा हो तथा दक्षिणी क्षेत्र की जनजीविका और इसकी परम्परागत शैली पर कोई प्रतिकूल असर न पड़े । इसके लिए भी मधेशियों का अपना सशक्त राजनीतिक दल का होना आवश्यक है ।
संघीय संरचना क्षेत्रीय अवधारणा पर आधारित होता है । क्षेत्रीय समस्याओं की पहचान और उसके समाधान के उपाय को परिभाषित किए बिना क्षेत्रीय अर्थात प्रादेशिक स्वशासन सम्भव नहीं हो सकता और यह कार्य स्वच्छ क्षेत्रीयता के आभाव में फलित नहीं हो सकती । अतएव, इसके लिए भी मधेशियों का अपना सुसंगठित संस्थागत राजनीतिक दल का होना जरुरी है । मधेशियों को इस तथ्य और वास्तविकता पर गम्भीर होना चाहिए ।


