Fri. May 22nd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

निर्वासित तिब्बतीयोका स्वतन्त्र आन्दोलन और दलाई लामाका औतार : नारद मधेसी

 

नारद मधेसी, बिरगंज । निर्वासित तिब्बतियों की राजधानी के रूप में पूरी दुनिया में विख्यात मैकल्योडगंज में लोग अभी इस बात को लेकर काफी खुश हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने लोकतांत्रिक राष्ट्रों को एक साथ बिठाकर वैचारिक रूप से चीन की तगड़ी घेरेबंदी कर दी है। हिमाचल प्रदेश के इस ठेठ पहाड़ी कस्बे में बहुसंख्यक स्थिति वाली तिब्बती आबादी को यकीन है कि आने वाले कुछ वर्षों में तिब्बत की स्वायत्तता को लेकर चीन लगातार कठघरे में रहेगा । सन २०२१ नवंबर महीने में चीन सरकारका ऐसा बयान आया था कि दलाई लामा से अगर उसकी कोई बात होती है तो वह तिब्बत की स्थिति को लेकर नहीं, स्वयं दलाई लामा की स्थिति को लेकर ही होगी । फिर भी तिब्बतियों को ऐसा लगता है कि चीन सरकार और दलाई लामा के बीच अगर कोई बातचीत होती है तो उनके हालात अभी से कुछ बेहतर ही होंगे

 

बहरहाल, निर्वासित और प्रवासी तिब्बती बौद्धिकों से बात करने पर इसके समानांतर यह चिंता भी देखने को मिलती है कि दलाई लामा की अवस्था अब ज्यादा हो रही है, चीन से गतिरोध भंग उनके स्वस्थ रहते ही हो जाना चाहिए। ध्यान रहे, चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो (पूर्व नाम ल्हामो थोंडुप, जन्मतिथि ६ जुलाई १९३५) अभी अपने जीवन के ८७ वें साल में चल रहे हैं। वायसराय लार्ड एल्गिन का ग्रीष्मकालीन आवास मार्टिमर हाउस, जो बाद में लाहौर के लाला बशेशरनाथ की कोठी कहलाया, पिछले ६१ वर्षों से भारत में उनका निवास स्थान है । असल में यह एक पूरी की पूरी पहाड़ी है, जिसके चारो ओर बने परिक्रमा पथ पर आप हर सुबह सैकड़ों लोगों को परम पावन दलाई लामा की प्रदक्षिणा करते देख सकते हैं । वे सभी तिब्बतियों के आराध्य हैं, लेकिन निर्वासित तिब्बतियों के लिए तो वे जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों पक्षों की धुरी हैं । उनकी चिंताका अंदाजा हम कैसे लगा सकते हैं?

अभी लगभग डेढ़ लाख तिब्बती चीन से बाहर रह रहे बताए जाते हैं, जिनमें एक लाख के आसपास भारत में हैं । तीन लहरों में उनका तिब्बत से बाहर निकलना हुआ । एक लहर दलाई लामा के साथ ही, यानी उनके आने के एक साल के अंदर तिब्बत से निकल आई और भारत के अलावा नेपाल और भूटान में जा बसी । फिर दूसरी लहर तंग श्याओ फिंग के उभार के बाद तिब्बतको कारोबार के लिए सभी चीनियों और और पर्यटन के लिए विदेशियों के आगे खोल देने के साथ आई और १९८० से लेकर जून १९८९ में पेइचिंग के थ्येनआनमेन चौक पर छात्रों के दमन के समय तक जारी रही । फिर तीसरी और कम गति वाली लहर १९९५ से अब तक जारी है, जिसके तहत कोई अपने बच्चेको तिब्बती संस्कृति से परिचित कराने के लिए धर्मशाला में चल रहे तिब्बतन विलेज स्कूल में भेज देता है तो कोई किसी पश्चिमी देश में नौकरी या कारोबार करने के नाम पर निकलता है और वापस तिब्बत अपने घर नहीं लौटता।

यह भी पढें   आज का मौसम

कलोन त्रिपा और सिक्योंग

दलाई लामा अपने भारत आगमन के समय से ही इस बात को ध्यान में रखकर चल रहे हैं कि तिब्बत का मुद्दा उनके इर्दगिर्द नहीं घूमना चाहिए । इस सोच के तहत ही उन्होंने पहले धीरे–धीरे करके अपनी राजनीतिक और कूटनीतिक जिम्मेदारियां चुने हुए तिब्बती प्रतिनिधियों को सौंपीं, फिर पिछले दस वर्षों में ऊपरी देखरेख के काम से भी अपने हाथ खींच लिए । जब तक निर्वासित तिब्बतियों के प्रशासन (सेंट्रल तिबतन एडमिनिस्ट्रेशन) में उनकी शीर्ष भूमिका थी तब तक इसमें प्रधानमंत्री जैसा ‘कलोन त्रिपा’ नाम का एक पद हुआ करता था। लेकिन २०११ के बाद से प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे पद ‘सिक्योंग’ पर आसीन व्यक्ति दुनिया भर के निर्वासित तिब्बतियों का प्रतिनिधित्व करता है । यह शासन प्रणाली संसद और सिक्योंग के बीच विभाजित है । सिक्योंग अपने प्रतिनिधिमंडल (कशाग) का सदस्य किसी को भी बना सकता है। वह और उसके मंत्री संसद के सदस्य नहीं होते। हां, मंत्रिमंडल के हर सदस्य का संसद से अनुमोदन कराना सिक्योंग के लिए जरूरी है। ऐसा न हो पाने पर दूसरा नाम देना पड़ता है।

संसद एक–सदनीय है और इसमें द्धछ सदस्य होते हैं। दश—दश तिब्बत के तीनों क्षेत्रों ऊ–त्सांग, अम्दो और खम से, दो–दो तिब्बत के पांचो धार्मिक पंथों गेलुग, साक्या, काग्यू, न्यिंग्मा और बोन से, दो–दो यूरोप और अमेरिका से और एक आस्ट्रेलेशिया से, जिससे भारत, नेपाल और भूटानको अलग रखा जाता है । जाहिर है, यह एक अत्यंत वैविध्यपूर्ण और कमोबेश अंतरराष्ट्रीय मिजाज की संसद है। १६० या इससे ज्यादा प्रवासी तिब्बती जहां रहते हों, उस जगह को तिबतन सेटलमेंट मान लिया जाता है। ऐसे घड सेटलमेंट भारत में हैं। चुनाव में हर व्यक्ति एक वोट संसद के लिए और एक सिक्योंग के लिए डालता है। शक्तियों का यह विभाजन काफी सोच–विचार के बाद बनाया गया है। लेकिन इसे बनाते हुए शायद इस पहलू पर कम सोचा गया था कि जो व्यक्ति संसद के लिए अपने धर्म या क्षेत्र के दायरे में रहकर वोट डालता है, वही सिक्योंग की वोटिंग के लिए अखिल तिब्बती दिमाग कहां से लाएगा?

यह भी पढें   श्रम मंत्रालय के कर्मचारियों के लिए नया आचारसंहिता लागू

यह समस्या इस बार कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गई और तिब्बतियों को डर है कि आज जब उन्हें एकता की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब वे कहीं एक चुकी हुई, छितराई ताकत बनकर न रह जाएं। भारत में ही जन्मे, समान उम्र वाले, दूसरी पीढ़ी के दो निर्वासित तिब्बती राजनेताओं के बीच पिछले कुछ वर्षों से बुरी तरह ठनी हुई है। दस साल सत्ता में रहे पिछले सिक्योंग लोबसांग सांगे एक फुलब्राइट स्का‘लर हैं। वे दार्जिलिंग में जन्मे, पिता के साथ वहीं छोटी–मोटी दुकानदारी की और स्का‘लरशिप पर अमेरिका जाकर वहां एक कानूनविद के रूप में खुद को स्थापित किया। वे ऐसे अकेले तिब्बती राजनेता हैं, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने वाइट हाउस में अपने साथ डिनर के लिए बुलाया। यह पिछले सितंबर की ट्रंपकालीन घटना है। लोबसांग सांगे के पिता तिब्बत के दक्षिण–पूर्वी खम क्षेत्र के निवासी थे। दूसरी ओर हैं मौजूदा सिक्योंग पेन्पा त्सेरिंग, जिन्होंने कर्नाटक के बैलाकुप्पे इलाके में पैदा होकर बेंगलूरु में तिब्बत समर्थक छात्र आंदोलन चलाए हैं। उनके पिता तिब्बत के उत्तर–पूर्वी प्रांत अम्दो के रहने वाले थे।

 

पेन्पा त्सेरिंग२००८ से २०१६तक प्रवासी तिब्बती संसद के स्पीकर थे, फिर उन्हें एक साल के लिए अमेरिका में दलाई लामाका प्रतिनिधि बनाकर भेज दिया गया। २०१६में ही उन्होंने लोबसांग सांगे के खिलाफ सिक्योंग का चुनाव लड़ा था और दोनों के बीच चुनाव प्रचार के दौरान काफी कटुता पैदा हो गई थी। कारण यही रहा हो या कोई और, लेकिन पेन्पा त्सेरिंग पर अमेरिका में चंदे की कुछ पावती दर्ज न करने का आरोप लग गया। इसके तहत वे पद से हटा दिए गए या खुद हट गए लेकिन इतना तय हो गया कि अगले चुनाव में और ज्यादा फुलझडÞियां छूटेंगी।

लटकी हुई कशाग

गतसाल जनवरी में चुनाव हुए तो लोबसांग सांगे तीसरी बार नहीं लड़े, फिर भी माहौल बहुत कड़वा हो गया। चुनाव का स्वरूप अम्दो बनाम खम वाला बना, हालांकि इस बारे में बाहर कोई चर्चा नहीं हुई। कुल टद्ध हजार के लगभग वोट पड़े, जिसमें घद्ध हजार के आसपास वोट पाकर पेन्पा त्सेरिंग सिक्योंग बन गए। लेकिन संसद का हाल यह हुआ कि कुल ४५ में से २२ सदस्य खम के निकल आए। १० खम वाले तो थे ही, पंथों के चुनाव में भी सारे खम वाले आ गए और विदेश से आए प्रतिनिधियों में भी दो या तीन खम के निकल आए। नतीजा यह कि सरकार चलना मुश्किल है।

यह भी पढें   नीतियां और कार्यक्रम - महज़ परंपरा का विस्तार : विनोद कुमार विमल

पेन्पा त्सेरिंग का मंत्रिमंडल ७ सदस्यों का होना चाहिए, जिसमें ३ पर ही वे संसद की मोहर लगवा पाए हैं। ये तीनों मंत्री महिलाएं हैं। दो का नाम संसद ने खारिज कर दिया और दो पर मतदान के समय संसद का कोरम ही पूरा नहीं हुआ। नियमतः मतदान के समय संसद की कुल सदस्य संख्या का दो तिहाई यानी ३० सांसद सदन में होने चाहिए। सिर्फ १६ सांसदों के बहिर्गमन से वोटिंग नहीं हो पाती। ऐसे में हालत यह है कि सिक्योंग अगर कभी बाएं चल रहे होते हैं तो संसद दाएं कदमताल कर रही होती है। राष्ट्रपति जैसे सर्वसमावेशी पदों पर बैठे लोग क्षेत्रीयता की बात आम तौर पर नहीं करते। तिब्बती राजनेताओं की तो ट्रेनिंग ही कूटनीतिक दायरों में होती है, लिहाजा उनसे ऐसी उम्मीद बिल्कुल नहीं की जाती। लेकिन पेन्पा त्सेरिंग ने बातचीत में खम क्षेत्रवाद के खिलाफ खुलेआम बात की।

अभी अमेरिका के नेतृत्व में लोकतांत्रिक देशों और चीन के बीच चौदहवें दलाई लामा की विरासत को लेकर तीखी बहसबाजी चल रही है।२०२० में अमेरिका ने बाकायदा एक कानून बनाया कि चौदहवें दलाई लामा का अवतार कहां और कैसे होगा, यह तय करना पूरी तरह तिब्बतियों के दायरे की बात है और इस संबंध में उन्हीं का फैसला अंतिम होगा। कोई और शक्ति इसमें हस्तक्षेप करती है तो उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। उधर चीन इस बात को लेकर अड़ा हुआ है कि दलाई लामा के नाम पर मोहर लगाने का काम हमेशा से उसकी सरकार ही करती आई है और आगे भी वही करेगी, किसी और को इसमें हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है। खैर, यह तो बाद की बात है, जब चौदहवें दलाई लामा अपने नश्वर शरीर से मुक्ति पा चुके होंगे। इससे पहले और इसके थोड़ा बाद तक हर मोर्चे पर तिब्बत की दावेदारी जताने का जिम्मा निर्वासित तिब्बतियों को ही करना है। लेकिन उनकी राजनीति अभी इतने तीखे टकराव से गुजर रही है कि इसका हल उनकी प्राथमिकता में सबसे ऊपर होना चाहिए।दलाई लामा के ‘अवतार’ लेने के सवाल साथ ही, तिब्बत एक बार फिर बना अमेरिका–चीन विवाद का मुख्य मुद्दा !

नारद मधेशी

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *