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प्रथम दक्षिण–एशिया–गान : कूटनीतिज्ञ अभय कुमार की प्रस्तूति

south-asiaकुमार सच्चिदानन्द,२४ नवम्बर २०१३  ,सूचना–क्रांति के घटित होने और तकनीक के आशातीत विस्तार के कारण सम्पूर्ण विश्व एक गाँव के रूप में परिवर्तित हो गया है । मानव–मानव बीच की भौतिक दूरियाँ घटी हैं । विभिन्न देशों तथा इसके नागरिकों के बीच अन्तर्सम्बन्ध बढ़े हैं । यह सच है कि विश्व के विभिन्न देशों में आपसी वैर और कटुता है, लेकिन व्यक्ति के स्तर पर यह इतना गहरा नहीं है जितना दिखलाई देता है, यही कारण है कि विभिन्न स्तरों पर विभिन्न देश विभिनन रूपों में संगठित हैं और यह संगठन किसी न किसी रूप में आपस में अपनत्व की भावना फैलाता है । स्म्पूर्ण विश्व का भी एक साझा मंच है । लेकिन अन्ततः हम मानव हैं और मानवता का सम्मान करना हमारा धर्म है । यही एक सूत्र है जो निजत्व–परत्व से अलग हटकर जन–जन को बाँधता है । प्रायः देशों के अपने–अपने राष्ट्रीय गान हैं जिसका सम्मान उस देश के नागरिकों का नैतिक दायित्व होता है । इसलिए वैश्विक स्तर पर भी एक ‘विश्व–गान’ या ‘पृथ्वी–गान’ की आवश्यकता महसूस की जा रही है । यद्यपि इस दिशा में कोई सर्वस्वीकृत परिणाम तो नहीं आए हैं, लेकिन भारतीय दूतावास के युवा कूटनीतिज्ञ एवं बहुभाषी कवि अभय कुमार ने अपने स्तर से इस अभाव को पूरा करने का प्रयास किया है और एक ‘पृथ्वी–गीत’ का नमूना भी प्रस्तुत किया है । इसी तरह उनका चिन्तन है कि दक्षिण एशिया का भी एक सर्वमान्य गान हो जो इससे सम्बद्ध देशों तथा इसके नागरिकों को एक सूत्र में बाँधे । इस उद्देश्य से उन्होंने एक ‘दक्षिण–एशिया–गान’ की रचना की है जिसकी भाषा हिन्दी है और नेपाल के संगीतकार ने इसका संगीत दिया है । दक्षेस से सम्बद्ध देशों के भौगोलिक, प्राकृतिक और भाषिक विशेषताओं को संकेतित करते हुए इसकी रचना की गई है । यद्यपि इतने देशों की विशेषताओं को एक लघुगीत में संयोजित करना कठिन है, तथापि उन्होंने ऐसा किया है और एक तरह से ‘गागर में सागर भरने’ की उक्ति चरितार्थ की है । यह अपेक्षा की जा रही है कि दक्षेस सम्मेलन इसे ‘दक्षेस–गान’ के रूप में स्वीकार करे । इस गान को सर्वप्रथम नेपाल से प्रकाशित हिन्दी मासिक ‘हमालिनी’ के वेबसाइट पर प्रकाशित किया गया ।
हिमालय से  हिन्द तक, इरावती से हिन्दकुश, महावेलि से  गंगा  तक,   सिन्धु से ब्रह्मपुत्र
लक्षद्वीप,  अण्डमान,  एवरेष्ट,   आदम्स पीक काबुल  से  थिम्पू  तक,     माले  से  रंगून
दिल्ली–ढाका, कोलम्बो काठमाण्डू, इस्लामावाद हर कदम साथ–साथ,    हर कदम साथ–साथ
उर्दू,  बर्मी  धीवेही,     हरकदम  साथ–साथ अपनी अपनी  पहचान,  अपने–अपने अरमान
शान्त की  बात–बात,  हर कदम साथ–साथ  ,   हर कदम साथ–साथ,   हर कदम साथ–साथ,  हर कदम साथ–साथ,हर  कदम साथ–साथ । Abhay K. b&W

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