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सनातन धर्म-संस्कृति का पुनरुत्थान’ विषय पर वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय विचार-गोष्ठी आयोजित



नारनौल। भारत अपने धार्मिक सौष्ठव और सांस्कृतिक वैभव के कारण ही विश्वगुरु कहलाता था तथा इन्हीं के बल पर अब पुनः विश्व-नायक बनने की ओर अग्रसर है। यह कहना है मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल के निदेशक और राष्ट्रवादी चिंतक डॉ विकास दवे का। मनुमुक्त ‘मानव’ मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा ‘सनातन धर्म-संस्कृति का पुनरुत्थान’ विषय पर आयोजित वर्चुअल अंतरराष्ट्रीय विचार-गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि भारत में सनातन धर्म-संस्कृति के पुनरुत्थान की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है, अब इसके प्रभाव से विश्व भी अछूता नहीं रहेगा। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा) के कुलपति डॉ रमेश यादव ने कहा कि सनातन धर्म एवं संस्कृति प्रकृति और विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इसीलिए भारत पर विश्व का विश्वास बढ़ा है तथा विश्व शांति के प्रयासों में भारत की भूमिका बढ़ती जा रही है। पोर्ट ऑफ स्पेन (त्रिनिडाड) स्थित भारतीय दूतावास के द्वितीय सचिव डॉ शिवकुमार निगम, त्रिभुवन विश्वविद्यालय, काठमांडू (नेपाल) की प्रोफेसर डॉ श्वेता दीप्ति, टोरंटो (कनाडा) की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘वसुधा’ की संपादक डॉ स्नेह ठाकुर, बैंकॉक (थाईलैंड) की वरिष्ठ लेखिका शिखा रस्तोगी और क्वार्टर बोरंस (मॉरीशस) की वरिष्ठ साहित्यकार अंजू घरभरन ने भी, विशिष्ट वक्ता के रूप में, सनातन धर्म एवं संस्कृति की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए, इसे आदर्श जीवन-पद्धति और कल्याणकारी मानव-धर्म बताया। इससे पूर्व विषय-प्रवर्तन करते हुए चीफ ट्रस्टी डॉ रामनिवास ‘मानव’ ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को विश्व में सर्वश्रेष्ठ एवं पूर्ण वैज्ञानिक बताते हुए कहा कि हिंदुओं में तो अपने धर्म और संस्कृति के प्रति गौरव तथा स्वाभिमान की भावना बढ़ ही रही है, बढ़ती कट्टरता और आतंकवाद, युद्धों की विभीषिका तथा कोरोना के प्रकोप के दौर में पूरे विश्व में भी भारतीय धर्म और संस्कृति के महत्त्व एवं उपयोगिता को बड़ी गंभीरता से स्वीकार किया गया है। इस अवसर पर नरेश नाज़, पटियाला (पंजाब), कल्पना लालजी, वाक्वा (मॉरीशस) और डॉ कमला सिंह, सेनडियागो (अमेरिका) ने भी अपनी कविताओं के माध्यम से, सनातन धर्म और संस्कृति का गौरव-गान करते हुए, उनके महत्त्व को रेखांकित किया। ट्रस्टी डॉ कांता भारती द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत तीन घंटों तक चली इस विचारोत्तेजक संगोष्ठी में विश्वबैंक, वॉशिंगटन डीसी (अमेरिका) की अर्थशास्त्री डॉ एस अनुकृति और प्रोफेसर सिद्धार्थ रामलिंगम, कोलंबो विश्वविद्यालय, कोलंबो (श्रीलंका) की प्रोफेसर डॉ अंजलि मिश्रा, नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान, काठमांडू की पत्रिका ‘समकालीन साहित्य’ के संपादक डॉ पुष्करराज भट्ट, काठमांडू (नेपाल) की अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘हिमालिनी’ के प्रबंध-संपादक सच्चिदानंद मिश्र, सिंघानिया विश्वविद्यालय, पचेरी बड़ी (राजस्थान) के कुलपति डॉ उमाशंकर यादव, गुजरात सिंधी अकादमी, अहमदाबाद के पूर्व अध्यक्ष डॉ हूंदराज बलवाणी, हरियाणा बाल-कल्याण परिषद्, चंडीगढ़ के नोडल अधिकारी विपिन शर्मा, भारत विकास परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रकुमार शर्मा और कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) के वरिष्ठ साहित्यकार रमेशचंद मस्ताना के अतिरिक्त हिसार के डॉ राजेश शर्मा, डॉ जितेंद्र पानू, आरजू शर्मा, सुमित राय, शेख नियाज़, अक्षय दुहन, संजय धोलपुरिया, अंजूबाला स्वामी, सुषमा रानी और आशा राठौड़, नारनौंद के बलजीत सिंह और राजबाला ‘राज’, सोनीपत के डॉ विजयकुमार वेदालंकार, पलवल की सुमन भाटी तथा नारनौल के हिम्मत सिंह, राजीव गौड़, नीलम सोनी, शर्मिला यादव, प्रिं विरेंद्र कुमार आदि की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही।



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