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कालिदासजी के प्रत्येक साहित्य कृती में हिमालय का स्थान अनिवार्य है : डा असावरी बापट

 

काठमांडू, 3 जुलाई । 1जुलाई को कालिदास दिवस पर “कालिदास और हिमालय” विषय पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम स्वामी विवेकानन्द संस्कृति केंद्र भारतीय दूतावास द्वारा केंद्र के हाल में ही आयोजन था।

इस अवसर पर स्वामी विवेकानन्द संस्कृति केंद्र के निदेशक डा असावरी बापट ने कहा कि कालिदास जो कविकुलगुरु, कविशिरोमणी ऐसी उपाधियों से भारतीय साहित्य जगत के साथ साथ विश्व में भी विख्यात है। डा असावरी ने कहा कि कालिदासजी के प्रत्येक साहित्य कृती में हिमालय का स्थान अनिवार्य है।

उन्होंने आगे बताया कि अपने महाकाव्य कुमारसंभव के प्रारंभ में ही हिमालय को देवतात्मा उपाधी देकर हिमालय का महत्व स्पष्ट किया है। कालिदास प्रत्येक शब्द का उपयोजन विचार पूर्वक करतें हैं। वैसे देखा जाए तो हिमालय पत्थर तथा मिट्टी का पर्वत हैं परंतु आत्मतत्त्व स्थापित होने के कारण मनुष्य के सारे व्यवहार और भावानाओं का प्रकटीकरण संभव हो जाता है। ये आत्मा भी कोई सामान्य नहीं है अपितु देवतात्मा हैं। जगज्जननी पार्वती और जगत के पिता महेश जैसे दामाद प्राप्त होने के लिए कोई असामान्य व्यक्ति का होना आवश्यक है जो देवतात्मा से संभव हो जाता है। कुमारसम्भव महाकाव्य में एक विशाल नाट्य है ओर उस नाटक का रंगमंच हिमालय से लेकर स्वर्ग तक है। कालिदास की प्रत्येक साहित्यकृती में हिमालय है। देवतात्मा हिमालय का देवलोक स्वर्ग से नित्य संबंध है।
ऋग्वेद में भी हिमालय कि इस महत्ता को बताते कहा है, ‘यस्येमे हिमवन्तो महित्वा ‘ हिमालय के हिमाच्छादित उत्तुंग शिखर सर्वश्रेष्ठ ईश्वर की महिमा को अभिव्यक्त करते हैं।

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डा काशीनाथ न्यौपाने

विषय के मुख्य वक्ता के रूप में प्रा. डॉ. काशिनाथ न्यौपाने जी ने कालिदास की श्रेष्ठता बताते समय ‘पुरा कवीनां गणनाप्रसंगे…’ इस श्लोक को उद्धृत करके अनामिका कैसे सार्थवती हो गई इसकी रोचक कहानी बताई। आषाढ़ मास के पहले दिन कालिदास दिवस क्यों मनाया जाता है इसकी चर्चा की। कालिदास के प्रत्येक साहित्यकृती का सुमधुर शब्दों में अल्प परिचय दिया। मेघदूत का परिचय देते समय ‘वक्र: पन्था यद्यपि …’ ऐसे कहकर उज्जैनी जाना मेघ के लिए कितना आवश्यक है इस की चर्चा की। यक्ष के हाथ से सुवर्ण कंकण गिर गया है जो पत्नी विरह में दुर्बल हो गए यक्ष का परिचायक है ऐसे बताकर चित्र में ही सही लेकिन अपनी पत्नी को मिलने का प्रयास करने के लिए यक्ष धातुरागों से पत्नी का चित्र बनाने का प्रयास करते है किन्तु उनके आंखों से निरन्तर बहनें वाले आंसुओं के कारण यक्ष उस सौभाग्य से वंचित रहते है ये सारा कथाभाग उद्धृत किया।

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कुमारसंभव महाकाव्य में स्वयं शिव कैलाश पर रहते हैं, पार्वती ने उनकी प्राप्ति के लिए कैलाश पर्वत पर ही कैसे तप किया इसकी चर्चा के साथ प्रत्येक साहित्यकृती में हिमालय कैसे आ जाता है वो भी बताया।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए पीआईसी के श्री सत्येन्द्र दहिया ने कालिदास का संक्षिप्त परिचय दिया था। कार्यक्रम में पीआईसी प्रमुख श्री नवीन कुमार की उपस्थिति थी ।

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