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किस धर्म को मानते थे शिंजो आबे ? जानिए क्या है शिंतो धर्म

 

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे शिंतो धर्म को मानने वाले थे. ये जापान का सबसे पुराना धर्म है, जिसे जापान जनजातीय धर्म भी माना जाता है. ये ईसा के करीब 300 साल पुराना है. जापान का ये सबसे बड़ा धर्म भी है. वहां बौद्ध धर्म दूसरे नंबर पर आता लेकिन दोनों धर्म आपस में इस तरह सद्भाव रखते हैं कि दोनों एक साथ ही अपने त्योहार और तौरतरीके मनाते हैं. आप हैरान हो सकते हैं कि ज्यादातर शिंतो धर्म मानने वालों का अंतिम संस्कार बौद्ध रीतिरिवाज से होता है. शायद शिंजो आबे का दाहसंस्कार और अंतिम पूजा अर्चना बौद्धिज्म से ही हो.

ऐसा नहीं है कि जापान में शिंतो धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार नहीं होता. ये बहुत कम होता है. खासकर शिंतो धर्म के पुजारियों और इसके कुछ खास वर्ग के लोगों का. यही इस बात को बताता है कि जापान में किस तरह शिंतो और बौद्ध धर्म ने साथ मिलकर आगे चलना सीखा है. बौद्ध धर्म के साथ इसका काफ़ी मेल मिलाप हुआ है और इसमें बौद्ध धर्म के कई सिद्धान्त जुड़कर झेन सम्प्रदाय शुरू हुआ. जो अब काफी लोकप्रिय है. शिंतो धर्म के देवी-देवताओं को कामी कहा जाता है. हर कामी किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है.
ऐसा नहीं है कि जापान में शिंतो धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार नहीं होता. ये बहुत कम होता है. खासकर शिंतो धर्म के पुजारियों और इसके कुछ खास वर्ग के लोगों का. यही इस बात को बताता है कि जापान में किस तरह शिंतो और बौद्ध धर्म ने साथ मिलकर आगे चलना सीखा है. बौद्ध धर्म के साथ इसका काफ़ी मेल मिलाप हुआ है और इसमें बौद्ध धर्म के कई सिद्धान्त जुड़कर झेन सम्प्रदाय शुरू हुआ. जो अब काफी लोकप्रिय है. शिंतो धर्म के देवी-देवताओं को कामी कहा जाता है. हर कामी किसी न किसी प्राकृतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है.
ऐतिहासिक तौर पर शिंतो धर्म को 6वीं सदी में मान्यता मिली. एक जमाने में शिंतो धर्म जापान का राजधर्म हुआ करता था. इसमें जापान के राजा को प्रधान गुरु मानते थे किन्तु दूसरे विश्व-युद्ध के बाद से ऐसा करना बन्द कर दिया गया. समुराई इसी धर्म को मानते हैं.
ऐतिहासिक तौर पर शिंतो धर्म को 6वीं सदी में मान्यता मिली. एक जमाने में शिंतो धर्म जापान का राजधर्म हुआ करता था. इसमें जापान के राजा को प्रधान गुरु मानते थे किन्तु दूसरे विश्व-युद्ध के बाद से ऐसा करना बन्द कर दिया गया. समुराई इसी धर्म को मानते हैं.

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जापान के शिंतो धर्म की ज्यादातर बातें बौद्ध धर्म से ली गई थीं, फिर भी इस धर्म की अलग पहचान है. मान्यता थी कि जापान का राज परिवार सूर्य देवी अमातिरासु ओमिकामी से उत्पन्न हुआ है. इस देवी शक्ति का वास नदियों, पहाड़ों, चट्टानों, वृक्षों कुछ पशुओं और खासतौर पर सूर्य और चंद्रमा आदि किसी में भी हो सकता है. पहले प्राकृतिक शक्तियों, महान व्यक्तियों, पूर्वजों तथा सम्राटों की भी उपासना की जाती थी लेकिन बौद्ध धर्म के प्रभाव से सारी रूढि़यां छूट गईं.
जापान के शिंतो धर्म की ज्यादातर बातें बौद्ध धर्म से ली गई थीं, फिर भी इस धर्म की अलग पहचान है. मान्यता थी कि जापान का राज परिवार सूर्य देवी अमातिरासु ओमिकामी से उत्पन्न हुआ है. इस देवी शक्ति का वास नदियों, पहाड़ों, चट्टानों, वृक्षों कुछ पशुओं और खासतौर पर सूर्य और चंद्रमा आदि किसी में भी हो सकता है. पहले प्राकृतिक शक्तियों, महान व्यक्तियों, पूर्वजों तथा सम्राटों की भी उपासना की जाती थी लेकिन बौद्ध धर्म के प्रभाव से सारी रूढि़यां छूट गईं.

शिंतो धर्म में शुद्धता सर्वोपरी है, लिहाजा नहाने के ऐसे त्योहार भी होते हैं) जब शिंतो धर्म के कुछ लोगों को लगने लगा कि कहीं ऐसा ना हो जाए कि बौद्ध धर्म उनके धर्म की पहचान ही खत्म ना कर दे तब 1868-1912 में शिंतो धर्म ने बौद्ध विचारों से स्वतंत्र होकर अपने धार्मिक मूल्यों की फिर व्याख्‍या और स्थापना की. इसे जापान का ‘राज धर्म’ बना दिया गया. शिंतों धर्म में नीति और नियमों का कोई उल्लेख नहीं मिलता और ना ही इसके विधि-विधान या क्रियाकांड के कोई ग्रंथ है. इसकी जरूरत इसलिए महसूस नहीं हुई, क्योंकि उनके विचार से प्रत्येक जापानी नीति और अनुशासन के मार्ग पर चलता ही है. जापानी मानते थे कि उनका हर काम या नियम ईश्‍वर द्वारा ही तय है.
(शिंतो धर्म में शुद्धता सर्वोपरी है, लिहाजा नहाने के ऐसे त्योहार भी होते हैं) जब शिंतो धर्म के कुछ लोगों को लगने लगा कि कहीं ऐसा ना हो जाए कि बौद्ध धर्म उनके धर्म की पहचान ही खत्म ना कर दे तब 1868-1912 में शिंतो धर्म ने बौद्ध विचारों से स्वतंत्र होकर अपने धार्मिक मूल्यों की फिर व्याख्‍या और स्थापना की. इसे जापान का ‘राज धर्म’ बना दिया गया. शिंतों धर्म में नीति और नियमों का कोई उल्लेख नहीं मिलता और ना ही इसके विधि-विधान या क्रियाकांड के कोई ग्रंथ है. इसकी जरूरत इसलिए महसूस नहीं हुई, क्योंकि उनके विचार से प्रत्येक जापानी नीति और अनुशासन के मार्ग पर चलता ही है. जापानी मानते थे कि उनका हर काम या नियम ईश्‍वर द्वारा ही तय है.

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शिंतो तीर्थ स्थल व मंदिर भव्य होते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इन भव्य मंदिरों में देवता वास करते है. इसमें शुद्धता की ओर बहुत ध्यान है, लिहाजा शिंतो धर्म के लोग नियमित तौर पर नहाने के बाद ही घर के मंदिरों से लेकर सार्वजनिक मंदिरों में पूजा करते हैं. मंदिरों में हाथ और पैर साफ करने की भी खास व्यवस्ता होती है. ये मंदिर में दर्शन और पूजा की पहली शर्त है. (Wiki Commons)
शिंतो तीर्थ स्थल व मंदिर भव्य होते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इन भव्य मंदिरों में देवता वास करते है. इसमें शुद्धता की ओर बहुत ध्यान है, लिहाजा शिंतो धर्म के लोग नियमित तौर पर नहाने के बाद ही घर के मंदिरों से लेकर सार्वजनिक मंदिरों में पूजा करते हैं. मंदिरों में हाथ और पैर साफ करने की भी खास व्यवस्ता होती है. ये मंदिर में दर्शन और पूजा की पहली शर्त है.

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जब नई कारें ली जाती हैं तो शिंतो धर्म में उसकी इस तरह पूजा भी करता है) शिंतो धर्मावलम्बियों की पूजा-पद्धति में प्रार्थनाएं करना, तालियां बजाना शुद्धिकरण और देवताओं की श्रद्धा में कुछ अर्पण करना सम्मिलित है. पुरोहित प्रार्थनाएं पढ़ते हैं, कामनाएं करते हैं तथा पूर्वजों की स्मृति में भेट चढ़ाई जाती हैं. संगीत, नृत्य के आयोजन के साथ ही धार्मिक उत्सवों वाले दिनों में जुलूस निकाले जाते हैं.
(जब नई कारें ली जाती हैं तो शिंतो धर्म में उसकी इस तरह पूजा भी करता है) शिंतो धर्मावलम्बियों की पूजा-पद्धति में प्रार्थनाएं करना, तालियां बजाना शुद्धिकरण और देवताओं की श्रद्धा में कुछ अर्पण करना सम्मिलित है. पुरोहित प्रार्थनाएं पढ़ते हैं, कामनाएं करते हैं तथा पूर्वजों की स्मृति में भेट चढ़ाई जाती हैं. संगीत, नृत्य के आयोजन के साथ ही धार्मिक उत्सवों वाले दिनों में जुलूस निकाले जाते हैं.

इस धर्म में जब नया बच्चा पैदा होता है तो उसे कुछ समय बाद ही मंदिर ले जाया जाता है. लड़का पैदा होने के 32वें दिन मंदिर ले जाया जाता है तो लड़की 33वें दिन. पहले पैदा हुए बच्चे मां नहीं बल्कि परिवार की किसी रिश्तेदार महिला के जरिए वहां ले जाए जाते थे. वहां खास पूजा होती थी लेकिन अब मां ही बचचों को लेकर जाने लगी हैं. अक्सर विवाह और दूसरे धार्मिक अनुष्ठान भी मंदिर में ही हो जाते हैं.
इस धर्म में जब नया बच्चा पैदा होता है तो उसे कुछ समय बाद ही मंदिर ले जाया जाता है. लड़का पैदा होने के 32वें दिन मंदिर ले जाया जाता है तो लड़की 33वें दिन. पहले पैदा हुए बच्चे मां नहीं बल्कि परिवार की किसी रिश्तेदार महिला के जरिए वहां ले जाए जाते थे. वहां खास पूजा होती थी लेकिन अब मां ही बचचों को लेकर जाने लगी हैं. अक्सर विवाह और दूसरे धार्मिक अनुष्ठान भी मंदिर में ही हो जाते हैं.

साभार न्यूज १८ से

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