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आइए जानें भगवान गणेश को अर्द्धनारीश्वर क्यों कहा जाता है

 

हिंदू देवताओं में भगवान शिव को ही अर्द्धनारीश्वर कहा गया है, जिनके आधे अंग में शक्ति स्वरूपा मां पार्वती का वास बताया गया है, पर बहुत कम लोग ये जानते हैं कि भगवान गणेश भी अर्द्धनारीश्वर रूप धारण कर चुके हैं, जिसका जिक्र पौराणिक कथाओं में है. जिसके अनुसार अंधकासुर राक्षस का वध करने के लिए भगवान गणेश ने नारी का रूप धारण किया था, जिसे उनका गणेशी या विनायकी स्वरूप कहा जाता है.

अंधकासुर राक्षस ने जब सभी लोकों को त्रस्त कर दिया तो सभी देवता मिलकर भगवान शिव के पास पहुंचे थे, जिन्होंने देवताओं की प्रार्थना पर अंधकासुर का वध किया था. लेकिन अंधकासुर की मृत्यु के बाद उसके बहते रक्त से बड़ा संकट खड़ा हो गया. जिसे पीने के लिए भगवान ने 200 देवियों को प्रकट किया था, जिनमें ही एक नारी रूप भगवान गणेश का बताया गया.

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इसी तरह मत्स्य पुराण और विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार जब अंदोक (अंधक) राक्षस से पार्वती जी को बचाते समय भगवान शिव का त्रिशूल पार्वती जी को ही लग गया था. जिससे जो रक्त जमीन पर गिरा वो आधी स्त्री और आधे पुरुष के रूप में बंट गया, जिसे गणेशानी के नाम से जाना गया. लिंग पुराण और दुर्गा उपनिषद सरीखे धर्म ग्रंथों में भी भगवान गणेश के नारी स्वरूप का जिक्र है.

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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिस तरह विष्णु की शक्ति वैष्णवी, शिव की शक्ति शिवा और ब्रह्मा की ब्राह्मणी हैं, वैसे ही भगवान गणेश की शक्ति गणेश्वरी हैं, जिसे ही गणेश जी के साथ अर्द्धनारीश्वर रूप में पूजा जाता है. नारी गणेश को गणेशी, गजानना, हस्तिनी, गणेश्वरी, गणपति हृदया, वैनायिकी, विघ्नेश्वरी, श्री अयंगिनी, महोदरा, गजवस्त्रा, लंबोदरा, महाकाया आदि नामों से भी जाना जाता है.

गणेश जी के अर्धनारीश्वर रूप की मूर्ति भी कई जगह मिल चुकी है. इनमें एक दुर्लभ मूर्ति राजस्थान के सीकर जिले के हर्ष मंदिर में है, जो करीब 1050 वर्ष पुरानी है. हर्ष पर आक्रमण के समय औरंगजेब ने इस मूर्ति को खंडित कर दिया था, जो आज भी वहां मौजूद है.

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