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मैंने वि.पी. को देखा है : अजय झा

 
नेपाली राजनीति के निर्देशक, नेपाली कांग्रेस के संस्थापक, नेपाली जनता के आदर्श, विश्वपुरुष, प्रखर चेतना, मनोवैज्ञानिक साहित्यकार, दूरगामी राजनीतिज्ञ तथा एक सच्चा, ईमानदार और निर्मल व्यक्तित्व श्री विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला की एक सौ नौंवी पुण्य तिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि सहित यह काव्यांजलि अर्पण करता हूँ

मैंने वि.पी. को देखा है

* दिव्या कृष्ण के गोद में, खेल रहे विश्वेश्वर प्यारे थें।
नन्हें पाँव से निर्वाषित हो, भारत भूमि पधारे थें।।
चौदह वर्ष के अल्पायु में, रचनाकार है बन बैठें।।।
वाल्याबस्था से ही उनमे, राजनीति है पनप बैठे।।।। (1)
* निति श्रेष्ठ है राजनीति, साहित्य सर्व हितकारी है।
दोनों का हो मेल जहाँ, वह मानव मंगलकारी है।।
समता का हो संरक्षक, जो न्याय प्रिय अधिकारी है।।।
देखा मैंने वि. पी. दिलमे, प्रेम भड़े किलकारी है।।।। (2)
* विश्वेश्वर को मचलते देखा, स्वतंत्रता के वादों पर।
गाँधी, लोहिया, जयप्रकाश, नेहरू के संग संवादों पर।।
फिरंगियों संग लड़ते देखा, भारत के चौराहों पर।।।
मुक्ति हेतु मरते देखा, मातृभूमि के राहों पर।।।। (3)
*अपनी मिट्टी पानी से जो, तत्व निकाले ज्ञानी है।
दिन दुखी के कष्टको समझे, वह मानव अनुगामी है।।
अपना पराया नहीं समझ, जो करे न्याय दूरगामी है।।।
देखा मैंने विश्वेश्वर में, समाजवाद की वाणी है।।।। (4)
*हिंदी को मुसकाते देखा, वि. पी. के रचनाओं में।
चन्द्रवदन को चमकते देखा, ऐतिहासिक भाषाओं में।।
हंश, शारदा को देखा है, अमर तुल्य वो बन बैठे।।।
प्रेमचन्द, विक्रम को देखा, वि. पी. के मयखानों में।।।। (5)
* फ्रायड को मुसकाते देखा, सुम्निमा के वाहों में।
कृष्ण को भी तो लजाते देखा, मोदिआईन के आहों में।।
हिटलर को तो हिचकते देखा, मानवता के राहों में।।।
प्रेम से प्रभुको पाते देखा, वि. पी. के रचनाओं में।।।। (6)
* यौन पिपाशु सबको देखा, भौतिकता के आँगन में।
इदं,अहम्, पराहं देखा, वि. पी. के काव्यांचल में।।
चेतन, अवचेतन के मालिक, अ$चेतन मन को देखा।।।
काम से राम को पाते देखा, विश्वेश्वर के प्रांगण में।।।। (7)
*क्यों पढ़ना अब गीता, वेद, पुराण, उपनिषद् को आगे?
न्याय, मीमांसा, आरण्यक, ब्राह्मण और दर्शन को त्यागें।।
मोदिआइन, हिटलर, सुम्निमा, में देखो सब मिलता है।।।
सर्वधर्म का सार प्रेम है, मानव मात्र के भावों में।।।। (8)
* शुक्ष्म थी दृष्टी गजब स्मृति, स्रष्टा, चिन्तक वि. पी. थें।
निर्मल मन प्रेमल स्वभाव, युगद्रष्टा प्यारे वि. पी. थें।।
अजात शत्रु, मैत्रीपूर्ण, प्रज्ञा के वो राजधानी थें।।।
वहुआयामिक था व्यक्तित्व, वो महामना स्वाभिमानी थें।।।। (9)
* मैं वि. पी. को ढूढ़ रहा था, गाँव,चौक, गलियारों में।
गुदड़ी, चेथड़ी में लिपटे, झुपड़ी के उन दुखियारों में।।
नहीं मिला मुझे वह जननायक दीन दुखी के वाहों में।।।
नहीं अनाथ के घर में देखा, नहीं अपांग के आहों में।।।। (10)
* प्रजातंत्र को प्रजातंग में , हमने वदलते देखा है।
प्रजातंत्र के छाँव तले, माओ को पनपते देखा है।।
कभी राजा तो कभी माओ संग, हाथ मिलाते देखा है।।।
वि. पी. के जन को हिटलर से, नयन लड़ाते देखा है।।।। (11)
* पी पी कर वि. पी. को भूला, कॉग्रेसी ठेकदारों ने।
मंत्री, सांसद बनकर लुटा, देसद्रोही मक्कारों ने।।
जनता भूखा नंगा फिरते, गाँव के हर गलियारों में।।।
शहीद के संग वि. पी. रोते, खुद अपनी चीत्कारों में।।।। (12)
* सत्य बोलना निर्भय रहना, मैंने उनसे सीखा है।
कपटी का नहीं जड़ होता है, वह तो स्वप्न सरीखा है।।
चेतन पथ पे आगे बढ़ना, प्रमाणिक जीबन रखना।।।
देख दंग मैं रह गया यारों, वि. पी. ने सब लिख्खा है।।।। (13)
रचनाकार:- अजय कुमार
मिति:- 2071-9-9
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अजय कुमार झा

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