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माँ भवानी आ रही हैं हाथी पर सवार होके : कंचना झा

 

मां भगवती का आगमन
‘लाल रंग चुनरी मईया,लाल रे अंचरिया
लाल अड़हुल माला मंद मुस्कान मइया
खोलू ने नजरिया ।’

कंचना झा, काठमांडू। माँ की सवारी यही है लेकिन इसबार माँ भवानी आ रही हाथी पर सवार होके । माँ का हाथी पर आना बहुत शुभ संकेत है । माँ भवानी, माँ जगदम्बा, माँ अम्बिका,कल्याणी, माँ जग जननी, माँ महामाया, माँ भगवती,दुर्गा, काली ,चण्डिका न जाने कितने नामों से हम उन्हें पुकारते हैं । कहते हैं सबकी इंच्छा पूरी करती हैं माँ । वो तो जगत की माँ हैं , उनका हर किसी को इंतजार रहता है हर कोई इस आस में रहता है कि न जाने कौन से रुप में भगवती के दर्शन हो जाए । खासकर इसबार का उनका आना हाथी पर सवार होके बहुत शुभ माना जा रहा है । वैसे बचपन में हम नहीं समझ पाते थे कि माँ और दादी ये क्यों कहती थीं कि –

‘मईया अहिबेर हाथी पर आयल छथि, ई बडा सुन्दर सजोग अछि । अहिबेर सभकिछु निके होयत ।’ हम सभी को जिज्ञासा रहती कि कैसे ये लोग जानती हैं कि इस बार दुर्गा मईया हाथी पर आ रही हैं ? अब आइये जानते हैं कि कैसे पता चलता हैं तो –शास्त्रों के अनुसार जब भी शारदीय नवरात्रि रविवार अथवा सोमवार से शुरु होता है, माँ दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं । इसबार पूजा सोमवार से शुरु हुआ है । धार्मिक दृष्टिकोण से हाथी को बहुत ही शुभ माना जाता है । हाथी को ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है । भगवती सबकी मनोकामना को पूर्ण करें ।
अब कुछ बातें बचपन की , जिनसे आजकल के बच्चें जुड़ नहीं पाते हैं । हमने अपना बचपन उस जुड़ाव में ही जिया है । इसलिए हमें आज भी प्रतीक्षा रहती है भगवती के आगमन की ।
बचपन में हमें बड़ा इंतजार रहता था दुर्गा पूजा का । इसके दो महत्वपूर्ण कारण थे –पहला कि हर दशहरें में पहनने के लिए नए कपड़े मिलते थे और दूसरा खाने को बहुत सी मिठाइयां । माँ को तैयारी करते देखना अच्छा लगता था । उनके साथ बैठकर बाती बनाना,मीट्टी का दीया बनाना, रोज सप्तशती का पाठ करना, शाम के समय दुर्गा मंदिर जाकर साझ देना, और सप्तमी के दिन से मेला शुरु होना उसके बाद मंदिर, आरती, मिठाइयां और हम । पूरा दशहरा बड़ा रोमांचकारी होता था । दादी काकी,माँ, की तैयारियां देखकर ही भगवती की ओर कब आस्था और विश्वास मन में बैठ गया पता ही नहीं चला । आज भी भगवती की आराधना करती हूँ तो मन में उसी बचपन से होकर गुजरती हूँ ।
अब वो पहली सी बात नहीं रही । लोगों की बहुत ज्यादा व्यस्तता हो गई है । पूजा, त्योहार में भी बहुत अंतर आया है । बच्चें उतना ध्यान नहीं रखते हैं । वो अपने पढ़ाई में कहें या आधुनिकता में इतना बस गए हैं कि उन्होंने इसे बहुत महत्व देना जरुरी नहीं समझा है । वो भी इंतजार तो करते हैं दशमी का मगर पूजापाठ के लिए नहीं घुमने फिरने के लिए । उन्हें मंदिर या साझ से कोई खास मायने मतलब नहीं है । वो बस इतना जानते हैं कि पूजा शुरु हो गई हैं , छुट्टियां हो गई है । घर की तैयारियों से उन्हें कोई मतलब नहीं ।
वैसे ये सभी बच्चों को लेकर नहीं है । कुछ बच्चें आज भी पूजा पाठ , ईश्वर में अपनी आस्था को बनाए रखा है । माँ भगवती सबका कल्याण करें । जय भगवती ।

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लाल रंग चुनरी मईया,लाल रे अंचरिया
लाल अड़हुल माला मंद मुस्कान मईया
खोलू ने नजरिया ।’
इसबार माँ भवानी आ रही हाथी पर सवार होके । माँ का हाथी पर आना बहुत शुभ संकेत है । माँ भवानी, माँ जगदम्बा, माँ अम्बिका,कल्याणी, माँ जग जननी, माँ महामाया, माँ भगवती,दुर्गा, काली ,चण्डिका न जाने कितने नामों से हम उन्हें पुकारते हैं । कहते हैं सबकी इंच्छा पूरी करती हैं माँ । वो तो जगत की माँ हैं , उनका हर किसी को इंतजार रहता है हर कोई इस आस में रहता है कि न जाने कौन से रुप में भगवती के दर्शन हो जाए । खासकर इसबार का उनका आना हाथी पर सवार होके बहुत शुभ माना जा रहा है । वैसे बचपन में हम नहीं समझ पाते थे कि माँ और दादी ये क्यों कहती थीं कि –
‘मईया अहिबेर हाथी पर आयल छथि, ई बडा सुन्दर संजोग अछि । अहिबेर सभकिछु निके होयत ।’

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हम सभी को जिज्ञासा रहती कि कैसे ये लोग जानती हैं कि इस बार दुर्गा मईया हाथी पर आ रही हैं ? अब आइये जानते हैं कि कैसे पता चलता हैं तो –शास्त्रों के अनुसार जब भी शारदीय नवरात्रि रविवार अथवा सोमवार से शुरु होता है, माँ दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं । इसबार पूजा सोमवार से शुरु हुआ है । धार्मिक दृष्टिकोण से हाथी को बहुत ही शुभ माना जाता है । हाथी को ज्ञान का प्रतीक भी माना जाता है । भगवती सबकी मनोकामना को पूर्ण करें ।
अब कुछ बातें बचपन की , जिनसे आजकल के बच्चें जुड़ नहीं पाते हैं । हमने अपना बचपन उस जुड़ाव में ही जिया है । इसलिए हमें आज भी प्रतीक्षा रहती है भगवती के आगमन की ।
बचपन में हमें बड़ा इंतजार रहता था दुर्गा पूजा का । इसके दो महत्वपूर्ण कारण थे –पहला कि हर दशहरें में पहनने के लिए नए कपड़े मिलते थे और दूसरा खाने को बहुत सी मिठाइयां । माँ को तैयारी करते देखना अच्छा लगता था । उनके साथ बैठकर बाती बनाना,मीट्टी का दीया बनाना, रोज सप्तशती का पाठ करना, शाम के समय दुर्गा मंदिर जाकर साझ देना, और सप्तमी के दिन से मेला शुरु होना उसके बाद मंदिर, आरती, मिठाइयां और हम । पूरा दशहरा बड़ा रोमांचकारी होता था । दादी काकी,माँ, की तैयारियां देखकर ही भगवती की ओर कब आस्था और विश्वास मन में बैठ गया पता ही नहीं चला । आज भी भगवती की आराधना करती हूँ तो मन में उसी बचपन से होकर गुजरती हूँ ।
अब वो पहली सी बात नहीं रही । लोगों की बहुत ज्यादा व्यस्तता हो गई है । पूजा, त्योहार में भी बहुत अंतर आया है । बच्चें उतना ध्यान नहीं रखते हैं । वो अपने पढ़ाई में कहें या आधुनिकता में इतना बस गए हैं कि उन्होंने इसे बहुत महत्व देना जरुरी नहीं समझा है । वो भी इंतजार तो करते हैं दशमी का मगर पूजापाठ के लिए नहीं घुमने फिरने के लिए । उन्हें मंदिर या साझ से कोई खास मायने मतलब नहीं है । वो बस इतना जानते हैं कि पूजा शुरु हो गई हैं , छुट्टियां हो गई है । घर की तैयारियों से उन्हें कोई मतलब नहीं ।
वैसे ये सभी बच्चों को लेकर नहीं है । कुछ बच्चें आज भी पूजा पाठ , ईश्वर में अपनी आस्था को बनाए रखा है । माँ भगवती सबका कल्याण करें । जय भगवती ।

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