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ओशो की ये खास बातें

 

दुनियाभर में प्रसिद्ध ओशो यानी आचार्य रजनीश का जन्म ज्ञज्ञ दिसंबर १९३१ को मध्यप्रदेश के रायसेन शहर के एक गांव में हुआ था। ओशो अपने तर्काें और नीतियों के कारण आज भी चर्चित हैं। काफी लोग ओशो के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और उनकी नीतियों का पालन करते हुए अपने जीवन को आगे बढÞा रहे हैं। आचार्य र जनीश ने अपने ही ढंग से धर्म की व्याख्या की और जीवन में खुशी पाने के सूत्र बताए हैं। एक बार किसी पत्रकार ने ओशो से उनके मुख्य सिद्धांत पूछे थे। इसके जवाब में आचार्य रजनीश ने उत्तर दिया कि यह एक मुश्किल सवाल है, क्योंकि वे प्रारंभ से ही किसी सिद्धांत या नियम के विरुद्ध रहे हैं। ओशो ने पत्रकार को बताया कि- osho

 किसी की आज्ञा का पालन नहीं करें, जब तक कि वह आपके अंदर
से भी नहीं आ रही हो।
सत्य हमारे अन्दर ही है, उसे बाहर ढूंढने की जरूरत नहीं है।
प्रेम ही पर््रार्थना है।
शून्य हो जाना ही सत्य का मार्ग है और उपलब्धि है।
जीवन होश में रहकर जीना चाहिए।
हमें तैरना नहीं बहना चाहिए।
प्रत्येक पल मरो ताकि तुम हर पल नए हो सको।
सिर्फवही लोग जो कुछ भी नहीं बनने के लिए तैयार हैं वे प्रेम
कर सकते हैं।
यहां कोई भी आपका सपना पूरा करने के लिए नहीं है। हर कोई
अपनी किस्मत और अपनी हकीकत बनाने में लगा है।
अगर आप सच देखना चाहते हैं तो सहमति या असहमति में
अपनी राय व्यक्त न करें।
कोई चुनाव नहीं करना चाहिए। जीवन को ऐसे अपनना चाहिए
जैसे कि वह अपनी समग्रता में है।
जब प्रेम और्रर् इष्र्या दोनों ना हो तो हर चीज साफ और स्पष्ट
दिखाई देने लगती है।
जीवन ठहराव और गति के बीच का संतुलन है।
हमें वैसे नहीं चलना चाहिए जैसे डर चलाता है, बल्कि वैसे चलना
चाहिए जैसे प्रेम हमें चलाए। वैसे चलिए जिस प्रकार प्रसन्नता
आपको चलाए।
कभी भी किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहिए। यही
मानिए कि हम स्वयं जैसे हैं, बिल्कुल सही हैं।
आप कभी भी प्रेम के मामले में दिवालिया नहीं हो सकते हैं,
क्योंकि प्रेम कभी खत्म नहीं होता है। अतः आप जितने लोगों को
चाहें उनसे प्रेम कर सकते हैं।
l दोस्ती या मित्रता सबसे शुद्ध प्रेम होता है, क्योंकि इसमें कुछ भी
मांगा नहीं जाता। इसीलिए ये प्रेम का र्सवाेच्च रूप है। इसमें किसी
प्रकार की कोई शर्त नहीं होती। मित्रता में केवल आनंद ही होता
है।
l जिस समय हम ये सोच लेंगे कि हमने संपर्ूण्ा ज्ञान पा लिया है,
उसी क्षण हमारी मृत्यु हो जाती है, क्योंकि सबकुछ जानने के बाद
हमें न आर्श्चर्य होगा और ना ही कोई आनंद प्राप्त होगा।
l ओशो कहते हैं कि हम वही बन जाते हैं जो हम सोचते हैं, जो
हम सोचते हैं कि हम हैं।
l हमें अधिक से अधिक भोले-भाले, कम ज्ञानी और बच्चों की तरह
बने रहना चाहिए। केवल इसी रूप में जीवन का पर्ूण्ा आनंद लिया
जा सकता है। वास्तविकता में यही जीवन है। J

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