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शनि की कुदृष्टि काफी कष्टकारी मानी जाती है, आइए जानें इससे उबरने के कुछ उपाय

 

 

हिंदू धर्म में शनि की कुदृष्टि काफी कष्टकारी मानी जाती है. इस पीड़ा से बचने के लिए शास्त्रों में कई तरह के उपाय भी बताए गए हैं. इन्हीं में एक उपाय सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने भी बताया है. जो भविष्यपुराण के अनुसार उन्होंने मुनि पिप्पलाद को बताया था. पंडित रामचंद्र जोशी के अनुसार मुनि पिप्पलाद को जब अपने बचपन की पीड़ा की वजह शनि ग्रह होने का पता चला तो उन्होंने गुस्से में शनि को आकाश से गिरा दिया था. तब ब्रह्माजी ने आकर उन्हें ग्रहों का अनादर करने की जगह पूजन से शांत करने की सलाह दी थी. इसी समय उन्होंने शनि ग्रह की पीड़ा से बचने के उपाय भी बताए थे. वही उपाय आज हम आपको बताने जा रहे हैं.

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शनि की पीड़ा से बचने का उपाय
भविष्य पुराण के आधार पर पंडित जोशी ने बताया कि ब्रह्माजी ने मुनि पिप्पलाद को ग्रहों की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए व्रत, भोग, हवन, नमस्कार आदि करने की सलाह दी थी. शनि की पीड़ा दूर करने के लिए उन्होंने कहा कि शनिवार को खुद शरीर पर तेल लगाकर ब्राह्मणों को भी तेल दान करना चाहिए.

लोहे के पात्र में तेल भरकर उसमें शनि की लोहे की प्रतिमा बनाकर एक वर्ष तक हर शनिवार को उसका पूजन करना चाहिए. इसके बाद काले फूल, काले कपड़ों, तिल, कसार, भात आदि से उनका पूजन करना चाहिए. फिर काली गाय, काला कंबल, तिल का तेल और दक्षिणा सहित सारे पदार्थ ब्राह्मण को प्रदान करने चाहिए.

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शनि के मंत्र व स्तुति
भगवान ब्रह्मा के अनुसार शनि का पूजन करते हुए यजुर्वेद के मंत्र का प्रयोग करना चाहिए. जो इस प्रकार है:

‘शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये.शं योरभि स्त्रवन्तु न:।।’

इसी तरह राजा नल को शनि देव ने सपने में जिस प्रार्थना मंत्र का उपदेश देकर उसके प्रयोग से उन्हें राजपाट लौटाया था, उससे भी स्तुति करनी चाहिए. ये स्तुति इस प्रकार है:-

क्रोड़ नीलान्जनप्रख्यं नीलवर्णसमस्त्रजम्
छायामार्तण्डसम्भूतं नमस्यामि शनैश्चरम्।।.

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नमोऽर्कपुत्राय शनैश्चराय नीहारवर्णान्जनमेचकाय,
श्रुत्वा रहस्यं भवकामदश्च फलप्रदो मे भव सूर्यपुत्र।।

नमोऽस्तु प्रतराजाय कृष्णदेहाय वै नम:,
शनैश्चराय कू्रराय शुद्धबुद्ध्रिप्रदायिने।।

य एभिर्नामभि: स्तौति तस्य तुष्टो भवाम्यहम।
मदीयं तु भयं तस्य स्वप्रेऽपि न भविष्यति।।

 

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