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पाकिस्तान की डर्टी बम और डर्टी हैरी : प्रेमचंद्र सिंह

 
प्रेमचंद्र सिंह, लखनऊ । पाकिस्तान दुनियां की गिने-चुने न्यूक्लियर शक्ति संपन्न देशों में से एक है और पाकिस्तान में न्यूक्लियर शक्ति के जनक जनाब ए.क्यू.खान थे। खान साहब वैसे तो मूलरूप से अविभाजित भारत के भोपाल के रहने वाले थे लेकिन भारत-पाकिस्तान बटवारा के बाद वो पाकिस्तान चले गए। विस्तार में नही जाकर इतना बताता चलूं कि खान साहब ने पाकिस्तानी हुकूमत की सहमति से पाकिस्तान के साथ-साथ लीबिया,नॉर्थ कोरिया और ईरान को भी न्यूक्लियर बम बनाने की तकनीकी दी और अब यूक्रेन को भी इस डर्टी बम (न्यूक्लियर बम) की तकनीकी पाकिस्तान ही दे रहा है। इसकी खुलासा संयुक्त राष्ट्र संघ में रूस ने किया है और अब संयुक्त राष्ट्रसंघ इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आइएईए) के माध्यम से इस मामले की गहराई से छानबीन करने में जुट गया है। दूसरी ओर पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान- तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान अपनी पार्टी द्वारा आयोजित विरोध मार्च में गोली लगने के बाद पाकिस्तान की जानलेवा फौजी अफसरों को “डर्टी हैरी” कहकर संबोधित कर रहे है। यह बात उन्होंने केवल अपने ऊपर हुए हालिया खूनी हमले के लिए जिम्मेवार फौजी मेजर जनरल फैसल के संदर्भ में ही नही बल्कि उनसे पूर्व पाकिस्तानी कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना, उनकी बहन मादरे-वतन फातिमा जिन्ना, पूर्व प्रधानमंत्री लियाकत अली खान, जुल्फिकार अली भुट्टो और मोहतरमा बेनजीर भुट्टो आदि की असामयिक हत्याओं के परिपेक्ष्य में पाकिस्तानी फौज को संबोधित किया है।
        पाकिस्तान की बदहाली और दूसरे देशों पर उसकी  निर्भरता पिछले करीब 70 वर्षों की पाकिस्तानी सांप्रदायिक और विभाजनकारी मानसिकता तथा उनके फौजी तथा गैर-फौजी नेतृत्व की स्वार्थ लोलुपता का दुष्परिणाम है। इस जन्मजात संकट से खस्ताहाल पाकिस्तान को इमरान खान सरीखे जुनिनी नेतृत्व भी करीब चार वर्ष के कार्यकाल में पटरी पर नहीं ला सका, लेकिन इमरान खान ने प्रयास तो किया हीं कि पाकिस्तान किसी देश या देशों की हाथों की कठपुतली रहने के बजाए भारत की तरह अपने राष्ट्रीय हितों के मामलों में पाकिस्तान भी स्वतंत्र फैसला ले सके। इसमें उनकी सफलता और असफलता इस तथ्य पर ज्यादा निर्भर थी कि पाकिस्तान की वास्तविक सत्ता-केंद्र इस राष्ट्रीय अभियान को सफल होने देना चाहता था या नहीं। पाकिस्तानी सत्ता की केंद्र में वहां की सैन्य अधिष्ठान खासकर पाकिस्तानी थल सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (इंटर सर्विस इंटेलिजेंस एजेंसी) है जिसे पाकिस्तान और उसके बाहर लोगों द्वारा पाकिस्तानी इस्टेबलिसमेंट के नाम से भी संबोधित किया जाता है। पाकिस्तानी इस्टेब्लिसमेंट शुरू से ही पाकिस्तान में सरकार बनाने और सरकार गिराने के खेल में माहिर है। पाकिस्तानी सेना की इस शक्ति को चुनौती आजतक पाकिस्तानी आवाम देने की हिम्मत नही जुटा पाया है। इसका केवल एक ही कारण है कि पाकिस्तानी सेना के पीछे उसको नचाने वाला मदारी पाकिस्तान के बाहर की वैश्विक शक्तियां हैं।
          पाकिस्तान के जन्मदाता तो वास्तव में इंग्लैंड था। अंग्रेजों ने वर्ष-1857 की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रदर्शित हिंद-मुस्लिम एकता को खंडित करने के लिए ही कांग्रेस और मुस्लिम लीग को संगठित किया और दोनो राजनीतिक दलों में वर्ष-1915 के बाद अपने पिट्ठू नेताओं को शीर्ष नेतृत्व में स्थान दिलवाया और राष्ट्रवादी नेताओं को किनारे किया। महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू तथा मोहम्मद जिन्ना वही बोलते थे और वही करते थे जो अंग्रेजी हुकूमत चाहती थी। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ही पाकिस्तान के सृजन का कारक बन गया। रूस की अरब समुद्र की ओर बढ़ते आक्रामक रुख, चीन और मध्य-पूर्व एशिया की भूरणनीतिक महत्व पाकिस्तान की सृजन की पृष्ठभूमि है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रेटॉन वुड समझौता ने भूराजनीतिक परिदृश्य से इंग्लैंड की वर्चस्व को अमेरिका ने पूरी तरह प्रतिस्थापित कर दिया और इसके बाद इंग्लैंड महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति कभी नही रहा। स्वाभाविक तौर पर पाकिस्तान और मध्य-पूर्व एशिया इंग्लैंड के स्थान पर अमेरिका के पूर्ण प्रभाव में आ गया और अभी भी है। पाकिस्तान में चीन की हालत यह है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) ठप पर चुका है और आए दिन चीनी नागरिक दर्जनों की संख्या में पाकिस्तान में मारे जा रहे है। पाकिस्तानी सेना का एक ही मदारी है अमेरिका और पाकिस्तानी सेना उसी के धुन पर नाचती है। नवाज शरीफ की सरकार जैसे ही चीन के प्रभाव में आने लगा, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर पोर्ट का समझौता हुआ, नवाज शरीफ साहब का देश निकाला हो गया, उनकी पीएमएल (एन) की सरकार गिराई गई और इमरान खान की सरकार प्रतिस्थापित की गई। इमरान खान जी जबतक चीन के हित के विरुद्ध काम करते रहे मसलन सीपीईसी (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) परियोजना को निष्क्रिय करने का काम करते रहे, चीनी नागरिकों की हत्यायें होती रही और उनकी सरकार उदासीन रही आदि ….. तब तक अमेरिका और पाकिस्तानी सेना चुप रही। लेकिन जैसे ही इमरान खान साहब अमेरिका की गिरफ्त से निकलकर रूसी खेमे में जाने की जुर्रत की, उनकी और उनकी सरकार की पाकिस्तान में उल्टी गिनती शुरू हो गई। फरबरी,2022 में इमरान खान साहब रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिलने मास्को गए और उसके दूसरे दिन रूस-यूक्रेन युद्ध का शंखनाद हो गया। अमरीका को समझ में आ गई कि पाकिस्तान अब उसके प्रभाव से बाहर जा रहा है और यूक्रेन की सैन्य मदद में पाकिस्तान की इमरान सरकार उनके किसी काम की नही रही। बस क्या था पाकिस्तानी सेना को अंकल सैम (अमेरिकी सरकार) का आदेश मिला और अप्रैल, 2022 में इमरान खान सरकार को बेआबरू होकर अपदस्त होना पड़ा।
        इसके बाद अमेरिका को तलाश थी एक ऐसी पाकिस्तानी सरकार की जो यूक्रेन में अमेरिकी इशारों पर सामरिक साजो-समान पहुंचाने का बखूबी बंदोबस्त कर सके और न्यूक्लियर बम (डर्टी बम) बनाने की तकनीक से यूक्रेन को लैस कर सके। पाकिस्तानी सेना ने इमरान खान की पार्टी पीटीआई की विपक्षी पार्टियों मसलन नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल(एन), बिलावल भुट्टो जरदारी की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और मौलाना फजुल-उर-रहमान की पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम को एकजुट कर नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ के प्रधानमंत्रित्व में पीड़ीएम (पाकिस्तान डेमोक्रेटिक एलायंस) की मिलिजुली सरकार बना दी और उसके माध्यम से यूक्रेन में सैन्य साजोसमान की आपूर्ति के साथ ही न्यूक्लियर बम की तकनीक मुहैया कराकर न्यूक्लियर बम (डर्टी बम) बनाने में सक्रिय मदद कर रहा है। ऐसा दावा रूस ने संयुक्त राष्ट्र में किया है और उसके कहने पर आइएईए (अंतरराष्ट्रीय एटॉमिक एनर्जी एजेंसी) डर्टी बम की जांच में जुट गया है। इसके एवज में अमेरिका की मदद से आतंकी फंडिंग पर रोक लगाने वाली वैश्विक संस्था एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) के ग्रे-लिस्ट से पाकिस्तान को बाहर लाया गया जिसके कारण खस्ताहाल पाकिस्तान को आईएमएफ (इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड), सऊदी अरबिया और अमेरिका से अच्छी-खासी आर्थिक सहायता और सामरिक एसेट्स के लिए तकनीकी सहायता भी मिली है और आगे मिलते रहने का आश्वासन भी मिला है। अमेरिका के प्रभाव के कारण पाकिस्तान को साउथ कोरिया और जापान से आर्थिक- निवेश की पेशकश भी की जा रही है। ग्लोबल वार्मिंग को मुख्य मुद्दा बनाकर पश्चिम देशों से पाकिस्तान में आई हालिया विनाशक बाढ़ के नाम पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ जी को पाकिस्तान के लिए आर्थिक सहायता के लिए आश्वासन भी मिला है। इनमे से कितने आश्वासन सच्चाई में परिणत हो पायेंगे, यह सब निर्भर करता है कि पाकिस्तान कितना और कबतक अपने आका की नजरों में बफादार बना रहता है।
        पाकिस्तान की गिरती अर्थव्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता और अपने पड़ोसीयों से बिगरते संबंध है कि सुधरने का नाम नहीं ले रहा है, ऊपर से अफगानिस्तान की तालिबानी हुकूमत के साथ नीलम-सीमा पर सैन्य-संघर्ष, ईरान से तल्ख रिश्ते और भारत के साथ जन्मजात दुश्मनी ने परेशानियों को बढ़ा रहा है। पाकिस्तान के अन्दर सिंधी राष्ट्रीय आंदोलन, बलोच लिबरेशन मूवमेंट, पश्तून तहाफुज मूवमेंट और तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान सरीखे अनेक अलगाववादी आंदोलनों ने पहले से ही पाकिस्तानी हुकूमत की नींद उड़ा रखी है। पाकिस्तान बनने से लेकर अबतक पाकिस्तान की हिंदू और हिंदुस्तान विरोधी सोच ने पाकिस्तान में जिहाद और जिहादियों के पैदा होने तथा उनके फलने-फूलने के लिए उर्वरक भूमि बनने के लिए अनुकूल वातावरण का ही निर्माण कर पाया है, इसके अलावा अपने आवाम के लिए पाकिस्तान ने न तो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और न ही संविधानिक संस्थाओं के सशक्तिकरण और संवर्धन के लिए जद्दोजहद करने का प्रयास किया है। परिणाम पाकिस्तानी आवाम को भोगना पर रहा है, जबकि पाकिस्तानी अशर्फिया वर्ग (एलीट क्लास) अपने भ्रष्टाचार के बदौलत पाकिस्तान और पाकिस्तान के बाहर आलीशान बंगलों में अपने व्यापारिक उपक्रमों और अकूत संपत्ति के बदौलत ऐश-आराम की जिंदगी जी रहे हैं। अभी ताजा खुलासा हुआ है कि हाल ही में सेवानिवृत हुए पाकिस्तानी सैन्य जनरल कमल जावेद बाजवा जी के ऊपर करीब 13 बिलियन पाकिस्तानी रुपए के भ्रष्टाचार का आरोप लगा है जिसकी जांच कराने के बजाए आरोप लगाने वाले अप्रवासी खोजी पत्रकार अहमद नूरानी जी के ऊपर ही पाकिस्तान सरकार ने जांच बैठा दी है कि उन्हें प्रश्नगत सूचना पाकिस्तान के आयकर विभाग से कैसे मिली। ऐसी सुरतहाल पाकिस्तान के लिए अजूबा नही है।
             पाकिस्तान के पड़ोसी अफगानिस्तान और ईरान भारत को अपने यहां निवेश करने के लिए लगातार आमंत्रित कर रहे है और भारत ने पहले भी इन देशों में बड़े पैमाने पर आर्थिक निवेश भी किया है और मानवीय सहायता भी पहुचाई है। पाकिस्तान के अन्दर और पाकिस्तान के बाहर बलोच, सिंध, गिलगित-बाल्टिस्तान आदि के लोग चिल्लाचिल्लाकर भारत से गुहार लगा रहे हैं कि बांग्लादेश की तरह भारत उनके भूमि को भी पाकिस्तान की जालिम हुकूमत से आजाद करने में मदद करें। ये पाकिस्तानी जिहादी अपने आल-वेदर फ्रेंड चीन को भी नही बख्शने वाले है, चाहे बात पाकिस्तान के अन्दर सीपीईसी तथा ग्वादर पोर्ट परियोजनाओं में कार्यरत चीनी लोगों की हत्याओं की हो या अफगानिस्तान के रास्ते चीन की सिनजियांग प्रांत में युगुर मुस्लिमों के साथ चीनी हुकूमत द्वारा की जा रही अत्याचार के विरुद्ध जिहाद का प्रयास हो। अब देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान की डर्टी हैरी अपने डर्टी बम के बदौलत इन हालातों से पाकिस्तानी आवाम को सुरक्षित निकालकर उन्हे विकास और उन्नति के राह पर अग्रसर कर पाता है या इन बिगड़ती हालातों से पाकिस्तानी आवाम का ध्यान भटकाने के लिए पाकिस्तान में मार्शल लॉ लगाने या किसी मोर्चे पर युद्ध तथा प्रॉक्सी-युद्ध का बहाना ढूंढता है।
प्रेमचन्द्र सिंह

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