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प्रेम तुम हो उत्कृष्ट  और तुम्हारा रचियता.. परमोत्कृष्ट : बसंत चौधरी

 

भले ही वर्तमान में प्रेम के मायने बदल गए हैं, इसकी परिभाषा बदल गई है । लोगों का इस पर से भरोसा उठ गया है बावजूद इसके मैं यही मानता हूँ कि दुनिया के टिके रहने में आज भी इसकी मान्यता कम नहीं है । स्वरूप बदल सकता है किन्तु भाव नहीं । कबीर ने कहा था, “प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रूचै, सीस देइ ले जाय।”  प्रेम यही है, इसलिए मैं व्यक्तिगत रूप से प्रेम में ही जीवन को तलाशता हूँ । मिलन हो या विरह हो इसका मूल प्रेम ही है, यही प्रेम अपने कई रूपों के साथ मेरी रचनाओं में व्यक्त होती चली जाती है और इसे ही समझने का अथक प्रयास मैं करता रहता हूँ। जीवन के हर रंगों में प्रेम का अस्तित्व होता है और ऊपर वाले ने यह रंग बहुत गहरा बनाया है जो हम पर अमिट छाप छोड़ जाता है।  मुश्किल वक्त में भी हम इस रंग से मुक्त नहीं हो सकते और होना भी नहीं चाहिए क्योंकि, मानव–मन अपनी कोमलता में ही मानवता और नैतिकता को जिन्दा रख सकता है, दूसरों के दर्द को महसूस कर सकता । जीवन का यही आधार है जो हमें प्रेम सिखाता है और मानव–जीवन को सार्थकता प्रदान करता है । जी हाँ यही तो प्रेम है—
बसंत चौधरी
प्रेम का अर्थ
कई बार कोशिश की
जान पाऊं कि
ये प्रेम है क्या
पर नहीं समझ सका आज तक
इसके गूढ रहस्य को
सोचता हूं सम्भव भी तो नहीं 
समझना प्रेम को
कौन समझ पाया है आज तक
इसकी गूढता को
कई जनम बीत गए प्रेम,
तुझे पहचानते–पहचानते…
प्रेम का अर्थ
क्या जान लेना जरूरी है
जरूरी कतई नहीं है
किंतु प्रश्न तो है?
नहीं समझ पाया प्रेम को
इसकी जटिलता को
किन्तु यह समझ सका हूँ
प्रेम तुम हो उत्कृष्ट 
और तुम्हारा रचियता..
परमोत्कृष्ट!!
2
प्रेम 
अगर प्रेम न होता 
तुम, तुम न होती, मैं, मैं न होता 
न तुम हँसती,  न मैं हंसता 
न तुम रोती , न मैं रोता 
हमारे जिंदा रहने का आकर्षण है प्रेम। 
सिर्फ प्रेम ही है वो चीज़ जो प्रेम करना सिखाता है 
प्रेम, दिल से दिल तक की यात्रा करता है 
आत्मा से आत्मा तक प्राण भरता है। 
प्रेम गहरा होता है और प्रेमी उसी गहराई में 
जीवन का उत्कर्ष पाता है। 
उसी प्रेम की कसम, 
मैं तुम्हें प्रेम के उसी यथार्थ में 
अंक माल करना चाहता हूँ, 
अनुभूति की उसी भूल  भुलैया  में 
तुम्हारे साथ खो जाना चाहता हूं। 
प्रिये!मैं क्यों कहूँ कि विश्वास करो 
प्रेम है ही तो क्यों हुआ जाए 
विश्वास पर आधारित?
दौलत के पुजारी भला क्या समझे 
प्रेम का लाभ, प्रेम की हानि। 
क्या समझे और कैसे समझे 
वो प्रेम का गणित?
प्रेम ही है वो बगीचा 
जहाँ शून्य भी खिलता है अंक होकर अगणित 
प्रेम के स्तंभ पर घूमता है संसार 
निराकार के सहारे ही तो है टिका हुआ आकार। 

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