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नेपाल के मधेश प्रदेश में मधेशी भाषा पर आपत्ति : सुदर्शन लाल कर्ण

 

मधेशी भाषा शब्द मैथिली अभियानियों के गले नहीं उतरा। इसलिए उन्होंने विरोध जताया : सुदर्शन लाल कर्ण

सुदर्शन लाल कर्ण, जनकपुरधाम । नेपाल मे राजनैतिक महानिर्वाचन कुछ दिन पहले समाप्त हुआ है। निर्वाचन परिणाम के बाद प्रतिनिधिसभा सदस्य जनमत पार्टी के अध्यक्ष डा सी के राउत अपने तीन सांसदो के साथ प्रतिनिधिसभा में 22 दिसम्बर 2022 को मधेशी भाषा में शपथ लिया।
प्रिन्ट मीडिया समाचार अनुसार शपथ की भाषा को मधेशी भाषा कहे जाने पर मिथिला नाट्यकला परिषद्, मैथिली साहित्य परिषद् और आइ लभ मिथिला मीडिया ने संयुक्त रूप से आपत्ति जताते हुए डा राउत के विरूद्ध नारावाजी की। समाचार अनुसार बृहस्पतिवार उन्होंने शपथग्रहण के विषय मे आपत्ति करते हुए सप्तरी राजविराज मे प्रदर्शन किया।

इन मैथिली अभियानियों के लिए हिन्दी का विरोध  करते रहना आम बात है। इस के लिए नेपाल के सत्ताशीन समूह का भरपूर सहयोग रहा है। सत्ताशीन समूह का शुरू से ही मानना है कि नेपाल में हिन्दी के रहने से नेपाली भाषा विकास नही कर सकती और कमजोर हो सकती है। इसलिए नेपाल के सरकारीतन्त्र ने हिन्दी को नेपाल से हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए मैथिली अभियानियों तथा अन्य तथाकथित  अभियानियों का सहयोग लेते आ रहा है।

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राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार नेपाल तराई मधेश मे हिन्दी भाषियों की संख्या नगण्य दिखायी जाती है। पर यथार्थ यह नहीं है जो दिखाया जाता है। सच तो यह है पचास वर्ष पहले नेपाल मधेश के स्कूल कालेज मे सभी विषय हिन्दी मे पढाई जाती थी। पत्रपत्रिका भी हिन्दी में पाई जाती थी क्योंकि लोग यहाँ हिन्दी समझते हैं। सन् 1816 के सुगौली सन्धि मे राजनैतिक भूगोल का बटवारा तो हुआ पर भाषा संस्कृति का बटबारा नहीं हुआ और होता भी नहीं है। सीमा खुली थी और है भी। लोग आते जाते हैं;शादी ब्याह के कारण भी दोनों देश की भाषा संस्कृति एक जैसी होनी स्वाभाविक ही है। फिर हिन्दी हिन्दूस्तान में ही बोली जाती है कहने से क्या फायदा। हाँ यह बात अलग है कि हमारी नेपाल की भाषा नेपाली है जिसमें हम सरकारी कामकाज करते हैं।

बात फिर आती है मधेशी भाषा की। एक ओर मिथिला अभियानियों ने मधेशी भाषा का विरोध किया,नारावाजी की तो दूसरी ओर मथेशी भाषा संस्थागत होने की खुशी में मधेश प्रदेश की राजधानी जनकपुरधाम मे दीप प्रज्वलन किया गया। तो भाषा विवाद की यह समस्या मधेश प्रदेश में क्या राजनैतिक गुल खिला सकता है भविष्य ही बतला सकता है। वैसे मधेशी भाषा में शपथग्रहण करने वाले डा सि के राउत पीएचडी विद्वान और हरेक क्षेत्र की जानकारी रखनेवाले सांसद हैं। यह भी कहा जाता है वे कई भाषा के ज्ञाता भी हैं।

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नेपाल तराई मधेश में मधेशी भाषा

संसार मे कुछ भी हो सकता है। एशिया महादेश में बहुत कुछ हो सकता है। नेपाल के हर क्षेत्र में बहुत कुछ होता आया है;नयी बात पुरानी होती गयी है लोग सहज रूप से स्वीकार भी करते रहे है। पञ्चायत काल मे पञ्चायती व्यवस्था को सत्ताशीन नेताओ ने निर्विकल्प कहा लोगों ने सहजरूप से स्वीकार किया। फिर पञचायत का विकल्प आया फिर बहुतेरी जनता ने स्वीकार किया। यथार्थ यहाँ कुछ भी ठीक और बेठीक हो सकता है। सन्दर्भ है मधेशी भाषा में शपथ लिया गया। मैथिली अभियानी और तथाकथित अभियानिओ ने भी जबर्दस्त विरोध जताया। वैसे विरोध तो कोई भी किसी बात के लिए कर सकता है।

मधेशी भाषा क्या है ?

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निश्चित ही नेपाल तराई मधेश की मातृभाषाएँ मैथिली,भोजपुरी, अबधी,बज्जिका आदि हैं जिन्हें मधेश की भाषा कहना गलत नही होगा। पर मधेशी भाषा शब्द मैथिली अभियानियो को गले नही उतरा। इसलिए उन्होने बिरोध जताया। मधेश की भाषा और मधेशी भाषा मे शायद अन्तर हो। पर मेरे एक मित्र ने बताया कि मैथिली अभियानी यहाँ की भाषा जो है मैथिली ही है मधेशी कोई भाषा नही है।
इस बात को चीरफार किया जाय तो यह कहना गलत नही होगा कि मैथिली अभियानी मधेश प्रदेश के बदले मिथिला वा जानकी प्रदेश चाहते रहे पर ऐसा नही हुआ। तो यहाँ कुछ भी हो सकता है। वैसे मैथिली भाषा ऐतिहासिक और समृद्ध है पर संस्कृत भाषा देव भाषा और पुरानी भाषा भी है। पर प्रचलन में नहीं है संस्कृत देव भाषा होकर रह गयी;लोक भाषा नही रही। डर यह भी है कि मैथिली भी सिर्फ सीमित लोगों की भाषा तक सीमित न रह जाये क्योंकि यहाँ के बहुतेरे यह मानते हैं कि मैथिली के नाम पर सीमित लोग राजनैतिक और आर्थिक लाभ ले रहे है।

सुदर्शन लाल कर्ण
जनकपुरधाम

 

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