नेपाल मे असफल बिआरआई को सफल बनाने में लगा है, चिन : अनिल तिवारी
3 years ago
क्या घाटे का कारोबार नहीं है पोखरा और भैरहवा अन्तराष्ट्रिय एयरपोर्ट ?
अनिल तिवारी, बीरगंज । नेपाल के प्रतिनिधि सभा (संघीय संसद) मे ‘भूतो-न-भबिष्यती’ बहुमत के साथ प्रधानमन्त्री पद पर प्रचन्ड चुने गए है। पुष्पकमल दहाल उर्फ प्रचन्ड २ सय ६८ सांसद के समर्थन के साथ नेपाल के सर्वशक्तिमान प्रधानमन्त्री चुने गए है। हालाकि चुनावी परिणाम आते ही तत्कालीन प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा और पुर्व प्रधानमन्त्री माधव नेपाल को धोखा देते हुए चिन के इशारे पर ओली के साथ नया गठबन्धन बनाकर सत्ता हासिल किया था। जिसको लेकर चिन द्धारा नेपाल मे चलाए जा रहे कम्युनिष्ट जोडो अभियानका के एक सफल कड़ी के रुप मे माना जा रहा है, लेकिन नेपाली कांग्रेस ने ससंद मे प्रचन्ड को समर्थन देकर फिर से अपनाने का कोशिश किया है जिसके चलते ओली को फिर से जोर का झटका धिरे से लगा है।
संविधान के धारा ७६ के उपधारा ४ अनुसार प्रचण्ड ने १० जनबरी को संसद मे विश्वास का मत हासिल किया है । प्रधानमन्त्री प्रचण्ड के पक्ष में २६८ सांसदो ने विश्वास मत प्रधान किया। सरकार पक्षधर ही नहीं संसद मे बिपक्षी दल का भूमिका निर्वाह कर रहा नेपाली कांग्रेस के समर्थन के बाद प्रचन्ड ने प्रचन्ड बहुमत हासिल किया है ।
राष्ट्रिय जनमोर्चा के चित्रबहादुर केसी और नेपाल मजदुर किसान पार्टी के प्रेम सुवालने सिर्फ विपक्ष मे मतदान किया, जबकि २७२ सांसदवाली सांसदीय बैठक मे दो अनुपस्थीत और दो बिपक्षी के आलावा २६८ सांसद समर्थन के साथ प्रचन्ड नेपाल के सर्वशक्तिमान प्रधानमन्त्री बने है। नेपाल के सविधान के अनुसार दो बर्षो तक उनके उपर अविश्वास प्रस्ताव नही लगाया जा सकता है ।
नेपालमे बढी चिनी सक्रियता
नेपाल में हुई “कम्युनिस्टों की जीत” के बावजूद, चीनी रणनीतिक सर्कल के बीच ओली के साथ बने सात दलीय गठबंधन की स्थिरता को लेकर आशंका बरकरार हैं । इसकी वजह दो हो सकती है, आर्थिक मंदी से गुजर रहे यह हिमाली देश और फिर गठबन्धन मे शामिल हुए दलो कि नेपाली राजनीति की जटिलता, कारण चाहे जो हो, लेकिन नेपाल मे चिन कि कुटनिति चुनाव परिणाम के बाद काफी हद तक शांत नजर आ रही है ।
पूर्णतया ये कहा जा सकता है कि, चीनी समीक्षक इस बात से एकमत हैं कि वर्ष २०२२ में सम्पन्न हुए नेपाली चुनाव के परिणाम, चीन के लिए एक सकारात्मक प्रगति है, चूंकि सत्ता की चाभी फिर से माओ समर्थीत कम्युनिस्ट पार्टी के हाथमे गयी है। कुछ लोग इसे सीधे तौर पर अमेरिका के लिए एक “रणनीतिक असफलता” मान रहे हैं, जिनका हाल के दिनों में इस यूएस ४५ हजार, मिलेनियम चैलेंज कार्पोरेशन (एमसीसी) से है। नेपाल के संसद द्धारा एमसीसी परियोजना पास होने के बाद खास रुप से नेपाली कांग्रेस के सभापति और तत्कालिन प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउवा से व्यापक असन्तुष्ट था। भारत पक्षधर माने जाने वाले शेरबहादुर देउवा को प्रधानमन्त्री पद से हटाना ही चिन अपना सबसे बडा बिजय मान रहा है। अमेरिका के द्वारा नेपाल के भीतर आने के प्रयास को काफी धक्का लगा है।
पिछले कुछ महीनों से चीन नेपाल वार्ता के मध्य, नेपाल में अमेरिकी इनरोड का मुद्दा काफी प्रासंगिक रहा है, जहां चीनी समीक्षक नेपाल में पनप रहे इस राजनैतिक विकल्प ( ज्यादातर पश्चिम-शिक्षित नेपाली युवाओं से प्रेरित) के ट्रेंड की गंभीरता से चिंतित हैं । एक तरफ चिन घोर कम्युनिष्ट बिचारवाले नेता को राष्ट्रपति बनाने मे ओलीको अग्रसर किया है तो अमेरिका नेपाल के शीर्ष पर किसी कमजोर और गैर–साम्यवादी राष्ट्रपति को बिठाने के प्रयास में काफी सख्त लाबिंग कर रहा है।
इस नजरिए से देखा जाए तो, ओली और प्रचन्ड के बिच हुए समझौते से चीनी खेमा काफ़ी राहत महसूस कर रहा था, लेकिन प्रचन्ड को नेपाली कांग्रेस का दिया गया समर्थन के बाद फिर से चिनको बडा झटका लगा है ।
प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की हार के बाद, काँग्रेस पार्टी की अगुवाई वाली शासनरत पार्टी के गठबंधन के बिखरने के उपरांत एमसीसी का मुद्दा फिर से उठेगा और अपने क्रियान्वयन की प्रक्रिया में पुन: उसे नई परेशानियों से दो चार होना पड़ेगा। सारांश में, नेपाल में उत्पन्न नई स्थिति के बाद, चीनी समीक्षकों का ऐसा मानना है कि अमेरिकियों को अपनी नेपाली रणनीति में बदलाव करने पड़ेंगे। चीनी समीक्षकों के अनुसार, नेपाली कांग्रेस की असफलता, भारत के लिए भी एक बुरा समाचार है। ये बहस-तलब है कि दोनों ही नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र) और कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (एमाले) मूल साम्यवादी पार्टियां हैं, जो कि आनुवंशिक तौर पर कम्युनिष्ट पार्टी अफ चाइना के निकट और मनोवैज्ञानिक तौर पर न्यू दिल्ली अथवा वाशिंगटन से ऊपर बीजिंग की दिलचस्पी को वरीयता देते है।
बिआरआइ को सफलता देने मे लगा चिन
नेपाल मे चीन अपने बेल्ट और रोड प्लान में तेजी लाना चाहता है। हालाकि अभी तक नेपाल मे चिन द्धारा प्रायोजित बिआरआई की सारी परियोजना असफल और अधुरा है। फिर भी प्रस्तावित चीन-नेपाल-भारत कांरिडोर में भी आपेक्षिक गति लाना चाहती है। जिसका ज्वलन्त उदारण हाल ही में नेपाल के दो परियोजनाओ को बिआरआई से जोडकर अपना सफलता प्रमाणित करने मे लगा है। प्रचन्ड के प्रधानमन्त्री बनते ही चिन सरकार ने नेपाल के पोखरा और भैरहवा मे निर्माण हुए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट को बिआरआई परियोजना बताया है। हाल में नेपाल के पोखरा एयरपोर्ट का उद्घाटन हुआ है जो चीन की वित्तीय एवं तकनीकी मदद से तैयार हुआ है, इस परियोजना के संबंध में नेपाली आवाम में आमधारणा थी कि यह परियोजना नेपाल-चीन मैत्री के अंतर्गत चीन द्वारा प्रदत्त अनुदान की राशि से निर्मित हुआ है, लेकिन नेपाली अपेक्षाओं के विपरीत चीन ने खुलासा किया कि प्रश्नगत एयरपोर्ट चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशियटिव (बीआरआई) के तहत नेपाल को दी गई ऋण की राशि से निर्मित हुई है। नेपाल में चीनी परियोजनाओं के लिए संपादित द्विपक्षीय अनुबंधों की शर्ते आज भी पाकिस्तान की तरह नेपाली आवाम से गोपनीय रखी गई है।
नेपाल की वर्तमान सरकार और नीति–निर्धारकों के समक्ष गंभीर आर्थिक चुनौतियां हैं जिसमे नेपाल के लिए सस्ता और विकासोन्मुखी विदेशी निवेश की तलाश उत्साहवर्धक नहीं है। इसके साथ ही नेपाल के बढ़ते व्यापार घाटा, तेजी से घटते विदेशी मुद्रा भंडार और आसमान छूती महंगाई ने आम लोगों के जीवन को प्रभावित किया है।
इतना ही नहीं प्रचन्ड के प्रधानमन्त्री बनते ही चीनी ज़ोर इस बार, चीन-नेपाल रेलवे को फास्ट-ट्रैक करने पर होगा, जो कि फिलहाल अपने शुरुआती दौर में ही हैं । चीनी एक्सपर्ट पहले से नेपाल मे लगे हुए है और उसका शुरुआती अध्ययन किया जा रहा है । विभिन्न विवादों से घिरी चीनी बीआरआई को ये ना सिर्फ एक सकारात्मक पब्लिसिटी प्रदान करेगी, बल्कि ये प्रभावशाली तरीके से बढ़ते भारत के लिए भी एक कड़ा संदेश देगा।
प्रचन्ड का ढुलमुल चरित्र
नेपाल के राजनैतिक गलियारो मे प्रचन्ड ढुलमुल चरित्रीत नेता के रुपमे पहचाने जाते है। समीक्षकों का मानना है कि प्रचंड का उद्भव महज “रेत का किला” भर है। नेपाली संसद की बनावट एक हेग प्रालियामेन्ट के रुप मे है। किसी दलको बहुमत प्राप्त नही है। गणतन्त्रवादी के साथ राजावादी का मिलन, मधेसवादी के साथ संघीयता बिरोधी और प्रचन्ड के सरकार का दलिय गठबन्धन सिद्धान्त विहीन सत्ता प्राप्ति के लिए बनाए गए एक ठगबन्धन के रुपमे बताया जा रहा है। जिसके चलते राजनीतिक स्थिरता अगले पांच वर्षों में एक निम्न संभावनाओं वाली घटना साबित होने वाली है। जहां विभिन्न गठबंधन टूटेगा और फिर एकीकृत होंगी और क्रमश: एक के बाद एक, नए प्रधानमंत्री तैयार करेगी। ये कुछ ऐसा है जिससे चीनी खेमे में चिंता व्याप्त है, चूंकि उनको ऐसा विश्वास है कि ऐसी कोई भी स्थिति, अमेरिका और भारत समेत, अन्य बाहरी ताकतों को “छेड़छाड़ और हस्तक्षेप करने” की स्वतंत्रता प्रदान करेगी। ऐसी स्थिति में, चीनी खेमे को इस बात की चिंता है कि बहुमत से प्राप्त जीत के बावजूद,आखिर किस हद से नेपाली वामपंथी, चीन के मुताबिक प्रदर्शन कर पायेंगे।
नए दलों का उदय
वृद्ध होते नेताओं और इन पारंपरिक दलों को लेकर मतदाताओं में घर करती निराशा ने इन युवा जनों को राजनीति में शामिल होने के लिये न सिर्फ प्रोत्साहित किया बल्कि मददगार कारक भी साबित हुई है। इसके प्रतिफल में, चौथी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी है, जिसका पंजीकरण चुनाव के मात्र कुछ माह पहले ही चुनाव आयोग द्वारा किया गया था। उसी तरह से, दो साल पहले ही पंजीकृत हुई जनमत पार्टी भी तराई क्षेत्र में एक प्रमुख राजनीतिक दल बन कर उभरी। पश्चिमी नेपाल में, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी, जिनके नेता जो अब भी जेल में हैं, वो भी एक शक्ति के तौर पर उभर कर सामने आयी है जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।
अतीत के विपरीत, प्रवासी समुदाय ने इस बार अपने नजदीकी और प्रिय लोगों को नए चेहरे को अपना मत देने के लिए प्रभावशाली तरीके से प्रेरित किया। संसद के चुनाव में जीतने वाले राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवारों के भारी मतों से जीत प्राप्त करने के पीछे इन्हीं प्रवासी समुदायों का काफी सहयोग था।
इस दरम्यान, विविध पृष्टभूमि जैसे संगीत, पत्रकारिता या फिर उद्यमी वर्ग से संसद में चुने गए दर्जनों युवा नेता, नेपाली राजनीति के पुराने रक्षक के आधिपत्य को चुनौती देने लगे हैं । देश बदहाली, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पदोन्नति या फिर कर्मचारियों के स्थानांतरण/ट्रांसफर आदि में व्याप्त पक्षपात आदि से पूर्व-परिचित है, इसलिए देश को नई दिशा देने के प्रयास में वे सिर्फ समकालीन मुद्दों पर ही बात करना पसंद करते हैं न की पुराने आदर्शों पर।


