कविताएं
| वक्त के साथ मनीष कुमार श्रीवास्तव वक्त के बदलने में वक्त नहीं लगता, विचार बदलने का एहसास नहीं होता । मैं थी सात की सारी दुनियाँ में, सबसे अच्छे, सबसे सच्चे लगते थे मुझको पापा मेरे । मैं थी सत्रह की लगता था, सबसे पुराने, डÞरावने, ख्यालात के हैं पाप मेरे । जो नहीं जानते, वक्त कहाँ से कहाँ आ गया, पीढिÞयों का अंतर अपनापन खा गया । मै थी सताइस की हर बात पर, हर संवाद पर, चेहरा ताकती पापा का । उनका अनुभव था, करामात का । मैं हूँ सैंतालीस की हर दिन, हर पल, हर क्षण सोचती हूँ कितनी शक्ति, कितनी हिम्मत थी, मेरे पापा में । जिन्होंने हंस कर, डटकर सामना किया था, जीवन के हर बदलाव का । आज मैं जब देखती हूँ, मेरे ही ‘अंश’ मेरे विचारों से कतराते हैं मुझे दकियानूसी बताते हैं, तो फिर अनायास पापा सामने आ जाते हैं, एहसास दिलाते है,ं कि वक्त बदलने में वक्त नहीं लगता । -स्नातकोत्तर शिक्षक केन्द्रीय विद्यालय, काठमांडू |
विरह गीत नवनीत पाण्डेय पथरा गए नयन हैं अब तो रुदन में तेरे तुम अब नहीं लौटोगे ये बात जान ली है ।मेरी तो जिंदगी अब तुम तक ठहर चुकी थी जिना है बिन तुम्हारे ये बात मान ली है जो ख्वाब थे तुम्हारे और रह गए अधूरे अंजाम उसे देना है मन में ठान ली है तुम यू चले जाओगे मुझे छोडÞके अकेला झूठी हंै सारी कस्में ये बात जान ली है । रिश्ता नहीं है कोई, थी माटी की तेरी काया |
हे राम गणेश लाठ यह कैसा दुखद स्वप्न सहर अब सहर न रहा बना एक कन्क्रीट जंगल गुम हर्ुइ किलकारियाँ चहंु ओर कर्ण्र्ाादी बस रोदन व क्रन्दन ।जमीन पर बिखरे पडÞे क्षत-विक्षत इंसानी लोथडÞे मंडरा रहे चील-कौवे टकटकी लगाए बिलाव व कुत्ते मारे खुशी के लार टपका रहे घर-घर में इन्सानीयत की मौत हर नुक्कडÞ पर हैवानीयत जश्न मना रही । वो देखो भूखा-नंगा एक इन्सान हाँ, हाँ तुम जीते मैं हारा गजल भोट बैंक से भोट मिल गए जनता गई भाँड में चिकनी बोली सादे वस्त्र ऊपरी दिखावा ए प्यारे देशवासियों पहचानो इन लोगों को कहते हैं पाँच रूपये में पेट भर सकते हंै |


