“एक चादर मैली सी ” : बर्षा राठी
“एक चादर मैली सी “
माँ ने रक्त से सींचा मुझको,
उंगली पकड़ के चलाया मुझ को ।
आतताई ने लहू में डूबोया मुझको,
हाथ मरोड़ दबोचा मुझको ।
दफनाकर मेरी पुकार दीवारों में,
भिगोइ अस्मिता आंसुओं में ।
खड़ी हूं एक चादर मैली सी लिए।
कण – कण करता सवाल मुझसे,
एक माँ मेरी है, एक माँ उस की है।
परवरिश में , स्त्री जाति का सम्मान करना क्या बताया नहीं?
नारी की पीड़ा क्या सिखलाई नहीं?
पीड़ा का मर्म दिया दिखाई नहीं ।
औरत होना अभिशाप हुआ,
यहीं आकर नारी होने का खेद हुआ,
अब जीवन मेरा शाप हुआ ।
याद करती उन क्षणों को,
तिल तिल मरती जाती हूं,
रोम रोम सिहर उठता,
यह कैसा विधान विधाता ?
यूं तो जा पहुंची आसमानों में,
फिर भी भय और त्रास छिपा है गलियारों में ।
हर घर में एक रावण बैठा,
दुशासन बना है घुसपैठा ।
क्यूं मेरे जीवन का मोल नहीं?
प्रभु की अनमोल रचना हूं मैं, कोई खेल नहीं ।



