अजय कुमार झा, जलेश्वर । गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल की सगुण भक्ति के राम काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे प्रकाण्ड विद्वान, उच्च कोटि के रचनाकार, परम भक्त, दर्शन और धर्म के सूक्ष्म व्याख्याता, सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतिष्ठाता, बहुभाषाविद्, आदर्शवादी भविष्यद्रष्टा, विश्व-प्रेम के पोषक,सनातन के संरक्षक, ब्रह्मरहस्य के सहज संवाहक, लोकमंगल की भावना से परिपूर्ण तथा अद्भुत समन्वयकारी महात्मा थे। जो साहित्य हर समय प्रासंगिक हो वास्तव में वही चिरंतर, कालजयी व अमर साहित्य होता है। तुलसीदास की लोकप्रियता और प्रासंगिकता के केन्द्र में ‘राम’ हैं। उनकी भक्ति दास्य भाव की है। महाकवि तुलसीदास के रामचरितमानस सहित सभी ग्रंथों में समन्वय तथा सार्वभौम मानवता के सूत्र बिखरे पड़े हैं, जिनकी प्रासंगिकता उन दिनों भी थी आज भी है। डॉ. ग्रियर्सन से लेकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रेखांकित किया है कि तुलसीदास बुद्ध के बाद भारत के सबसे बड़े लोकनायक हैं। एक सच्चा लोकनायक ही ज्ञान और भक्ति का, शील और सौंदर्य का, सृजना और शक्ति का, सगुण और निर्गुण का, व्यक्ति और समाज का, धर्म और संस्कृति का, राजा और प्रजा का, वेद और व्यवहार का, विचार और संस्कार का समन्वय कर सकता है। लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास सिर्फ़ कवि ही नहीं बल्कि सामाजिक चेतना के महानायक भी थे। अपनी कालजयी रचना ‘श्री रामचरितमानस’ से उन्होंने समाज को जोड़ने का कार्य किया है। रामचरितमानस में तुलसी ने रामराज्य की कल्पना की और राम के रूप में राजा का आदर्श सामने रखा। ‘रामचरितमानस’ में धार्मिक-दार्शनिक, सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन मूल्यों का निरूपण प्रभावकारी ढंग से किया गया है। धर्म का उद्देश्य है मनुष्य को शुभत्व एवं शिवत्व की राह दिखा कर आत्मोन्नति की ओर अग्रसर कराना। इसके लिए तप, त्याग और धैर्य आवश्यक है। राम त्याग, तप, धैर्य, सहिष्णुता और निर्भयता के प्रतिमूर्ति है। दुनिया मे ऐसा कोई इंसान नही जो उनकी जगह ले सके। भरत के लिए आदर्श भाई, हनुमान के लिए स्वामी, प्रजा के लिए नीति-कुशल व न्यायप्रिय राजा, सुग्रीव व केवट के परम मित्र और सेना को साथ लेकर चलने वाले महान आदर्शवान व्यक्तित्व के रूप में भगवान राम को पहचाना जाता है। उनके इन्हीं गुणों के कारण उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से पूजा जाता है। यही राम तुलसी के मानस का राम है।
रामचरितमानस पर चल रहे विवाद के संदर्भ में सोचे तो क्या सैंकड़ों साल पहले लिखे गए इस महाकाव्य में किसी धनलोलुप ब्राह्मणवादी या पदलोलुप षडयंत्रकारी ने छेड़छाड़ नहीं की होगी? जो महाकवि अपने काव्य में कई उदात्त चरित्रों को गढ़ता है उसके मन में क्षुद्र विचार कैसे आ सकते हैं? जो अपने नायक को भीलों को गले लगाना,शबरी के जूठे बेर खाना ही नहीं तिरस्कृत स्त्री अहिल्या को सम्मान दिलाने जैसे प्रसंग को भाव विभोर होकर लिखता है, वह शूद्रों और स्त्री के विरोधी शब्दों को कैसे लिख सकता है? जिस तुलसीदास ने खुद तत्कालीन ब्राह्मण समाज का दंश झेला, उसका बहिष्कार किया और भाषाई स्तर पर विद्रोह किया। वह ब्राह्मणों का ऐसा समर्थक कैसे हो सकता है कि ‘ पूजिए विप्र ज्ञान गुण हीना ‘ लिख दे? जिस तुलसी ने विदेशी आक्रान्ताओं और षडयंत्रकारियों के द्वारा सनातनी के लूटते अस्मिता और नष्ट होते धरोहरों को पुनर्जीवित कर जन बोली में लिखकर वेद और उपनिषदों के गूढ़ार्थ को आम जन मानस के लिए उपलब्ध करा धर्म के ठेकेदारों की गुलामी से मुक्ति दिलाया, क्या वह जातीय क्षुद्रताओं मे डूबकर अपनी कीर्ति और इतिहास को कलंकित करेगा ? क्या यह विचारणीय विषय नहीं हैं ? साथ ही साहित्य के गहनता, जटिलता और साहित्यकार के लक्ष्य और भावों को अंतर्मन से जानने का प्रयास और विश्लेषण की बगैर उसपर कीचड़ उछालना उचित है ? हो सकता है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी की जगह तुलसीदास जी ने ढोल, गंवार, (शत्रु) / क्षुब्ध पशु, रारी लिखा हो? और किसी धन – पद लोलुप विद्वान ने अपनी दुष्टता का परिचय देते हुए इसे दूषित करने का षडयंत्र किया हो? हमें रामचरितमानस का फिर से गहन संपादन करना होगा और इस तरह कि कवि की प्रवृत्ति के विपरीत दोहे और चौपाइयों को समझकर और सुधार कर प्रस्तुत करना होगा। यह इसलिए भी बहुत जरूरी है क्योंकि रामचरितमानस केवल एक महाकाव्य ही नहीं भारतीय समाज के द्वारा सर्वाधिक पढ़ा और जीवन मे उतारा जाने वाला ग्रंथ भी है। आप किसी अनपढ़ व्यक्ति के मुंह से भी मानस की चौपाइयां सुन सकते हैं।कहने का तात्पर्य यह कि भारतीय जनमानस से रामचरितमानस को निकाला नहीं जा सकता। हां, इसका संशोधित संस्करण जरूर प्रचलित किया जा सकता है। ध्यान रहे! मानस और गीता से व्यवहार कुशलता, जीवन प्रबंधन, रणनीति, आपत्तियों का विवेक से समाधान करना, सामाजिक आचरण, धन प्रबंधन और प्रज्ञा आदि के दिव्य रूप उपलब्ध होता आया है।
हमें विचार करना ही होगा कि जिस कालखंड में ग्रंथ रचे गए तब कैसा शब्द, भाषा शैली, जाति व्यवस्था प्रचलित थी? क्या उस समय में के शासकीय स्वरूप सनातन हिन्दूओं के अनुकूल था ? क्या कवि और विद्वान लोग आज की तरह स्वच्छंद रूप से अपनी विचार को संप्रेषित करने का अधिकार रखते थे ? जरा सोचिए, जिस देश के लाखों अनमोल ग्रंथों को आक्रान्ताओं और सरकारों के द्वारा योजनाबद्ध रूप में जला दी गए हों; और सैकड़ों वर्षों तक सनातन विरोधियों का शासन रहा हो तो वहाँ के लोकप्रिय ग्रंथ बिना छेड़छाड़ किए समाज मे संचारित रह सकता है! कदापि नहीं। जो षडयंत्रकारी हमारे गुरुकुल के शिक्षा प्रणाली को नष्ट कर सकता है, शल्य चिकित्सा और विमान शास्त्र को चोरी कर सकता है। तो क्या वह प्रलोभन और दंड का भय देकर हमारे विद्वान से हमारी ग्रंथों को दूषित नहीं करबा सकता ?
हम तो वो लोग हैं जो रावण से भी ज्ञान ग्रहण करने में नहीं हिचकते। ज्ञातव्य हो, प्राचीन काल के गुरुकुल में हर जाति और संप्रदाय का व्यक्ति पढ़कर मानवता के उच्च शिखर को प्राप्त करता था। वेदों को लिखने वाले ब्राह्मण नहीं थे। वाल्मीकि रामायण किसी ब्राह्मण ने नहीं लिखी। महाभारत और पुराण लिखने वाले वेद व्यास जी निषाद कन्या सत्यवती के पुत्र थे। क्या ए लोग बिना पढ़े ही विद्वान हो गए थे? ध्यान रहे, रामचरित मानस हिंदुओं के लिए सिर्फ धार्मिक ग्रंथ ही नहीं बल्कि अनंत संस्कारों से संस्कारित जीवनदर्शन भी है। मानस कोई पुस्तक नहीं बल्कि मनुष्य के चरित्र निर्माण का विश्वविद्यालय है। और लोगों के कार्य, व्यवहार में इसे स्पष्ट देखा जा सकता है। रामचरित मानस सनातन संस्कृति के संस्कार और परंपराओं का सहस्रदल कमल है। हमारे लिए जो कुछ भी वंदनीय है, अनुकरणीय है, बचाने योग्य है, वह सब मानस में सन्निहित है। हम आज मानस मर्म और गूढ़ार्थ को समझने में असमर्थ हैं। शबरी, भील, केवट, अहिल्या, को नहीं समझ पा रहे हैं। जिन्हें हम वानरों और रीछों की सेना कहते हैं, वो इस हमारे आदिवासी संस्कृति के धरोहर हैं। जिन्हें हम वंचित मान बैठे हैं, वो ही तो राम जी की लड़ाई के असली योद्धा, असली नायक रहे हैं। मानस का हर दोहा, छंद, चौपाई, सनातन के अनुपम, अतुल्य, सर्व समाहित जीवंत परंपरा का द्योतक है। मानस का अपमान स्वयं मे सनातन मर्म का अपमान है। अतः विवेकपूर्ण ढंग से उत्पादन मूलक प्रतिक्रिया होना आवश्यक है।
गोस्वामी तुलसीदास ने जब रामचरित मानस रचा उस समय समाज की स्थिति क्या थी, ये जाने बिना आज उनकी चौपाइयों पर विवाद खड़ा करने का मतलब क्या है? दरअसल यह वोट की राजनीति है। संगठित समाज को जातिगत टुकड़ों में बाँटने का एक सोचा-समझा उपक्रम माना जा सकता है। हर कोई जानता है कि अंग्रेजों ने भी लोगों को बाँटकर सत्ता हासिल किया था। धर्म ग्रंथों को निशाना बनाकर समाज के इसी तरह टुकड़े किए गए थे जिस तरह आज वामपंथी लोग करने पर तुले हुए हैं। राम के चरित्र पर विवाद उठाने वाले श्रीराम विशाल व्यक्तित्व से कोसों दूर खड़े हैं। श्रीराम ने शास्त्रों के ज्ञाता, प्रकाण्ड विद्वान और ब्राह्मण कुल के रावण और उसके संपूर्ण कुल को नष्ट कर दिया फिरभी किसी ब्राह्मण को फर्क नहीं पड़ता लेकिन प्रक्षेपित शंबूक वध पर वामपंथियों का हृदयघात होने लग गया है! क्या यह महत्व नहीं रखता कि श्रीराम ने शबरी के झूठे बेर खाए थे और केवट को गले लागाकर अपना परम मित्र बनाया था। जटायु गिद्ध का अपने पिता के समान श्राद्ध किया था। वे कोल, भील, किरात, आदिवासी, वनवासी, गिरीवासी, कपिश अन्य कई जातियों के साथ जंगल में रहे और उन्हीं के दम पर उन्होंने रावण को हराया भी था तब मात्र शंबूक वध पर आप कैसे यह मान सकते हैं कि उनमें जातिवादी भावना थी? क्या शंबूक नामक पात्र और घटना हमारे आदर्श ग्रंथों के महिमा को नष्ट करने के लिए क्षेपण नहीं हो सकता ?
आगे आते हैं; (पूजहि विप्र सकल गुण हीना, पूजहि न शूद्र गुण ज्ञान प्रवीणा।।)
तुलसीदास जी की इस चौपाई का इस तरह गलत अर्थ निकाला जाता है- ब्राह्मण चाहे कितना भी ज्ञान गुण से रहित हो, उसकी पूजा करनी ही चाहिए, और शूद्र चाहे कितना भी गुणी ज्ञानी हो, वो सम्माननीय हो सकता है, लेकिन कभी पूजनीय नहीं हो सकता। इस चौपाई के अर्थ को समझने के लिए पहले समझना होगा कि विप्र कौन? तुलसीदासजी ने विप्र शब्द का प्रयोग किया है ब्राह्मण का नहीं। मनु स्मृति की निम्नलिखित चौपाई से विप्र का अर्थ समझें तो अच्छा होगा। ( जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् भवेत द्विजः। वेद पाठात् भवेत् विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।।) अर्थात– व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है। यानी यदि विप्र अर्थात वेद-पठन करने वाला व्यक्ति और ब्रह्माण यानी ब्रह्म को जानवे वाला व्यक्ति। अब यदि विप्र ने भले ही उस सारे वेद ज्ञान को आत्मसात नहीं किया है, सारे गुणहीन हो लेकिन वह पढ़ा-लिखा है इसीलिए वह पूज्जनीय है। शुद्र वेद प्रवीणा का अर्थ हुआ ऐसा व्यक्ति जो सारी किताबे पढ़-पढ़ के प्रवचन बांचता रहता है उसका मर्म नहीं समझता है और वह उसका अर्थ नहीं जानता है। फिर भी वो उसका दम्भ करता है पांडित्य दिखाता रहता है। ऐसे लोग पूज्जनीय नहीं है। इस सब के वावजूद हमें ध्यान इसपर देना चाहिए कि सत्य को शतप्रतिशत शब्दों मे ढालना सत्य को शब्द से तुच्छ बनाना होगा जो संभव नहीं है। अतः इस धर्म के सूक्ष्म पक्ष हमेसा विवाद का विषय बना ही रहेगा। यह मनुष्य के अन्तः प्रज्ञा पर निर्भर करता है। जिस प्रकार अणुबम के सूत्रों को सामान्य बुद्धि के लोगों को नहीं समझाया और न दिया जा सकता है उसी प्रकार आध्यात्मिक रहस्यों को भी आम लोग नहीं समझ सकते और नहीं समझाया जाना चाहिए। यह तो ध्यान और तप के माध्यम से अनुभव करने का विषय है।
ध्यान देने की बात है; कि भारत के राजनैतिक दिवालिया शूद्रों को पिछले 450 वर्षों में कवि शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाग्रंथ ‘श्रीरामचरितमानस’ की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र 1 ही चौपाई पढ़ने में आ पाई है और वह है भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय का अंश है जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है ( ढोल गवार सूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी॥) इस सन्दर्भ में चित्रकूट में मौजूद तुलसीदास धाम के पीठाधीश्वर और विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री राम भद्राचार्य जी (जो की नेत्रहीन होने जे बावजूद संस्कृत,व्याकरण,सांख्य,न्याय,वेदांत, में 5 से अधिक GOLD Medal प्राप्त कार चुकें है। )
महाराज का कहना है कि बाजार में प्रचलित रामचरितमानस में 3 हजार से भी अधिक स्थानों पर अशुद्धियां हैं और इस चौपाई को भी अशुद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है। इसी उद्देश्य के पूर्ति के लिये उन्होंने अपने स्वयं के द्वारा शुद्ध की गई अलग रामचरित मानस प्रकाशित कर दी है। इसके साथ ही स्वामी राम भद्राचार्य का दावा है कि रामायण में लंका कांड जैसी कोई चीज ही नहीं है। असल में ये युद्ध कांड है जो लंका कांड के नाम से छपा जाता है। स्वामी जी कहते हैं कि संस्कृत की किसी भी रामायण में लंका कांड शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। तुलसीदास जी की सबसे पुरानी चौथी प्रति मानी गई है जो व्यंकटेश प्रेस बम्बई से छपी थी। उसमें भी युद्ध कांड है लंका कांड नहीं है। रामभद्राचार्य कहते हैं, ‘धार्मिक ग्रंथो को आधार बनाकर गलत व्याख्या करके जो लोग हिन्दू समाज को तोड़ने का काम कर रहे है उन्हें सफल नहीं होने दिया जायेगा।’ यदि कोई व्यक्ति या समुदाय विधर्मियों या पाखंडियों के कहने पर अपने ही सनातन को माध्यम बनाकर, उसे गलत बताकर अपना स्वार्थ सिद्ध करता है तो ऐसे विकृत मानसिकता वालों को भगवान् सद्बुद्धि दे, तथा सनातन पर चलने की प्ररेणा दे। बस इतना ही कहा जा सकता है।
आज के युग में यह बहुत ही संवेदनशील विषय है जिस की समीक्षा करना तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है| इसको लेकर विधान मंडल में जहाँ यह चौपाई लिखी है ,उस पन्ने तक को फाडा़ गया | आज अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग,अनेक दलित संगठन,महिला आयोग,मानवाधिकार आयोग अनेकानेक दलित संगठन, महिला संगठन, कतिपय तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा वाले संगठन और पल्लवग्राही बुद्धिवादी जन; यदि गोस्वामी तुलसीदास जी को पा जाते तो शायद सब मिलकर उनकी पूँछ उखाड़ डालते किंतु विचित्र किंतु सत्य यह है कि तुलसी दास जी की पूछ देश विदेश तक में बढ़ती जा रही है,उन पर इन आलोचनाओं का कोई फर्क नहीं पड़ता।
हिंदी संस्कृत से निःसृत भाषा है और हिंदी में अवधी,भोजपुरी,बाँगरू,ब्रजभाषा,बुंदेलखंडी जैसी अनेक क्षेत्रीय बोलियाँ हैं जो सभी समृद्ध है और सबमें प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन हो चुका है, हो रहा है, होता रहेगा। हिंदी समस्त को अपने में संवृत किए हुए है। ध्यान देने की बात यह है कि संस्कृत में ‘ड़’वर्ण है ही नहीं,वहाँ केवल ‘ड’ है। जैसे वहाँ ‘चूडाकर्ण’ है ‘चूड़ाकरन’ नहीं,’ताड्’ धातु है ‘ताड़’ नहीं। यह हिंदी की अपनी विशिष्टता है।
[हस्तिना ताड्यमानोsपि न गच्छेज्जैनमंदिरम।] (मनुस्मृति)
संस्कृत में ताड् धातु निश्चित ही पीटने के अर्थ में प्रयुक्त होती है किंतु हिंदी की अवधी और बुंदेलखंडी में ताड़ना बहु अर्थी शब्द है। यह भी ध्यान रहे कि ‘ताड़ना’ ओर ‘प्रताड़ना’ में बहुत फर्क है। प्रताड़ना मारने अर्थ में रूढ है किंतु ताड़ना अनेकार्थी होने से लचीला है। यह बहुअर्थी ‘ताड़ना’ शब्द अवधी और बुंदेलखंडी है जिन दोनों का घनिष्ठ संबंध गोस्वामी तुलसी दास जी से रहा है। इन दोनों ही बोलियों में ताड़ना का अर्थ संरक्षण,परखना,भाँपना,सँभाल के रखना,समझना,पहचानना,परखना,रेकी करना ..आदि अनेक अर्थों में होता है। जैसे:- अवधी: “ए हो भैय्या तनी वहिका ताडे़ रह्यौ जो मिलि जाइ तौ हमका बताइ दिह्यौ।” बुंदेलखंडी में क्रिया के अंत में ‘बो ‘और ‘ओ’ या ‘यो’ का प्रयोग होता है। जैसे :- ‘बुंदेलखंडी’-(जो बाँदा में राजापुर के आस-पास बोली जाती है। उदाहरण-
“भैय्या मोरी बछिया खों ताड़े रखिओ “
“इतै सुनउ तनक लरका बच्चन खों ठीक से ताड़त रहियो |” अब सोचिए जरा यहाँ ;हीं भी ताड़ना का प्रयोग क्या पीटने के अर्थ में हुआ है ? आगे निर्णय आप को करना है।
साहित्यकार और संत का अपना अलग ही संसार होता है। और शब्द भले ही हमारा हो, लेकिन भावार्थ हमसे पड़े का होता है। [ “ज्यों केले के पात मे पात पात मे पात। त्यों संतों के बात मे बात बात मे बात।”]
इसमें पहला ‘संत’चेतन हैं किंतु बाद के चारों ‘विटप,सरिता,गिरि,धरनी’ जड़ हैं; किंतु सबके कार्य परोपकारी होने के कारण प्रथम चेतन (संत) शब्द देकर उनके कृत्यों को भी चैतन्यवत मान लिया। अतः यह भी प्रथम ढोलवत जड़ की भाँति शेष जड़वत व्यवहार करने वालों के प्रति उक्तार्थ अध्यारोपित किया जा सकता है। श्री हौज़ जी और गाँधी जी के मतानुसार भी केवल इसी आधार पर तुलसी को शूद्र व स्त्री विरोधी नहीं ठहराया जा सकता है। अथवा डंडे खाने से कोई जड़ मान लिया जाए ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है। जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार कवि जो दूसरों के मुख से कहलाता है वह उसकी उक्ति नहीं हो सकती। वह पात्रानुसार कथोपकथन कराता है अन्यथा वह पात्रों के चरित्र-चित्रण में असफल माना जाएगा। उसका समर्थित सिद्धांत वही मानना चाहिए जो वह अपने आदर्श पात्रों से कहलाए। आदर्श पात्रों की भी देश,काल परिस्थितियो का अवलोकन करने के बाद ही मूल्यांकन करना चाहिए।
जैसे:- [ कौने अवसर का भयेउ गयेउँ नारि विश्वास।”] यहाँ पर नारी कैकेयी के जाल में फँसने के कारण महाराज दशरथ ने कैकेई के लिए कहा है नकि समस्त नारी जाति के लिए।
[ का न करै अबला प्रबल..] में तुलसी ने कैकेयी के प्रति अयोध्यावासियों का जनाक्रोश व्यक्त किया है नकि अपनी भावना। इस तरह हमें अपनी प्रज्ञा का परिचय देते हुए संत के दिव्य उपदेश तथा साहित्यकार के अंतर्निहित भावों के प्रकटीकरण को बुद्धि और तर्क से नहीं वल्कि विवेक और हृदय से समझने तथा आत्मसात करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
अब निष्कर्ष के रूप मे वर्तमान के राजनीतिक कुरुक्षेत्र की ओर चलते हैं। विपक्षियों के लिए अनेकानेक हिन्दू विरोधी एजेंडाओं को प्रकाशित करनेवाले बिधर्मी वामियों के इसारों पर अपनी ही संस्कृति, साहित्य, धार्मिक ग्रंथ, संस्कार, पर्व, त्योहार, रीतिरिबाज, सामाजिक परंपरा को धज्जियां उड़ानेवाले आत्मघाती मूढ़ता के शिरोमणि तथा सत्ता लोलुप देशद्रोही सियारों को सायद यह जानकारी नहीं है कि जिस पिछड़े, जनजाति, अनुसूचित और दलित के अपमान का षडयंत्र युक्त हवाला देकर सत्ता के गलियारों का बादशाह बनाना चाहते हैं, उस दौर मे भी मोदी जी तुमसे आगे हैं। ‘नरेन्द्र मोदी’ जी पिछड़े वर्ग के हैं ‘तेली’ जाति से जो पिछड़े वर्ग से आते हैं; अब रह गई अनुसूचित जनजाति और महिला? तो, वह हैं ‘द्रौपदी मुर्मू’ जी, जो महिला भी हैं और आदिवासी अनुसूचित जनजाति से भी हैं; जिन्हे राष्ट्रपति बनाया ‘भाजपा’ ने। रही बात अनुसूचित जाति दलित वर्ग की तो मुर्मू से पहले राष्ट्रपति ‘रामनाथ कोविन्द’ को राष्ट्रपति बनाया था ‘भाजपा’ ने। उत्तर प्रदेश में दलित महिला मायावती जी को मुख्यमंत्री बनाया था ‘भाजपा’ ने। मुलायम सिंह जी ने गेस्ट हाउस में उनके साथ क्या किया था? सबको पता है। रामनाथ कोविन्द और मुर्मू के खिलाफ किस-किस ने मतदान किया था ,याद ही होगा। इसलिए अब भारतीय जनता को ‘भाजपा’ को ही वोट और सपोर्ट करना है ताकि तुलसी बाबा और ब्राह्मणों को मुहतोड़ जवाब मिल सके। दलित की झूठी शिकायत पर बिना जाँच किए 6 महीने जेल पहुँचाने की हिम्मत रखने वाले पिछड़े वर्ग के तेली जाति वाले, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों को अच्छे पदों पर पहुँचाने वाले, मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने वाले और चाय बेचने वाले को फिर से प्रधानमंत्री बनाना है। पुरानी पीढ़ियों का सारा बदला चुकाना है। साथ ही नीचे के दिव्य उपदेशों के लिए भी तैयार रहना है।