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नेपाल की तबाही याद दिलाता तुर्की–सीरिया का विनाशकारी भूकम्प : डॉ. श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, हिमालिनी अंक फरवरी । धरती के गर्भ में एक हलचल होती है और उसकी विनाशकारी लीला हजारों की जानें लील जाता है । एक समय था जब हम कभी कभी भूकम्प की चर्चा सुना करते थे । बड़े बुजुर्ग अपने समय की कहानियाँ सुनाया करते थे । किन्तु आज अक्सर हम भूकम्प की घटनाओं को सुनते हैं । प्रायः किसी ना किसी देश में भूकम्प की घटना घट रही है । कहीं ये पृथ्वी के नष्ट होने की चेतावनी तो नहीं ? जिसे हम मानव ही निर्मित कर रहे हैं । तुर्की का भूकम्प दिल को दहला रहा है । देखते देखते इमारतों का जमींदोज होना और उस मलबे में दबी साँसे, लाशों की बढ़ती संख्या हमें विचलित कर रही हैं । तबाही का यह मंजर २००१ में गुजरात के भुज आए भूकम्प और २०१५ में नेपाल में आए भूकम्प की यादों को ताजा कर गया ।

वर्ष २००१ में गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंप से २०,००० से अधिक लोगों की मौत हुई थीं । इस तबाही में डेढ़ लाख से अधिक लोग घायल हुए थे । भूकंप ने हजारों लोगों को बेघर कर दिया था । २६ जनवरी की वह सुबह जब भारत अपना गणतंत्र दिवस मना रहा था । स्कूलों में धूमधाम से ध्वजारोहण के कार्यक्रम हो रहे थे । राष्ट्रीय पर्व के उल्लास में लोग डूबे हुए थे । आम लोग अपने रोज के काम में लगे थे । सबकुछ ठीक था । गणतंत्र दिवस का पर्व मनाया जा रहा था, लेकिन सुई की घड़ी जैसे ही सुबह ८ः४६ मिनट पर पहुंची तो गुजरात के भुज और आसपास दो मिनट में सबकुछ तबाह हो गया । ७.७ तीव्रता के भूकंप ने २० हजार से ज्यादा लोगों की जान ले ली और भुज में भारी तबाही हुई । भचाऊ और अंजार तालुका के सैकड़ों गांव प्रभावित हुए । इस भयावह भूकंप हादसे के २२ साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी जब कैलेंडर में २६ जनवरी की तारीख आती है, तो रात को लोग सो नहीं पाते हैं । भूकंप की त्रासदी झेलने वाले भुज के लोग जागते हैं । वहाँ के लोग आज भी उस घटना को नहीं भूल पाए हैं । गुजरात के भुज में आए भूकंप को गुजरात भूकंप के नाम से जाना जाता है । इसी त्रासदी के बाद नरेंद्र मोदी को राज्य की कमान मिली थी । उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री कच्छ जिले भुज में भूकंप से तबाह हुए गांवों और कस्बों के पुर्नवास के काम की अगुवाई की थी, इसके लिए जहां दुनियाभर से मदद मिली थी तो वहीं राज्य सरकार ने युद्धस्तर पर काम करके भुज को फिर से खड़ा कर दिया था । कभी न भूलने वाले इस त्रासदी की याद में भुज में एक स्मृति वन भी बनाया गया है । जहां पर इस भूकंप से तबाही और फिर उठ खड़े होने के साहस भरे पुर्नवास मिशन को प्रदर्शित किया गया है ।

इसी तरह २५ अप्रैल २०१५ को नेपाल थर्रा उठा था । घड़ी की सुई १२ पर गई और जिन्दगी की रफ्तार बदल गई । अप्रत्यासित और असामान्य एक कम्पन ने अपनी ही गति से चल रही जिन्दगी की गति को बदल दिया । २५ अप्रैल नेपाल के लिए वो काला दिन साबित हुआ जिसने उसे कई वर्ष पीछे धकेल दिया । उस समयसंक्रमण काल की दौर से गुजरता नेपाल कई आन्तरिक मामलों से जूझ रहा था किन्तु इस अप्रत्यासित घटना ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया । भौतिक सम्पदा, ऐतिहासिक धरोहर और हजारों मानवीय क्षति ने देश की अवस्था को चरमरा कर रख दिया था । देश ने ८२ वर्ष के बाद इस आपदा को झेला था । इस महाभूकम्प से राजधानी में जहाँ भोटाहिटि, असन, ठमेल, वसन्तपुर, धरहरा, चावहिल, बालाजु, सिंह दरबार, सांखु, भक्तपुर और ललितपुर क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हुए थे, वहीं राजधानी से बाहर धादिंग, सिन्धुपाल चौक, काभ्रेपलान चौक, नुवाकोट, रसुवा, गोर्खा, लमजुंग, पाल्पा, कास्की आदि जिला महाभूकम्प से बुरी तरह प्रभावित हुए थे । सात दशमलव नौ रेक्टर का यह भूकम्प वि.सं.१९९० के बाद का दूसरा बड़ा भूकम्प था । जिसका केन्द्र बिन्दु गोर्खा का बारपाक क्षेत्र माना गया था । १९९० साल में आए भूकम्प का केन्द्रबिन्दु भारत के बिहार का मधुबनी और सीतामढ़ी का क्षेत्र था । किन्तु वहाँ से अधिक क्षति नेपाल में हुई थी । इतिहास के अनुसार उस वक्त भारत में जहाँ ७ हजार १८८ लोगों की मृत्यु हुई थी वहीं नेपाल में ८ हजार ५१९ लोगों की जानें गई थीं । २०१५ के महाभूकम्प में तो मृत्यु का आंकड़ा दस हजार से भी अधिक थी और लाखों की संख्या में लोग इससे प्रभावित हुए थे । जनमानस की बर्बादी का यह आँकड़ा और भी अधिक हो जाता, अगर यह विनाश किसी और दिन होता । दिन छुट्टी का था, कार्यालय बन्द थे, स्कूल बन्द थे, नहीं तो स्थिति की भयावहता की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है । राष्ट्रसंघ के अनुसार ८० लाख नेपाली इस आपदा से प्रभावित हुए थे । इस विनाशकारी भूकम्प से लगभग बीस खर्ब की क्षति का अनुमान लगाया गया था । अमेरिकी जियोलोजिकल सर्वे ने लगभग सात अर्ब अमेरिकी डालर(सात खर्ब रु.) और अधिक से बीस खर्ब रु. क्षति होने का अनुमान लगाया था ।

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जानकारों का कहना है कि अक्सर पचास से सौ साल के अन्दर नेपाल और इसके आसपास का क्षेत्र विनाशकारी भूूकम्प के चपेट में आता रहा है । नेपाल और उसके आसपास में ऐसा क्यों हो रहा है, सवाल उठना स्वभाविक है । कहा जाता है कि हजारों साल पहले हिमालय क्षेत्र समन्दर का हिस्सा हुआ करता था । इस जल क्षेत्र को अब टेथिस सागर का नाम दिया गया है । भू–वैज्ञानिकों के मुताबिक इस क्षेत्र के भूगर्भ में उत्तर की युरेशियाई वा तिब्बती और भारतीय प्रायःद्वीप की चट्टानें मिलती हैं और दोनों के बीच आपस में टकराव व दबाव बना रहता है । जिसके चलते ये चट्टानें सालाना कुछ सेंटीमीटर आगे की ओर खिसकती है । नतीजा यह होता है कि भूगर्भ में भौगोलिक गतिविधियां सक्रिय रहती हैं । इसी सक्रियता के कारण टेथिस सागर का भू–सतह बीते किसी कालखण्ड में उपर उठा और हिमालय बना और टेथिस सागर का अस्तित्व ही समाप्त हो गया । भूगर्भ की सक्रियता इतने बड़े प्रलय को अन्जाम दे सकता है तो निश्चित है हम जोखिम भरे जमीन के वासी हैं अ‍ौर हमें सतर्कता बरतनी ही चाहिये । भूगर्भ की सक्रियता पर हम सिर्फ बातें कर सकते हैं । उसकी परिणति को भुगतने के अलावा मानव के पास दूसरा चारा नहीं है । एकबात और भी साफ हो जाती है कि हिमालय के आसपास की जमीन की संरचना नई और कमजोर भी है । इन सभी कारणों का मिलाजुला परिणाम जमीन पर, भूस्खलन और हिमालय क्षेत्र में हिमस्खलन, हिमतालों के फटने जैसे तमाम मानव प्रतिकूल विपदाओं का जन्म हो रहा है । हमारे वश में सिर्फ इतना है कि हम भूकम्प के दौरान क्षति न्यून करने के लिए जागरुक रहें और हमारे विकास को अनुकूल बनाएं । क्योंकि नेपाल की भौगोलिक स्थिति को तो बदला नहीं जा सकता है । तुर्की के भूकम्प ने जनमानस को एक बार फिर से चिंतित कर दिया है ।

तुर्किये और सीरिया में ६ फरवरी की सुबह ७.८ तीव्रता की भूकंप आया और उसके बाद भी लगातार तेज झटके महसूस हो रहे हैं । मृतकों का आंकड़ा ग्यारह हजार से अधिक पहुँच चुका है । भूकम्प की तबाही के बाद लोग कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे जीने के लिए बाध्य हैं । पड़ोसी सीरिया में बचावकर्मियों ने चेतावनी दी है कि मरने वालों की संख्या बढ़ती रहेगी क्योंकि मदद पहुँच नहीं पा रही है । लोगों की शिकायत है कि न तो टेंट है न ही दवा और खाना । उनका कहना है कि कहीं कोई बचाव दल नहीं दिख रहा । जो भूकंप से बच गए हैं, लेकिन अब भूख, ठंड और दवा के अभाव के कारण मर रहे हैं ।
तुर्किये के राष्ट्रपति तैयब एर्दोआन ने १० प्रांतों में आपातकाल की घोषणा कर दी है । लेकिन तुर्किये के कई शहरों में रहने वाले लोगों ने अधिकारियों की धीमी और अपर्याप्त प्रतिक्रिया पर नाराजगी और निराशा जता रहे हैं । भूकंप ने अस्पतालों, स्कूलों और अपार्टमेंट ब्लॉक सहित हजारों इमारतों को गिरा दिया है, हजारों लोगों को घायल कर दिया है, और तुर्किये और उत्तरी सीरिया में अनगिनत लोगों को बेघर कर दिया है । तुर्किये के अधिकारियों का कहना है कि बोस्टन और फिलाडेल्फिया या एम्स्टर्डम और पेरिस के बीच की दूरी की तुलना में पश्चिम में अदाना से १३.५ मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं ।

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तुर्किये की आपदा प्रबंधन एजेंसी ने कहा कि घायलों की संख्या ३८,००० से अधिक है । उत्तरी सीरिया के जांदारिस शहर में मलबे के नीचे बचाव कर्मियों और निवासियों ने कहा कि दर्जनों इमारतें ढह गई हैं । इमारत के मलबे के आसपास खड़े लोगों ने कहा कि उन्होंने किसी को जिंदा नहीं देखा था । बड़े कंक्रीट स्लैबों को हटाने के लिए भारी उपकरणों की कमी बचाव प्रयासों को बाधित कर रही थी ।
बचाव कर्मियों ने खराब सड़कों, खराब मौसम और संसाधनों और भारी उपकरणों की कमी से प्रभावित कुछ क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रहे हैं । कुछ इलाकों में बिजली और ईंधन नहीं है । सहायता अधिकारियों ने सीरिया की स्थिति के बारे में विशेष चिंता व्यक्त की है, जहां मानवीय जरूरतें पहले से ही कम है । सीरिया में विद्रोहियों के कब्जे वाले उत्तर पश्चिम में चल रही एक बचाव सेवा ने कहा कि मृतकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और उतनी ही घायलों की संख्या भी बढ़ रही है । मलबों के नीचे अभी भी सैकड़ों लोग दबे हुए हैं । स्थिति भयावह है । लोग लाचार हैं । राहत एवं बचाव कार्य जारी हैं । अभी तक करीब आठ हजार लोगों को बचाया जा चुका है । कई दशकों बाद आए ऐसे विनाशकारी भूकंप से हालात बेहद भयावह हैं । दृश्य यह है कि इमारतें, सड़कें, गाडि़यां समेत हर चीज तबाह हो चुकी हैं । हर तरफ मलबा ही मलबा नजर आ रहा है । चारों तरफ लाशें दिख रही हैं और उनमें अपनों को तलाशते लोग । मलबे से लगातार शव निकल रहे हैं और सड़कों पर दौड़ती एंबुलेंस, पुलिस के सायरन और पीडि़तों की चीखें सारे हालात खुद–ब–खुद बयां कर रही हैं । अस्पताल भी घायलों से भरे हुए हैं । राहत एवं बचाव टीमें हर पल मदद में जुटी हैं ।

बचावकर्मी बड़ी सावधानी से कंक्रीट के पत्थर और लोहे की छड़ों को हटा रहे हैं ताकि मलबे में यदि कोई भी जीवित बचा हो तो उसे सुरक्षित निकाला जा सके । मलबे से किसी के चिल्लाने की आवाज आती है तो बचाव टीमें और शिद्दत से अपने मिशन में जुट जाती हैं । जिंदा बचाए जाने की सूरत में लोग नारेबाजी कर इन टीमों का उत्साहवर्धन कर रहे हैं । जैसे ही मलबे से किसी घायल को राहत कर्मी बाहर निकालकर लाते हैं, लोग उस तरफ दौड़ पड़ते हैं, इस आस में कि कहीं वह उनका प्रियजन तो नहीं । भूकंप प्रभावित क्षेत्रों के लोगों ने शापिंग माल, स्टेडियम, मस्जिद और सामुदायिक केंद्रों में शरण ली हुई है । इसके अलावा भयभीत कुछ लोग सड़कों पर भी हैं । भूकंप के बाद आने वाले झटकों से बार–बार धरती हिल रही है, जिसकी वजह से लोग दहशत में हैं । सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर दिल को हिला देने वाली कई तसवीरें सामने आ रही हैं । जिन्दगी को इस तरह लाचार और बेबस देखना निःसन्देह बहुत दर्दनाक है ।
कुछ महीने बाद तुर्की में चुनाव होने वाला था । लेकिन इस बीच तुर्किये के सबसे घातक भूकंप ने एर्दोआन को एक बड़ी बचाव और पुनर्निर्माण चुनौती दी है, जो मई के चुनाव तक के लिए पहले से ही अपने दो दशकों के कार्यकाल में सबसे कठिन साबित होगा ।

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डब्ल्यूएचओ विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस आपदा में मरने वालों की संख्या वर्तमान से आठ गुना तक पहुंच सकती है । उसने कहा कि भूकंप के मामलों में अक्सर देखा जाता है शुरुआत में मृतकों व घायलों की जो संख्या आती है, उसमें बाद में तेजी से इजाफा होता है । डब्ल्यूएचओ ने साथ ही भूकंप के चलते बेघर हुए लोगों के लिए भी चेतावनी दी कि ठंड से उनकी मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती है ।
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने अंतराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की थी, जिसके बाद करीब ७० देशों ने राहत सामग्री और मेडिकल टीम भेजी हैं । इस विपदा की घड़ी में तुर्की के साथ विश्व खड़ा है और सहयोग दे रहा है । इसमें यह भी गौर करने वाली बात है कि भारत का तुर्की कभी भी मित्र नहीं रहा है । वह अक्सर भारत के शत्रु देश के साथ खड़ा रहता है । फिर भी भारत ने सबसे पहले सहयोग देने की अपील ही नहीं की बल्कि अपने डाक्टर और दवाओं को भेजा है । प्रधानमंत्री मोदी के निर्देश के बाद राहत सामग्री लेकर कुछ विमान उत्तरप्रदेश के हिंडन एयरबेस से तुर्किये भेजे गए हैं । इसमें दवाइयों और ड्रिल मशीन के अलावा एनडीआरएफ की टीमें भी शामिल हैं । १०० से ज्यादा एनडीआरएफ जवान तुर्की में प्रभावितों की मदद करेंगे ।

३० बेड के मोबाइल हॉस्पिटल के साथ मेडिकल सप्लाई, ड्रिलिंग मशीन समेत कई सामान लेकर ये टीम तुर्की पहुंच चुकी है । भारतीय एयरफोर्स का एक विमान करीब ६ टन राहत सामग्री लेकर सीरिया भी रवाना हो गया है । यह भारत के प्रधानमंत्री की मानवतावादी सोच को दर्शाता है । उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस मुश्किल की घड़ी में भारत की जनता तुर्की के साथ है । नेपाल के लिए भी सबसे पहला सहयोग का हाथ भारत का ही आया था । पूरी दुनिया से २४ हजार राहतकर्मी बचाव कार्य में लगे हैं ।
विपदा आती है और चली जाती है । किन्तु क्या सचमुच विपदा चली जाती है ? यह प्रश्न मानव जाति को खुद से करने का और प्रश्नोत्तर भी ढूँढने का समय है । हम यह कह कर संतुष्ट हो जायँ कि यह प्राकृतिक आपदा थी उचित नहीं होगा क्योंकि कहीं–ना–कहीं ऐसी आपदा मानव द्वारा ही निमंत्रित होती है । प्रकृति के साथ हम खिलवाड़ कर रहे हैं । भूकम्प आना कोई असामान्य घटना नहीं है । वह पृथ्वी के गर्भ में होना तय होता है । उसकी अपनी गति होती है । पर उससे होने वाली भौतिक क्षति के लिए स्वयं मानव जिम्मेदार होता है । ऐसे आपदाओं से होने वाले क्षति को पूरी तरह से रोका तो नहीं जा सकता किन्तु, उससे होने वाली क्षति की मात्रा को कम तो किया ही जा सकता है । आज अगर काठमान्डौ को ही सिर्फ लिया जाय तो उसकी संरचना को देखकर यह कहा जा सकता है कि आज जो क्षति हुई है यह इससे भी अधिक हो सकती थी, और इस सम्भावना से इन्कार ही नहीं किया जा सकता है । बड़े–बड़े अपार्टमेन्ट, माल, जगह छोटी हो या बड़ी कई–कई मंजिलों की इमारतें, घरों के ऊपर घर, जन समुदाय का सैलाब क्या यह आपदाओं के समय मौत का कारण नहीं बनते ? भूकंप एक प्राकृतिक आपदाएं जो मानव के वश में नहीं है । हम इसे न तो नियंत्रित कर सकते हैं और नहीं उसे रोक सकते हैं । अगर हमारे वश में कुछ है तो वह यह कि हमें यथासंभव प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने से बचना चाहिए ।

डॉ श्वेता दीप्ति
सम्पादक, हिमालिनी ।

 

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