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नेपाली स्वाधीनता के लिए चीन खतरनाक है : संतोष कुमार मेहता

 

संतोष कुमार मेहता, काठमांडू, हिमालिनी, अंक फरवरी । नेपाल में कम्युनिष्ट गठबंधन की सरकार आने के बाद चीन की सक्रियता फिर से बढ़ गई है । नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के अस्तित्व में आते ही यहां चीनी प्रभाव बढ़ जाता है । यह संयोग हो सकता है कि प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद पोखरा हवाई अड्डे का उद्घाटन किया गया था, लेकिन पिछले तीन वर्षों से बंद केरुंग–रसुवागढ़ी–काठमांडू रेलवे की व्यवहार्यता का अध्ययन करने के लिए चीनी तकनीकी टीम का नेपाल पहुंचना, ऋण सहायता लेते, हस्ताक्षर करते और सौंपते समय पोखरा हवाई अड्डे को कभी भी बीआरआई के तहत एक परियोजना के रूप में उल्लेख नहीं किया गया था, लेकिन पोखरा हवाई अड्डे के उद्घाटन की पूर्व संध्या पर और नेपाल के प्रधान मंत्री प्रचंड की उपस्थिति में अचानक चीनी राजदूत द्वारा बीआरआई के तहत एक महत्वपूर्ण परियोजना की घोषणा कर दी । यह सब निश्चित रूप से संयोग नहीं हो सकता है ।

दूतावास के प्रवक्ता के आधिकारिक ट्विटर पर लिखा है, ‘यह (पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा) नेपाल–चीन बीआरआई सहयोग की एक बड़ी परियोजना है । नेपाल सरकार और नेपाल के लोगों को बधाई ! जबकि पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को चीन के एक्जिम बैंक से उच्च ब्याज ऋण के साथ बनाया गया है । नेपाल सरकार आगामी मार्च से ब्याज और ऋण दोनों का भुगतान करने के लिए बाध्य है । बीआरआई दुनिया में अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की परियोजना है । नेपाल ने भी १२ मई, २०१७ को इस पर हस्ताक्षर किए । नेपाल ने बीआरआई के तहत नौ परियोजनाओं का भी प्रस्ताव दिया है । प्रस्तावित परियोजना में एयरपोर्ट निर्माण का कोई उल्लेख नहीं है । लेकिन चीनी कार्यवाहक राजदूत की टिप्पणी ‘पोखरा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का निर्माण बीआरआई के अधीन है’, ने नेपालियों को हैरान कर दिया है ।

हम कर्ज लेकर, ब्याज सहित कर्ज चुकाने के शर्त पर बुनियादी ढांचे का निर्माण करते हैं, फिर भी कर्जदाताओं द्वारा राष्ट्रीय स्वाभिमान का अवमूल्यन कैसे स्वीकार्य हो सकता है । एक चीनी राजनयिक की अचानक और आश्चर्यजनक अभिव्यक्ति ने गंभीर संदेह पैदा किया है । पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर चीन के एक्जिम बैंक से २०साल के लिए दो फीसदी सालाना ब्याज दर पर करीब २२ अरब रुपये का कर्ज लिया गया है, हालांकि विश्व बैंक और अन्य दाता देश ० । ५ प्रतिशत और जापान ० । ०१ प्रतिशत पर ऋण प्रदान करते रहे हैं । अगर पोखरा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के निर्माण में किए गए निवेश से आय या प्रतिफल नहीं मिलता है तो देश के लिए चीन का कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाएगा । बीआरआई के कर्ज को अनुदान में बदलने का काम भी नहीं हो होता है । फिलहाल देश को स्पष्टता की जरूरत है कि पोखरा हवाईअड्डा बीआरआई के तहत बना है या नहीं । उदघाटन के महीनों बीत जाने के बाद भी सरकार ने अभी तक इस बात को स्पष्ट नहीं किया है ।

अवसरों की तलाश में दुनिया के हर जगह चीनी की मौजूदगी है अब वो लोग ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह ही राजनीति में दखलंदाजी के स्तर तक पहुंच गई है । इसके परिणामस्वरूप, पिछले एक दशक में, चीन नेपाल में दृश्य और अदृश्य दोनों तरह की कई भूमिकाओं में प्रकट हुआ है । पूर्व कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने चीन के साथ संबंधों को विस्तार देने के लिए दीर्घकालिक समझौते किए । इस समय से नेपाल और चीन के बीच यात्राओं और संवादों का सिलसिला न केवल बढ़ा है, बल्कि काठमांडू में चीनी सक्रियता भी दिखाई देने लगी है । अप्रैल २०१९ में बीजिंग में आयोजित बेल्ट एंड रोड (बीआरआई) फोरम में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की भागीदारी के साथ, नेपाल और चीन के बीच ’नेपाल–चीन ट्रांस–हिमालयन मल्टीडायमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क विद क्रास बार्डर रेलवे’ पर हस्ताक्षर किए गए । हालांकि चीन नेपाल इसलिए भी रेल लाना चाहती है चुकि उसका ध्यान उतर प्रदेश और बिहार की घाना आवादी वाली विशाल जनसंख्या की उपभोक्ता पर नजर है । वो अपनी व्यवसायिक फायदा के लिए रेल लाना चाहती है और निवेश नेपाल के ऊपर थोपना चाह रही है ।

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सस्ते कपड़े और ‘मेड इन चाइना’ शब्दों वाले इलेक्ट्रानिक आइटम ने नेपाली लोगों की जीवनशैली बदल दी है । ग्रामीण इलाकों से लेकर शहर के आधुनिक शॉपिंग मॉल तक, चीनी सामग्री हर जगह है । चीन से अनभिज्ञ नेपाली आर्थिक और सामाजिक अंग बनता जा रहा है । नेपाल में अधिकांश निर्माणाधीन जल बिजली परियोजना और अन्य परियोजनाओं में सिविल, हाइड्रोमैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल कान्ट्रैक्ट और कंसल्टिंग में चीनी कंपनियों का जबरदस्त दबदबा बढ़ाते जा रही है । देश की दो सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं नेपाल टेलीकॉम और एनसेल का चीनी कंपनियों हुआवेई और जेडटीई के उपकरणों पर एकाधिकार है । न केवल बड़े ठेके बल्कि छोटे ठेके, कारखाने ही नहीं, ठमेल के कई नेपाली व्यवसायी चीनी व्यापारियों की आक्रामक व्यापारिक शैली के कारण विस्थापित हुए । पिछली बार प्रधान मंत्री बने पुष्प कमल दहाल की कैबिनेट बैठक में बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना के निर्माण के लिए चीन कचौपा समूह निगम (सीजीजीसी) को बिना प्रतिस्पर्धा के सैद्धांतिक रूप से मंजूरी देने का फैसला किया गया था । पोखरा अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डा परियोजना के लिए भी चीन के अलावा ठेके की बोली लगाने तक की अनुमति नहीं दी गई थी । शर्त भी आजुवा ऋण की राशि चीन देगा, तकनीशियन, ठेकेदार और अधिकांश श्रमिक भी उसके होंगे । निर्माण कार्य पूरा होने के बाद परियोजना हमें सौंप दी जाएगी । डिजाइन (इंजीनियरिंग), खरीद, निर्माण और यहां तक कि वित्तीय प्रबंधन करने के मॉडल के कारण, चीनी परियोजना की लागत को कई गुना बढ़ाकर लाभ का फायदा उठाते हैं ।

दुनिया के सामने चीनी आर्थिक–राजनीतिक व्यवस्था की छवि पेश करने के लिए चीन भाषा को दुनिया भर में एक साफ्ट पावर के रूप में पढ़ाने के लिए एक सुनियोजित अभियान चला रहा है । नेपाली मीडिया में भी चीन ने अपना प्रभाव बढ़ा लिया है नेपाल के कई अखबारों और रेडियो स्टेशन में चीन की तारीफ वाले कार्यक्रम प्रकाशित और प्रसारित किये जाते हैं । कई बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर नेपाली मीडिया के जरिये भारत के खिलाफ दुष्प्रचार भी किया जाता है जिसका उद्देश्य नेपाल में भारत के प्रभाव को कम करना होता है । चीन की तरफ से नेपाल के बार्डर इलाकों की जमीन हड़पने की रिपोर्ट के बाद से नेपाल के इन्हीं इलाकों में नये नये रेडियो स्टेशन खोले गए हैं । नेपाल के लोगों में चीन के खिलाफ बढ़ती नाराजगी को दूर करने के लिए इन रेडियो स्टेशन के जरिये चीन की तारीफ और भारत अमेरिका के खिलाफ वाले कई कार्यक्रम प्रसारित किये जा रहे हैं । इन कार्यक्रमों में चीन की दुनिया भर में बढ़ते प्रभाव और उसकी सफलता से जुड़ी कहानियों को सुनाया जाता है । २००७ में काठमांडू विश्वविद्यालय में कन्फ्यूशियस केंद्र खोले जाने के बाद से, जो चीनी सरकार का एक हिस्सा है, चीनी भाषा अब देश भर के लगभग १०० स्कूलों में पढ़ाई जाती है, और कुछ ने तो इसे अनिवार्य भी कर दिया है । काठमांडू में चीनी दूतावास भाषा सिखाने के लिए स्कूलों में स्वयंसेवी शिक्षक प्रदान करता है । इसकी मदद से नेपाल की जनता के खÞयालत को अपने हित में मोड़ा जाएगा, और इसके लिए चीन अपने साहित्य, सांस्कृतिक मामलों और प्रदर्शनियों का सहारा लेगा । फिलहाल चीन नेपाल के स्टूडेंट को बड़ी संख्या में स्कालरशिप दे रहा है जिसके तहत हर साल २०० से ज्यादा नेपाली छात्र–छात्राएं नेपाल से चीन में पढ़ाई के लिए जाते हैं । चीन के कई एनजीओ भारत से सटे नेपाल सीमा में काफी सक्रिय हैं । नेपाल के लुंबिनी में चीन से कुछ एनजीओ सोशल वेलफेयर से जुड़े कार्यक्रम कर रहे हैं । इनदिनों चीन के ठेकेदारो ब्यापारी ने भारत से सटे तराई मधेश के इलाके में सड़क निर्माण के छोटे छोटे ठेके और बार्डर इलाके में कई फैक्टरी निर्माण करवा रही है । कई बार इन की आड़ में चीन के जासूस भारत से जुड़े सीमावर्ती इलाकों अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं ।

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नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री जीवन बहादुर शाही ने स्थलगत पर अध्ययन किया और नेपाल–चीन सीमा विवाद पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने उनकी तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने विवाद को खींचा था भारत और अमेरिका के हित में । काठमांडू में चीनी दूतावास ने नेपाली कांग्रेस को खेद पत्र भी भेजा । नेपाल के दोलखा, गोरखा, धारचुला, हुमला, सिंधुपालचौक, संखुवासभा और रसूवा जिलों में चीन ने उसकी जमीन हड़प ली और नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है । चीन ने गोरखा जिले की सीमा पर पीलर नंबर ३५, ३७, और ३८ को रिलोकेट किया है । वहीं नांपा भांजयांग में बाउंड्री पिलर ६२ पर भी जमीन हड़प ली । पहले ३ पीलर गोरखा के रुई गांव और टाम नदी के करीब थे । चीन ने २०१७ में ही पूरा गांव हड़पने के साथ इस इलाके को तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र से जोड़ दिया था । हालांकि अभी तक ये गांव नेपाल के नक्शे में है और स्थानीय लोग नेपाल सरकार को ही अपना टैक्स देते हैं । सोलुखुम्बु में नम्पा भंजयांग में सीमा स्तंभ संख्या ६२ भी नहीं है । सबसे ज्यादा दिक्कत एवरेस्ट के ५७वें बाउंड्री पिलर पर है । दोलखा के पूर्व की ओर कोरलांगपारी के शीर्ष पर जो स्तंभ होना चाहिए वह पहाड़ी के तल पर है । सीमा स्तंभ वहां कैसे पहुंचा ? हालांकि सुस्ता, कालापानी लगायत के क्षेत्र में सीमा विवाद भारत के साथ भी है, इन विवादों को दोनों देशो ने स्वीकार भी किया है और समाधान के लिए काम भी हो रहा है लेकिन चीन नेपाल के साथ सीमा विवाद के मुद्दे को सुनना हीं नहीं चाहता, चीन सीमा विवाद को स्वीकार भी करना नहीं चाहती न इस मसले पर कोई बातचीत करना चाहती है ।

नेपाल, पिछले छह वर्षों से चीन के बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा बना हुआ है । इस प्रोजेक्ट के कारण दस देश चीन के कÞर्जÞ वाली कूटनीति के दलदल में फंस चुके है । चीन के सबसे कÞरीबी देश पाकिस्तान में चीन की धोखाधड़ी के अलावा श्रीलंका को भी चीन के कÞर्जÞ के जाल में फंस कर हंबनटोटा बंदरगाह को चीन के हवाले करने को मजबूर होना पड़ा । इसी तरह, मध्य एशियाई देश ताजिकिस्तान को अपनी कÞरीब एक हजÞार वर्ग किलोमीटर जÞमीन, चीन को सौंपनी पड़ी है, इन मिसालों से साफÞ है कि तमाम देशों को किस तरह चीन के साथ दोस्ती की भारी कÞीमत चुकानी पड़ी है । बीआरआई एक ऐसा जाल है, जिसकी मदद से चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीति को अंजाम दे रहा है । कुछ समय पहले सीमा से लगे गलवान घाटी इलाके में भारत और चीन के बीच विवाद होने पर चीन ने पाकिस्तान और नेपाल के साथ मिलकर भारत को सबक सिखाने की धमकी दी थी । चीन नेपाल को अपना उपनिवेश या नया तिब्बत मानता है ।

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नेपाल में चीनी दखल की स्थिति को देखते हुए माओत्से तुंग का वह ऐलान आज भी याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि तिब्बत चीन के हाथ की हथेली है जबकि नेपाल, सिक्किम, भूटान, अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख उस हथेली की उंगलियां हैं । बिना उंगलियों के हथेली का कोई मतलब नहीं है । निश्चय ही यह विस्तारवादी और औपनिवेशिक मानसिकता की उपज थी । नेपाल की वामपंथी पार्टी नेपाल की इच्छा के रूप में अपने हस्तक्षेप को परिभाषित करते हुए चीन के इस कृत्य में सहयोगी के रूप में काम कर रही है । कहना ही होगा, क्योंकि नेपाली नेताओं ने ’स्पेस’ दिया, इसलिए नेपाल में चीन की ’अतिसक्रियता’ बढ़ गई है । यूएमएल और माओवादियों के एकीकरण और विवाद को सुलझाने में बारम्बार चीन की भूमिका सतह पर आ गई । नेपाल के सत्ताधारी वामपंथी गठबंधन ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बारम्बार वर्चुअल बैठक की है । इसमें दोनों पक्षों ने सरकार और पार्टी चलाने के अनुभव साझा किए । दोनों देशों की कम्युनिस्ट पार्टियां एक जैसी राजनीतिक विचारधारा से ताल्लुक रखती हैं । चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मशहूर, ‘जिनपिंग थाट’ को नेपाल में भी प्रचारित करने का मकसद इन बैठक के जरिए होता है । चीन और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच इन वर्चुअल बैठकों का असल मकÞसद नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी को चीन के वामपंथी विचारों का प्रशिक्षण देना है । जिससे कि वो अपनी विचारधारा का निर्यात नेपाल को कर सके । नेपाल में अपना प्रचार अभियान तेजÞ कर सके और पूरे क्षेत्र मे अपनी ताकÞत का और बलपूर्वक प्रदर्शन कर सके । इस प्रकरण को नेपाल के वामपंथियों के लिए चीन द्वारा चलाई जा रही कक्षाएं ही कहा जा सकता है । इनकी मदद से चीन अपनी सीमाओं के दायरे के पार भी अपनी विचारधारा का प्रचार कर रहा है ।

सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के सिद्धांतों को आयात करने वाले नेपाली कम्युनिस्ट राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई तावीजÞ टिप्पणी से नेपाली जन मानष भ्रमित हो चुकी है । शुरू से ही यह सिखाया गया है कि अमेरिका साम्राज्यवादी है और भारत विस्तारवादी । इसके लिए पहले सोवियत संघ निवेश कराती थी अब चाइना कर रहा है । इसलिए भारत की छवि एक खराब पड़ोसी की बन गई, और चीन के प्रति लगाव नेपाली समाज में असामान्य हो गया । चीन को जरूरत से ज्यादा ’देवत्वकरण’ बना दिया गया है, नागरिक स्तर तक भी । बहुमत “प्रो चीनी” बन गया है । नतीजतन, चीन के प्रति आलोचनात्मक रवैये को बिभिन्न लांछना के तहत कलंकित किया जाता है । वास्तव में, हमारा आत्म–सम्मान उत्तर के संबंध में एक घुटने के स्तर तक पहुँच गया है । नेपाल में भारत के खिलाफ ही राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया जाता है । खुली सीमा के कारण नपाल के मधेसी नागरिकों के साथ बेटीरोटी सहित पारंपरिक, व्यावहारिक और सांस्कृतिक संबंध जिस तरह स्थापित है इसी तरह अन्य शक्तिशाली देशों के साथ संबंध होती तो नेपाल पहले ही विघटित हो गया होता । एक समय चीनी सीमा पर भारतीय सेना थी लेकिन नेपाल के सामान्य आग्रह भरपर ज्ञड सैनिक इकाइयों को आसानी से हटा दिया था । इन सभी अवसरों के बावजूद भारत अपने पारंपरिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक संबंधों को जीवित रखते हुवे नेपाल की सार्वभौम सत्ता की सम्मान करते आई है । बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चीन एक घातक बन रहा है । अब भी अगर काठमांडू चीन के साथ घुटने टेकता रहा तो निश्चित है कि देश, समाज और लोगों को बहुत बड़ा नुकसान होगा । इसके खिलाफ नेपाल को अब अभियान छेड़ देना चाहिए ।

लेखक – सन्तोष मेहता,
 नेता लोसपा

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