संत महामति प्राणनाथ स्मृति एवं साहित्य समर्पण समारोह का आयोजन
काठमांडू, २ चैत –
सत्रहवीं शताब्दी में अवतरित संत महामति प्राणनाथ को काठमांडू में स्मरण किया गया । श्री प्राणनाथ मिशन–शोध संस्थान दिल्ली एवं हिन्दी केन्द्रीय विभाग, त्रिभुवन विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान एवं मंगल शैक्षिक विकास गुठी, काठमांडू के संस्थागत सहयोग में अन्तरराष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी एवं साहित्य समर्पण समारोह काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया । कार्यक्रम हिन्दी केन्द्रीय विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. संजीता वर्मा की अध्यक्षता में हुई । कार्यक्रम में भारत से आए विद्वत वर्ग की उपस्थिति थी । संगोष्ठी का विषय ‘
’ था। कार्यक्रम में इस विषय पर भारत और नेपाल के विद्वत वर्ग ने अपने अपने मंतव्यों को रखा । कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग की शोध छात्राओं ने महामति प्राणनाथ पर आधारित शोध पत्रों को पढ़ा ।
कार्यक्रम में श्री प्राणनाथ मिशन के निदेशक संत मोहन प्रियाचार्य जी ने अपने मंतव्य में संत महामति के जीवन के बारे में बताया । मध्यकालीन युग में संत महामति का जन्म गुजरात के काठियावाड़ में हुआ था। उन्होंने कहा कि प्रारम्भ में संत महामति के बारे में बहुत लोगों को बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी । कहीं न कहीं इतिहासकारों से गलतियां हुई है । क्योंकि जब संत महामति प्राणनाथ के बारे में लोगों को पता चला तबतक हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखा जा चुका था । और उसमें उनका नाम समावेश नहीं किया गया था । और अगर कहीं किया भी गया था तो आधा अधूरा । १७वीं शताब्दी के प्रायः सभी कवियों को हमने नजदीक से पढ़ा है । हिन्दी साहित्य में अगर किसी के लिए बहुत कम जानकारी मिलती है तो वह है संत महामति प्राणनाथ जी । जिनका ज्यादा जिक्र नहीं किया गया है साहित्य में । लेकिन अब हम उनके द्वारा रचे गए काव्यों, उनकी वाणी, उनके किरंतन को आम नागरिक तक पहुँचाने का काम करेंगे । कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रुप में भारत से आए प्रो.पी.सी. टंडन ने अपने मंतव्य में संत महामति प्राणनाथ के बारे में विस्तार से बताया । उन्होंने कहा कि कबीर से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं संत महामति के विचार । उनकी वाणी में भी हमें वहीं बातें देखने को मिलती हैं । कबीर की ही भांति उन्होंने भी जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा का कहीं कोई अंतर नहीं रखा था । अपनी वाणी से उन्होंने अहंकार से मुक्ति कैसे प्राप्त करें ? परमात्मा को कैसे प्राप्त करें ? जो आया है वह जाएगा ही और एक ही तरीके से जाएगा आदि विषयों पर बहुत लिखा । ऐसा नहीं है कि राजा है तो उसका अंत अलग होगा और जो रंक है वह अलग तरीके से जाएगा । यानी सबको एक ही तरीके से जाना है । लेकिन ऐसे संत को इतिहास में, हिन्दी साहित्य में वह जगह नहीं मिली जिसके वे अधिकारी थे ।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केन्द्र की निदेशक डॉ. आशावरी उदय बापट ने अपने मंतव्य में संत महामति प्राणनाथ के बारे में बात करते हुए कहा कि वो सच्चे संत थे । उनके द्वारा लिखे गए वाणी, किरंतन आज के लिए अति आवश्यक हैं । उन्होंने अपने मंतव्य में कहा कि संत का हर युग में आविर्भाव होता है । बापट ने अपने मंतव्य में महाराष्ट्र के संत परम्परा के बारे में विस्तार से बताया । इसी तरह कार्यक्रम में हिन्दी विभाग, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से आई प्रो. विनीता कुमारी ने अपने मंतव्य में भक्ति के बारे में बताया । भक्ति भारत की एक महान आध्यात्मिक साधना की एक निर्मल विशाल शांत धारा है । जो पूरे विश्व में बह रही है लेकिन अब इसमें आडंबर आ गया है । संत महामति के बारे में उन्होंने बताया कि महामति यात्राएं बहुत किया करते थे और जहाँ जाते थे अपनी वाणी, किरंतन, अपने विचारों से लोगों का मन जीत लेते थे । अखंड भारत का उनका सपना था । उन्होंने अपनी वाणी द्वारा जोड़ने का काम किया है ।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केन्द्र की निदेशक डॉ. आशावरी उदय बापट ने अपने मंतव्य में संत महामति प्राणनाथ के बारे में बात करते हुए कहा कि वो सच्चे संत थे । उनके द्वारा लिखे गए वाणी, किरंतन आज के लिए अति आवश्यक हैं । उन्होंने अपने मंतव्य में कहा कि संत का हर युग में आविर्भाव होता है । बापट ने अपने मंतव्य में महाराष्ट्र के संत परम्परा के बारे में विस्तार से बताया । इसी तरह कार्यक्रम में हिन्दी विभाग, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से आई प्रो. विनीता कुमारी ने अपने मंतव्य में भक्ति के बारे में बताया । भक्ति भारत की एक महान आध्यात्मिक साधना की एक निर्मल विशाल शांत धारा है । जो पूरे विश्व में बह रही है लेकिन अब इसमें आडंबर आ गया है । संत महामति के बारे में उन्होंने बताया कि महामति यात्राएं बहुत किया करते थे और जहाँ जाते थे अपनी वाणी, किरंतन, अपने विचारों से लोगों का मन जीत लेते थे । अखंड भारत का उनका सपना था । उन्होंने अपनी वाणी द्वारा जोड़ने का काम किया है ।

कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि मंतव्य को रखते हुए प्रा.डा.कुल प्रसाद कोइराला ने संत महामति प्राणनाथ के प्रभावशाली व्यक्तित्व की बात कहीं । उन्होंने कहा कि उस वक्त उनके द्वारा रची गई पंक्तियां आज भी सांदर्भिक हैं । हम आज उलझे हुए हैं अपने आप में । उन्होंने मध्यकाल में ही इन बातों से बाहर निकलने का रास्ता बता दिया था । हमें उनका अनुसरण करना चाहिए । इसी तरह कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही हिन्दी केन्द्रीय विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ संजीता वर्मा ने अपने मंतव्य में कहा कि अभी विमर्शो का दौर चल रहा है । लेकिन भक्ति को लेकर हिन्दी विभाग में यह पहली चर्चा है और हम गर्व की अनुभूति कर रहे हैं कि हमें यह अवसर मिला है । संत महामति को जानना, उसके विचारों से परिचित होना ही हमारे लिए एक सुखद अनुभूति है । उन्होंने विश्वास दिलाया कि आने वाले समय में त्रिभुवन विश्वविद्यालय के हिन्दी पाठ्यक्रम में महामति के तारतम वाणी को शामिल किया जाएगा और उस पर शोध कार्य करने की दिशा में भी प्रयास किए जाएंगे । कार्यक्रम में महामति साहित्य केन्द्रीय पुस्तकालय को समर्पित किया गया और सभी विद्वतजनों को स्मृतिचिन्ह और अंग वस्त्र से सम्मानित किया गया ।









