Sun. May 19th, 2024

अंशु कुमारी झा, हिमालिन अंक मार्च । राष्ट्रपति को देश का प्रथम नागरिक माना जाता है । प्रत्येक गणतन्त्र देश में एक राष्ट्रपति होते हैं । राष्ट्रपति को अंग्रेजी में प्रेसीडेंट कहा जाता है । इस शब्द का प्रयोग पहली बार अमेरिका में शुरू हुआ था । ये शब्द फ्रेंच और लेटिन से मिलकर बना हुआ है । इसके दो अर्थ होते हैं । पहला अध्यक्षता करने वाला और दूसरा सर्वोच्च । अमेरिका की तरह कई अन्य देशों ने भी इस शब्द का प्रयोग किया । हमारे देश के पड़ोसी देश भारत में भी देश के सर्वोच्च पद के लिए अंग्रेजी में पे्रसीडेंट और हिंदी में राष्ट्रपति का प्रयोग शुरू हुआ । राष्ट्रपति अर्थात् राष्ट्र का स्वामी । उस समय नेपाल राजा के अधीन होने के कारण राजा ही देश का प्रथम व्यक्ति होता था परन्तु फिलहाल नेपाल भी कहने के लिए गणतन्त्र है इसलिए यहां भी चौथे कार्यकाल के लिए तीसरे राष्ट्रपति का चयन हुआ है । राजतन्त्र का अन्त और गणतन्त्र का प्रादुर्भाव के बाद रामचन्द्र पौडेल नेपाल के तीसरे राष्ट्रपति नियुक्त हुए हैं । पिछली राजनीतिक समीकरण को देखते हुए उनकी जीत सुनिश्ति ही थी । सब कहते हैं कि वे अच्छे व्यक्ति भी हैं । सही है, राष्ट्रपति का व्यक्तित्व सरल, सहज, दयावान और कर्तव्यनिष्ठ होना आश्यक भी है क्योंकि जनता उनसे बहुत अपेक्षा रखती है ।

अपने राजनीतिक जीवन के उत्तराद्र्ध में राष्ट्रपति बनना पौडेल जी के लिए सौभाग्य की बात है । अपने राजनीतिक जीवन काल में पार्टी अध्यक्ष तथा प्रधानमन्त्री प्रतिस्पद्र्धा में वो असफल ही रहे इसलिए उक्त पद पौडेल जी के लिए सन्तोषजनक ही है ।

देश में राष्ट्रपति होने से जनता को गणतन्त्र की अनुभूति होती है । वैसे हम सबको पता है कि गणतन्त्रतात्मक प्रक्रिया हमारे देश में कहां तक कार्यान्वयन हो रही है । राजा के बराबर ही राष्ट्रपति का भी पद होता है । इस पद की गरिमा पदासीन व्यक्तियों को रखना बहुत आवश्यक है । गणतन्त्र में राष्ट्रपति का पद नागरिक की प्रतिनिधि संस्था है । राष्ट्रपति के व्यवहार में नागरिक प्रति चेतना जरूरी है परन्तु यहां के राष्ट्रपतियों की सार्वजनिक प्रस्तुति राजा महाराजा के तरह ही तोप, सलामी और सवारी पर ही केन्द्रित है । जब राष्ट्रपति कहीं बाहर निकलते हैं तो उनकी सुरक्षा में बहुत सारे सुरक्षाकर्मियों को सड़क पर तैनात कर दिया जाता है । सर्वसाधारण के आवागमन पर भी रोक लगा दी जाती है जिससे जनता को परेशानी होती है । इस सवारी, सलामी और तोप की गणतन्त्र में क्या आवश्यकता है ? क्योंकि गणतन्त्र जनता को दुख देने के लिए नहीं आवश्यक सुख सुविधा देने के लिए होता है । हमारे नए राष्ट्रपति जी अगर इस बात पर विचार कर उक्त प्रक्रिया में कुछ सहजता लाएं तो जनता के मन में उनका स्थान उच्च रहेगा । सही मायने में राष्ट्रपति पौडेल जी की परीक्षा यहीं से शुरु होती है जनता को गणतन्त्र की प्रत्याभुति दिलाने के लिए । नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डा । रामवरण यादव जी की जीवनशैली बहुत ही सहज व सरल थी । वो इतने सीधे स्वभाव के थे कि सवारी और सलामी उन पर हावी ही नहीं रही । तत्पश्चात विद्या भण्डारी जी दूसरी राष्ट्रपति बनी । उनका कार्यकाल का तो क्या कहना ! उन्होंने तो गजब ही ढा दिया । प्रधानमन्त्री जी के इशारे पर मध्यरात्रि को भी अध्यादेश की बरसात ले आती थी । उनकी भूमिका ओलीतन्त्र के छत्रछाया में ही लिखी गई । स्पष्टतः हम यह भी कह सकते हैं कि उनमें वह क्षमता नहीं थी कि खुद के बल पर राजनीतिक शक्ति बन सके ।

अमेरिका के राष्ट्रपति भी बहुत सुरक्षित नहीं हैं । उनके ऊपर भी खतरे की सम्भावना है फिर भी वे उनके आगे पीछे सैनिक नहीं दिखते । वहां पर निवर्तमान राष्ट्रपति दूसरे दिन से ही खुद ही अपने आवश्यक सामान दुकानों से खरीदने जाते हैं । बड़े बड़े पद पर विराजमान पादाधिकारी भी सार्वजनिक यातायात में ही सफर करते हैं । नार्वे, डेनमार्क, स्वीडेन इत्यादि देशों में राजतन्त्र है परन्तु वहां के प्रधानमन्त्री, मन्त्री आम जनता के साथ ही चलते हैं । राजपरिवार के बच्चे आम बच्चों की तरह सड़क पर साइकल चलाते हैं । भारत स्वतन्त्र होने के बाद वहां के गभर्नर जनरल (राष्ट्राध्यक्ष) पहले भारतीय नागरिक सी । राजगोपालाचारी थे । उन्होंने ब्रिटिस गभर्नर के लिए निर्मित विशाल सरकारी निवास (राष्ट्रपति भवन) में एक छोटे से कमरे में अपने रहने का बन्दोवस्त किया । उनके बाद राजेन्द्र प्रसाद भी उसी में ठहरे और अभी द्रौपदी मुर्मु का भी निवास वहीं है । अर्थात सभी उसी नियम का पालन कर रहे हैं । इस प्रकार का क्रियाकलाप सभी के लिए उदाहरण है । इससे गणतन्त्र की अनुभूति होती है । इस प्रकार का क्रियाकलाप प्रशंसनीय है और जनता को खुशी होती है । परन्तु नेपाल की दशा सही नहीं है सभी निवर्तमान पदाधिकारियों को सरकारी सुख सुविधा लालसा बनी रहती है ।
समग्र में राष्ट्रपति देश का अभिभावक होता है । उन्हें प्रधानमन्त्री की तरह शक्ति तो नहीं होती है फिर भी वे देश के प्रथम व्यक्ति हैं । वे जिस प्रकार व्यवहार करेंगे जनता भी वही सीखेगी । हमारे संविधान और हमारे द्वारा अपनाए गए राजनीतिक प्रणाली में राष्ट्रपति की पदीय भूमिका अत्यन्त सीमित है । परन्तु उक्त पद को भी राजनीतिक शक्तिकेन्द्र मानना अत्यन्त दुखदपूर्ण है । पार्टीगत स्वार्थ के लिए जनता को भ्रमित व दुखित करना गलत है । फिलहाल देश का अर्थतन्त्र बहुत ही कमजोर चल रहा है । अपने देश पर जनता को गौरव हो देश में इस प्रकार का क्रियाकलाप होना चाहिए ।



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