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क्या जनयुद्ध अपराध था ? : गोपाल ठाकुर

 

गोपाल ठाकुर, हिमालिनी, अंक मार्च । एक ओर तीसरे राष्ट्रपति का चुनाव संपन्न होकर नेपाली काँग्रेस के रामचन्द्र पौडेल राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं, वहीं दूसरी ओर जनयुद्ध का अपराधीकरण करने के प्रयास के रूप में गणतंत्र लाने वाले जनयुद्ध के सर्वोच्च कमांडर प्रचंड, जो अभी नेपाल के प्रधानमंत्री हैं, को जनयुद्ध का अपराधीकरण करने की मानसिकता की उपज स्वरूप सर्वोच्च न्यायालय में लाया गया है लेकिन यह कोशिश पहली नहीं है ।
वि.सं । २०७२ में संविधान बनने के बाद भी इस तरह के प्रयास किए गए थे । नतीजतन, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी केंद्र)२०७३ में और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) २०७५ में नेपाल में सबसे मजबूत पार्टी बन गई । लेकिन सत्ता के लिए केपी ओली की हठी लालसा के कारण यह टिक नहीं सकी ।

आखिर नेपाल में प्रगति के ध्वजवाहक संकट में क्यों पड़ रहे हैं ? छोटेमोटे नगर अधिराज्यों स्थान पर एक विस्तृत और मजबूत राजतन्त्र स्थापित करना निश्चित रूप से प्रगतिशील माना जाता है, लेकिन शाही सामंतवाद जो गोरखा अधिराज्य से नेपाल अधिराज्य में बदल गया, भले ही नेपाल घाटी पर हावी हो गया, क्या शाही राजतंत्र में राजनीतिक स्थिरता थी ? क्या लोगों को शांति महशूस हुई ? क्या आर्थिक–राजनीतिक पहिया आगे बढ़ रहा था ? वहां कितने लोग मारे गए ? नेपाल घाटी की जीत के दौरान कितने लोगों की मृत्यु हुई ? कितने नाक और कान काटे गए ? सिंहासन पर कौन से राजकुमार बैठे ? जंग बहादुर कुंवर ने जंग बहादुर राणा में तबदील होकर जहानिया शासन कैसे शुरू किया ?

लाखन थापा से लेकर धर्मभक्त, शुक्रराज, दशरथ चंद और गंगालाल सहित सैकड़ों लोगों को किसने मारा ? क्या ये सब अपराध अहिंसा थे ? इन और इसी तरह के सवालों का जवाब सकारात्मक नहीं हो सकता है और यह दिखाता है कि सत्ता की प्राप्ति बिना हिंसा संभव नहीं है ।

इतना ही नहीं, वि.सं. २००७ (१९५०–५१) की क्रांति के रूप में जाना जाने वाला जनविद्रोह भी सशस्त्र बल के उपयोग पर आधारित था । झापाली कम्युनिस्टों का झापा विद्रोह, हालांकि झापा में २०२८ में हुआ विद्रोह असफल और कुछ हद तक अनुत्पादक था, भी सशस्त्र बल के उपयोग पर आधारित था । क्या वि.सं । २०१७ (१९६०) का राजा महेन्द्र का सैनिक कु वि.सं । २०३५÷०३६ (१९७९) में छात्र आंदोलन के बाद से वि.सं । २०४६ (१९९०) के संयुक्त जन आंदोलन को दबाने के लिए राजा वीरेंद्र द्वारा विश्व युद्ध के दौरान प्रतिबंधित दमदम गोलियों का इस्तेमाल भी अहिंसा थी ?
बेशक, न्यूटन द्वारा खोजा गया वैज्ञानिक नियम कि एक क्रिया की एक समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है, समाज और राजनीति में भी लागू होता है । परिणामस्वरूप, राणा शासन का भी सशस्त्र प्रतिरोध से सामना करना पड़ा और उसे उखाड़ फेंका गया । राजशाही का भी विरोध किया गया और वि.सं । २०४७ (१९९०) के संविधान के तहत बंधा गया था । लेकिन उसके बाद चुनाव से चुनाव तक एक दल की जगह दूसरे दल को सत्तारूढ़ करना ही, राजनीतिक बदलाव की मंशा थी ? बेशक यह नहीं ।

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इस देश का चरित्र बहुजातीय है । लेकिन इस राज्य का चरित्र एकजातीय ही रहा है, एक तानाशाही राजशाही से लेकर एक संवैधानिक राजतंत्र तक । गोरखा प्रतिगामी राष्ट्रवाद के तहत देश की बहुलता को रौंदा जा रहा था । इसलिए राज्य के इस प्रतिगामी चरित्र को बदलना जरूरी था ।

माओवादी वि.सं । १ फागुन, २०५२ से उन्होंने सशस्त्र बलों के इस्तेमाल के आधार पर इसके खिलाफ जनयुद्ध शुरू कर दिया । राजा वीरेंद्र के वंश के विनाश के बाद खिड़की से कूदकर गद्दी पर बैठने वाले ज्ञानेंद्र ने वि.सं । २०४६ के जन आंदोलन की उपलब्धियों को भी समाप्त कर दिया । इस दौरान उन्होंने अपने को पति और राजनीतिक दलों को पत्कहने का दुस्साहस भी था । वि.सं । १९९० में सूर्यविक्रम ज्ञवाली, धरणीधर कोइराला और पारसमणि प्रधान (सुधपा) जैसे विदेशियों की सलाह पर स्थापित ‘नेपाली’ आवरण का राजा ज्ञानेंद्र ने विस्तार किया और अपने सभी कुकर्मों को ढंकने के प्रयास के रूप में ‘बोलना पड़ा तो बोलो नेपाली ही’ फरमान जारी किया । परिणामस्वरूप, वि.सं । २०६२ में १२ सूत्रीय समझौता हुआ और सात दलों का अहिंसात्मक जनांदोलन तथा माओवादियों का सशस्त्र जनयुद्ध मिश्रित होकर संयुक्त जनविद्रोह में बदल गया । इस जन विद्रोह के सामने भंग संसद को बहाल करने के लिए राजा ज्ञानेंद्र को ११ बैसाख २०६३ को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा ।

राजशाही द्वारा झेली गई उसी हार के आधार पर, राजशाही का निलंबन, एक विस्तृत शांति समझौता, एक अंतरिम संविधान की घोषणा, दो बार संविधान सभा के गठन की घोषणा के माध्यम से देश इस स्थान पर आया है । संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र, संघीय इकाइयों का गठन (हालांकि विकृत) के साथ साथ दो स्थानीय, प्रांतीय और संघीय चुनाव संपन्न हुए । अतीत में जन आन्दोलन, जनविद्रोह, जनयुद्ध और मधेश आन्दोलन सहित पहचान पर आधारित अनेक जन आन्दोलनों ने अंशतः ही सही, हासिये से उठाकर ऊपर उठाने का प्रयास किया है । इसका कार्यान्वयन संघीयता, लोकतंत्र और गणतंत्र में समानुपातिक समावेशीकरण और धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से किया जा रहा है । यह सच है कि ये और ऐसे प्रयास उस स्तर पर नहीं हैं जो होने चाहिए थे, लेकिन दूसरी ओर, कल के प्रतिक्रियावादियों के लिए राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाना और खुद का पुनरुत्थान करने का प्रयास करना असामान्य नहीं है । इसके लिए पहली विडम्बना यह है कि राजनीतिक परिवर्तनकारी शक्तियाँ यथास्थिति में फँसी हुई हैं, जिसके कारण हमारे देश में प्रतिक्रियावादियों को कभी दण्ड नहीं मिलता ।

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भले ही २००७ के बदलाव को क्रांति कहा गया हो, जिन राणाओं को सजा मिलनी चाहिए थी, उनके सरदार मोहन शमशेर बदलाव के बाद पहले प्रधानमंत्री बने और क्रांतिकारियों के सुप्रिमो विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला उनके गृह मंत्री थे । इतना ही नहीं, राजा त्रिभुवन की शाही घोषणा में, उन्होंने किसी भी क्रांति या आंदोलन, जिसने उन्हें सिंहासन पर बहाल किया था, का उल्लेख किए बिना अपनी इच्छा के अनुसार लोकतंत्र देने की बात कही थि । नेपाली कांग्रेस ने पहला अपराध इस घोषणा का पालन करके किया और दूसरा अपराध संविधान सभा के मुद्दे को छोड़कर । इसी प्रकार शिक्षा मंत्री लक्ष्मी प्रसाद देवकोटा द्वारा उठाए गए नेपाली भाषा के अलावा अन्य भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने पर प्रतिबंध लगाने के प्रतिगामी कदम का मूक समर्थन करना नेपाली कांग्रेस नेतृत्व की गलती थी । नतीजा यह हुआ कि न केवल नेपाली कांग्रेस, बल्कि पूरी नेपाली जनता पर राजा महेंद्र २०१७ में एक सैनिक कु के माध्यम से स्वेच्छाचारी राजशाही थोपने में सफल रहे ।

वि.सं । २०४६ के बदलाव के बाद भी ऐसा ही हुआ । पंचों में भी कम से कम जन आन्दोलन का सीधा प्रतिकार करने वालों को दण्डित किया जाना चाहिए था । लाल आयोग ने सिफारिश भी की थी । लेकिन उन्होंने न केवल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का गठन किया, यूएमएल और कांग्रेस ने क्रमशः लोकेंद्र बहादुर चंद और सूर्य बहादुर थापा को प्रधान मंत्री बनाया । संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र में भी यह प्रक्रिया नहीं रुकी । व्यापक शांति समझौते के अनुसार, जनयुद्ध के दौरान हुई मानवता विरोधी गतिविधियों की जांच सत्य और सुलह आयोग और गुमशुदगी छानवीन आयोग द्वारा पूरा किया जाने वाला कार्य अभी भी शेष हैं । लेकिन ऐसी हालत में भी ऐसी हरकतें जारी हैं । इसी तरह माओवादी आन्दोलन को देखें तो अंतरिम संविधान में राजशाही को निलंबित किए जाने के बावजूद जब उसने संघीयता के लिए अपना पक्ष छोड़ दिया तो मधेशी राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के हाथ–पैर बांधकर मधेश में अपना प्रभुत्व खो दिया । परिणामस्वरूप पहली संविधान सभा में सीपीएन (माओवादी) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई, लेकिन वह संविधान निर्माण के लिए निर्णायक नहीं हो सकी । इसी तरह, माओवादियों में फूट का सिलसिला तब शुरू हुआ जब पार्टी एकीकरण ने जनसंघर्ष के स्वामित्व के बारे में स्पष्ट रेखा नहीं बनाई ।

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परिणामस्वरूप दूसरी संविधान सभा में माओवादी तीसरे पक्ष बन गए और कुछ मामलों में यथास्थिति में ही वर्तमान संविधान का निर्माण हुआ, जबकि प्रतिगमन का चरित्र बरकरार रहा, संघीयता का ढांचा बदसूरत हो गया और स्वायत्त क्षेत्र, संरक्षित क्षेत्र और विशेष क्षेत्र की अवधारणा गर्त में मिल गई । गठित प्रांतों के नामकरण में भी यह स्पष्ट है कि मधेश प्रांत को छोड़कर सभी में पंचायतकालीन निरंतरता है । इसी तरह संघीयता की जननी भले ही मधेश आंदोलन है, कथित मधेशवादी, जो आंदोलन के मालिक होने का दावा करते हैं, धीरे–धीरे उस स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां संसदीय व्यवस्था के तहत सत्ता के इर्दगिर्द वाली किसी भी पार्टी के नाम में मधेश शब्द भी नहीं बचा है । पहली संविधान सभा में, यदि उन्होंने माओवादियों के साथ मिलकर संविधान बनाने में मदद की होती, तो वर्तमान की तुलना में अधिक दूरदर्शी संविधान बनाया जा सकता था । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । तथाकथित मधेशवादी हर सरकार में शामिल होते जाने के कारण धीरे–धीरे ध्वस्त हो गए और दूसरी संविधान सभा में उनकी स्थिति भी बुरी तरह बिगड़ गई ।

माओवादियों को विशेष रूप से अपनी क्रूर आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है । पार्टी एकीकरण जारी है और संसदीय हैसियत दिन–ब–दिन गिरती जा रही है, क्यों ? सजा और पारितोषिक की संस्कृति कितनी मजबूत है ? महाधिवेशन और अधिवेशन कितने निर्णायक और कारगर हैं ? राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चे कितने सक्रिय हैं ? अपने भीतर की विज्ञता का कितना उपयोग किया गया है ? इन और इस तरह के सवालों के जवाब खोजने के लिए, माओवादी नेतृत्व तब तक खड़ा नहीं हो पाएगा जब तक कि वे एक निर्मम आत्म–परीक्षा नहीं करते । एक कहावत भी है लुढ़कते शेर का पीछा तो हिरण भी करता है । जनयुद्ध के सर्वोच्च सेनापति प्रचंड और प्रगति में योगदान देने वाले अन्य नेताओं की भी हालत कुछ ऐसी ही हो गई है । नतीजतन जनयुद्ध को अपराधी बनाने की चाल चल पड़ी है और इसी चाल के तहत रेशम चौधरी मधेश आन्दोलन के टीकापुर काण्ड का दोषी करार होकर जेल में बंद हैं । अगर यही स्थिति रही तो कुछ और लोगों के गले पर तलवार लटक सकती है । इसलिए, गलतियों और कमजोरियों को सुधार कर एक एकीकृत जन आंदोलन फिर से खड़े करने का कोई विकल्प नहीं है, जो प्रचंड के शब्दों में सरकार, सदन और सड़कों का आवश्यकतानुसार उपयोग करते हुए आगे बढ़ना चाहिए ।


लेखकः भाषाविज्ञ तथा राष्ट्रीय भाषा आयोग के अध्यक्ष है ।

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