महामाता के रुप में स्मृतियों को बनाया आशीष – लक्ष्मीबाई भागवत : मनीषा खटाटे
मनीषा खटाटे । इन दिनों हमारा सारा परिवार व्यथित और हदय में स्मृतियों को संजोए दर्द,वेदना को अनुभव कर रहा हैं,हमारी नानी लक्ष्मीबाई जी के निधन से शुन्यवत अनुभव कर रहें हैं परंतु हर कोई अपनी ,अपनी स्मृतियों में मातृत्व की उस तस्वीर को याद कर रहा हैं।नानी को महामाता इस संज्ञा से परिभाषित करना सार्थक बनाता है क्योंकि मेरी सासू माँ सुश्री.सुमन खटाटे और उनकी छे बहनें ( छह मौसेरी सासू माँ ) हैं,वे सारी एक ही जगह पर रहती है और सात मातृ शक्ति को जन्म देनेवाली तो महामाता ही कहलायेगी ना ……!
जब मेरी शादी के बाद मैं उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके पास गयी तो बहूत आसान शब्दों में उन्होंने स्री होने का अर्थ समझाया था – स्री होने का अर्थ सहनशीलता और किसी भी स्थितियों में संघर्ष पर विजय पाकर अपने परिवार को संभालना ………..इसी कारण धरती के बाद स्री को सृजन शक्ति और माता का स्थान दिया है……….
” सृजन के हृदय में ,
हर विचार एक स्वप्न ही है,
सृष्टि के सृजन का भी……
वही स्वप्न अनंत का दर्पन है ,
और सत्य के दर्शन का भी ……..
मन के भाव प्रज्ञा में होते हैं उदित,
तब सृष्टि भी बन जाती है जीवन का प्रतीक
दर्शन की उच्चता समझाने के लिए ……..
विरानता में सुलगता है जीवन,
अभिशाप से सर्वश्रेष्ठ तक की संघर्ष यात्रा करनी होती है तय…….
प्रलय का आक्रोश कण,कण में,
उत्थान बनता है संजीवनी,
यही है जीवन का दर्शन …….
हर रोज एक नयी खुशी आँखों में भर जाती है,
जीवन के असली मूल्य समझाने हेतु,
जीवन को लड़ना पड़ता है तुफान और आँधियों से,
यही है जीवन का दर्शन …….
यह कुछ पंक्तियां मेरे ” दर्शन ” नामक महाकाव्य में मैंने लिखी हैं…….यह महाकाव्य लिखकर पूर्ण हो चूका है जो मैं नानी को समर्पित करना चाहूंगी जो अगले वर्ष प्रकाशित होगा ………
जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि तो अनुभव से ही आयी होगी,उसी दर्शन के बीज हमारी अवचेतन में बोकर आज उसके जीवन वृक्ष बन रहें हैं…..एक वट वक्ष की तरह हमारी आत्माओं को छायां दे रहें हैं……..आज इसी विश्वास को प्राप्त करने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है……आज यह अनुभव कर रहीं हूँ कि लेखक ,कवि की चेतना विकसित होने में परिवार की प्रेरणाएं कैसे काम करती हैं – चाहें वह सकारात्मक हो या नकारात्मक परंतु नानी ने ही वह सकारात्मक सोच को विकसित करने की प्रेरणा दी थी……


