काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘ कामायनी ‘ पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
बाराणसी । दिनांक 23/06/2023 को हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं हिंदुस्तानी अकादमी, प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में और जयशंकर प्रसाद फाउंडेशन के सहयोग से मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र में

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित महाकाव्य ‘ कामायनी ‘ पर एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसका शीर्षक था :- ” कामायनी को फिर से पढ़ते हुए।” विश्विद्यालय की परंपरा अनुसार कुलगीत का गायन अंजना रोया और आरा धन्या ने किया।
इस संगोष्ठी का संचालन कर रहे हिंदी विभाग के प्रो . नीरज खरे Neeraj Khare ने कहा कि कामायनी छायावाद की सर्वोत्कृष्ट कृति के रूप में मान्य है।
संगोष्ठी के संयोजक हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद साही Saइसdanand Shahi ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि कामायनी मानवीय मूल्य को रचने और गढ़ने की चुनौती लेकर उपस्थित होती है। आचार्य शुक्ल ने कहा था कि यात्रा में निकलती रही है बुद्धि लेकिन हृदय को भी साथ लेकर ।कामायनी हृदय और बुद्धि के समन्वय पर बल देते हुए नए मूल्य का निर्माण करती है।यह कृति श्रम की संस्कृति के साथ हमारा नाता जोड़ती है। श्रद्धा तकली पर सूत काटती हुई दिखाई देती है।
” मैं बैठी गाती हूं तकली के प्रतिवर्तन में स्वर विभोर
चल री तकली धीरे – धीरे प्रिय गए खेलने को अहेर ।”
कामायनी को फिर से पढ़ने की जरूरत को बताते हुए कहते हैं कि मल्लिनाथ ने कालिदास की टीका करते हुए कहा था कि दुर्व्याख्या के विष से कालिदास की कविता मूर्छित हो गई थी, इस मूर्छा को दूर करने के लिए मैं संजीवनी टीका लिख रहा हूं। इसी भांति कामायनी की कई दुर्व्याख्या के जवाब में कामायनी को फिर से पढ़े जाने की आवश्यकता है। दूसरे आज से १८ वर्ष पूर्व ” प्रेमचंद को फिर से पढ़ते हुए ” संगोष्ठी आयोजित हुई थी। आलोचकों द्वारा प्रेमचंद और प्रसाद को आमने सामने रखने की परंपरा रही है। जबकि ये एक दूसरे के विरोधी नही हैं। इन दोनों लेखकों के साहित्य में साझीदारी के कई बिंदु हो सकते हैं।
प्रेमचंद का गोदान सामाजिक मूल्यों की जड़ता को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है । कामायनी एक खंड प्रलय के बाद की कहानी है जो नए के निर्माण की चुनौती लेकर हमारे सामने उपस्थित होती है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से कामायनी का अविछिन्न संबंध रहा है । सन् ५० के दशक में जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कामायनी का मंचन हुआ था उस समय पंडित ओंकार नाथ ठाकुर मनु की भूमिका में थे। प्रेमलता जो इनकी शिष्या थी वो श्रद्धा की भूमिका में थी। कामायनी का मनु ईर्ष्यालु मनुष्य है। प्रसाद की विश्वदृष्टि के पीछे कौन से विचार काम कर रहे थे ? कामायनी में वो कहां तक अभिव्यक्त हुई है इस पर भी बात होगी। कामायनी सघन स्वार्थ को मनुष्यता के मूल्य के रूप में चित्रित करते हुए , प्रसाद की मानवीय दृष्टि और मानव मूल्य को भी रेखांकित करती है
” शक्ति के विद्युत कण, जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो
निरुपाय;
समन्वय उसका करे समस्त विजयिनी मानवता हो जाय!”
महामानव के लघुमानव के रूप में तब्दील होने पर भी बात होगी!
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी के सुपरिचित आलोचक प्रो. विजय बहादुर सिंह Vijay Bahadur Singh ने कहा कि ‘ काव्यकला तथा अन्य निबंध ‘ को पढ़े बिना प्रसाद को नहीं समझा जा सकता है। कवि प्रसाद को नाटककार प्रसाद और कथाकार प्रसाद के साथ पढ़े जाने की जरूरत है। तत्कालीन भारत की बुनियादी वेदना पर प्रेमचंद कार्य कर रहे थे और भारत की बुनियादी चेतना पर प्रसाद काम कर रहे थे। कामायनी भारत भटकाव को चेतना पर लाने की कोशिश है। मैथलीशरण गुप्त के प्रश्न ” हम कौन थे क्या हो गए ?” का सही -सही जवाब जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में दिया।
बड़ी कृतियां बार बार व्याख्या की मांग करती हैं। इसलिए प्रसाद की कामायनी की मूल संवेदना की शिनाख्त हेतु कामायनी को बार बार पढ़े जाने की आवश्यकता है। हमारे दिव्य आलोचकों को जातीय स्वरूप की स्मृति नहीं है । ऐसा शुक्ल के विषय में प्रसाद कहते हैं। प्रसाद की वास्तविक चिंता है कि भारत का मनुष्य अपनी मनुष्यता बचाए रखे। गांधी कहते हैं पश्चिमी सभ्यता राक्षसी सभ्यता है। अंग्रेज भारत में रहें हमें कोई दिक्कत नही है लेकिन अपनी अंग्रेजियत छोड़ कर रहें। समाज की व्यवस्था ब्रम्हांड की व्यवस्था के अनुसार होनी चाहिए। प्रकृति से , धर्म से ,राजनीति से हमारा संबंध कैसा होना चाहिए ये हमें कामायनी बताती है । बड़ी कृतियां बार -बार व्याख्या की मांग करती हैं इसीलिए कामायनी के संवेदना को मूल रूप में पकड़ने हेतु कामायनी को फिर से पढ़ने की जरूरत है ।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि संस्कृत और हिंदी के जाने माने विद्वान प्रो . राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि प्राचीन कवियों की परंपरा में प्रसाद की तुलना अभिनवगुप्त से की जा सकती है । अभिनवगुप्त शैव दर्शन के बड़े आचार्य हैं और प्रसाद भी शैव दर्शन के बड़े कवि हैं। भूमा की अवधारणा प्रसाद उपनिषद से लेते हैं। कामायनी का मनु मनोमय कोश में रहते हैं। सौंदर्यशास्त्र और काव्य चिन्तन को जहां अभिनवगुप्त छोड़ते हैं ,प्रसाद इस चिंतन को आगे तक ले जाते हैं। त्रिपाठी जी प्रसाद की कामायनी को अभिनवगुप्त के स्तोत्र और रूमी की कविताओं से जोड़ते हैं। प्रसाद की कामायनी में अभिनवगुप्त के दर्शन की झांकी भी मिलती है। प्रसाद जब काम के स्वरूप पर विचार करते हैं तब उसके पीछे के दर्शन पर भी विचार कर रहे होते हैं।
इस कार्यक्रम की वक्ता प्रो . संध्या सिंह ( सिंगापुर ) ने कहा कि प्रसाद का कामायनी मानवता को पुनर्जीवित करने का महाख्यान है।
इस संगोष्ठी की वक्ता डॉ. श्वेता दीप्ति ( नेपाल ) ने कहा कि प्रसाद की कामायनी हमे अपने पर्यावरण के प्रति सचेत करने का कार्य करती है।
इस संगोष्ठी की सचिव हिंदी विभाग की आचार्या डॉ. प्रियंका सोनकर Priyanka Sonkar ने कामायनी की पर्यावरणीय चेतना को अभिवक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।
संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रसाद की कहानी ” पुरस्कार ” का नाट्य मंचन डॉ . Lehari Meena की देख रेख सफलता पूर्वक आयोजित हुआ । रोशनी उर्फ धीरा(साभार हिंदी बिभाग, बी एच यू)





