मित्रता : मनीषा मारू
“स्वयं को दें अच्छे मित्र का तोहफ़ा”
“मित्रता”
मित्रता ये शब्द,
सुनने में होता कर्ण प्रिय।
सांझा होती बातें,
और जुड़ जाता हैं हृदय।
बचपन की मित्रता,
कहलाती लंगोटिया यार।
जवानी की मित्रता,
गले मिल छुपाती हैं प्यार।
ना जाति दिखे,
ना ही दिखे मज़हब।
ना गरीबी दिखे,
ना अमीरी का होता अहम।
बचपन की गलियों में,
कई प्यारे मित्र पीछे छूटे।
अल्हड़ सी जवानी में,
कइयों के दिल मिलकर टूटे।
अंतर्मन की बात बतलाऊं तो यारों
जीवनसाथी का साथ ही ताउम्र के लिए सच्चा होता।
विश्वास के स्नेह प्रेम से सींच ये रिश्ता और भी पक्का होता।
मित्रता,प्यार जिसे संग मिले जग में सबसे धणी वही इंसान होता।
फिर क्यों ना स्वयं को दें जीवनसाथी के रूप में अच्छे मित्र का तोहफ़ा।
मनीषा मारू
विराटनगर (नेपाल)

विराटनगर (नेपाल)


