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“वृन्दावन में काव्य पाठ एक अनमोल सफर” : संगीता ठाकुर

 

संगीता ठाकुर, काठमांडू, नेपाल । आज मैं बात करना चाहूंगी उस मथुरा अंतर्गत वृन्दावन की जिन्हे साक्षात कृष्ण ने बसाया है। अपने स्नेह भरे हृदय से गोकुल वासियों के लिये, सजाया और संवारा है तो यहां आप समझ सकते हैं कि वह “वृन्दावन” कितना सुन्दर और सुखद होगा। वास्तव में उस वृन्दावन कि मिट्टी की हम जितने व्याख्या करें कम है। अभी भी वहां कृष्ण की उपस्थिति लगती है। अभी भी वहीं प्रेम एक दूसरे में झलकता है। कृष्णमय दुनिया की बात ही गजब है । अभी हाल में उसी “वृन्दावन ” नगरी में ” युवा धर्म संसद” के द्वारा दो दिन का साहित्यक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें पांच देशों से अतिथि गण, विद्वत जन एवं संत-महात्मा पधारे हुए थे। यह ” युवा धर्म संसद” तीन वर्षों से लगातार विशिष्ट कार्यक्रम का आयोजन करते आ रहे हैं। यह कार्यक्रम ” विवेकानंद जी के द्वारा दिए गए सिकागो में भाषण के उपलक्ष्य में किया जाता है। यह विद्वानों का कहना है कि “विवेकानंद अभी भी हमारे नवयुवको के लिए नव भविष्यों के लिए एक सर्वश्रेष्ठ आदर्श के रूप स्थापित है। ये अभी भी हमें मार्गदर्शन करते हैं और सनातन का परचम फहराते हैं।
इस विशिष्ट कार्यक्रम के अंतर्गत विभिन्न विषयों को समेटा गया था, जिसमें प्रथम दिवस 16 सितंबर प्रात: 10 से 12 बजे तक चला। जिसमें व्याख्यान सत्र विषय: भारत की संप्रभुता का विचार और पक्षपण
जिसमें अयोध्या राम मंदिर के संत- महात्मा पधारे थे और अपने अपने विचार व्यक्त किये और कहे कि अभी हम ” रामायण और महाभारत को ही अपना आदर्श मानते हैं, भारत अभी भी अपने संप्रभुता में रहकर काम करता है। जिनका आदर्श वेद -पुराण है और सत्य सनातन पर विश्वास रखते हुए कर्मक्षेत्र में आगे बढ़ते हैं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।

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दूसरा सत्र था 1.30 से 3.30 तक, जिसमें चर्चा हुई ” व्यक्ति के निर्माण और परिवार की अवधारणा” पर कि व्यक्ति का निर्माण कैसे होना चाहिए और उसमें परिवार की भूमिका क्या होती है । विशिष्ट वक्ता के रूप में उपस्थित थे” आचार्य मिथिलेश नंदनीशरण जी महाराज “ उनका कहना है कि मनुष्य के रूप मात्र मिल जाने से उनका व्यक्तित्व नहीं उभर जाता, व्यक्ति निर्माण में हमें जीवन पर्यन्त लगना पड़ता है। जैसे कि कोई भी नवजात शिशु जब जन्म लेता है तो उसे अच्छा और बुरा का ज्ञान नहीं होता तो एक व्यक्ति के संस्कार और व्यक्तित्व को बनाने का काम शिशु के माता- पिता तथा संपूर्ण परिवार की जिम्मेदारी होती है। जैसे – बच्चा जन्म लेता है तो उसे गीला और सुखा का आभास हम कराते हैं, गीला बच्चों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होता है इसलिए हम नवजात शिशु को सुखे कपड़े पर रखते है। धीरे- धीरे बच्चा उस संवेदना को समझने लगता है और असहज महसूस होने पर रोने लगता है। उसी प्रकार से परिवार का दायित्व है कि अपने बच्चों को संवेदनशील और संस्कारी बनाये। संस्कार का मतलब होता है व्यक्ति को जीने लायक बनने में मदत करें। जिस प्रकार से हम गेहूं को कूट- छांटकर आंटा पिसने योग्य बनाकर आंटा तैयार करते है और खाने योग्य बनाते हैं उसी प्रकार एक व्यक्ति को उसके जीने योग्य कला- कुशलता और व्यक्ति निर्माण में परिवार की अहम भूमिका होती है।
और फिर सांय 4.30 से 7 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुति के द्वारा कृष्ण के गोपियों के साथ कृरा करना उनके साथ प्रेम पूर्वक समय बिताने पर प्रकाश डाला गया और दर्शकों को आनंद प्रदान किया गया।

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अब आरंभ होता है अगले दिन 17 सितंबर का प्रथम सत्र 10 बजे से 12 बजे तक की पहली संगोष्ठी जिसका विषय वस्तु है – “इतिहास और पुराण की बोधयात्रा “ जिसमें पधारे थे ” गोस्वामी श्रीअच्युतलाल भट्ट जी महाराज ” वरिष्ठ आचार्य एवं भागवत मनीषी ” गोस्वामी श्रीवत्स जी महाराज आदि… इन्होंने अपने अपने दृष्टिकोणानुसार व्याख्यान दिए और दर्शकों को संतुष्ट किये। उसके बाद 17 सितंबर 2023 का दूसरा सत्र आरंभ हुआ जिसका विषय वस्तु था- सिनेमा और पत्रकारिता में देश
कि सिनेमा और पत्रकारिता कैसे अपने दृष्टिकोण से समाज और राष्ट्र को दिशा निर्देश करता है।
पत्रिकारिता के क्षेत्र में पधारे थे ” आपकी अदालत के प्रधान संपादक इंडिया न्यूज़ के ” श्री रजत शर्मा जी ” उनसे लोग काफी प्रभावित हुए और उनसे बात – विमर्श करके दर्शक अपने- अपने संका का समाधान किये । इसमें विद्वानों का कहना था कि प्रत्येक क्षेत्र में सार्थक और निरर्थक बातें होती किन्तु हमें ज्यादातर सार्थकता को अपनाना चाहिए। सिनेमा निर्माता और पत्रकार अपने कला कुशलता के अनुसार शब्दों के द्वारा समाज और राष्ट्र में चेतना फैलाने का काम करते हैं फिर भी संपूर्ण कमजोरियों को सुधार करने में पूर्णरूप से सफल नहीं हो पाते हैं आदि… । श्रोतागण विभिन्न विषय वस्तुओं पर सोधपुछ करने पर सांत्वना देते हुए अच्छाइयों को अपनाने हेतु मार्गदर्शन किया गया। उसके बाद प्रारंभ होती है सायंकाल 4.30 से 8 बजे तक अंतरराष्ट्रीय काव्यगोष्ठी जो कि रात बारह बजे तक चलता रहा । जिसमें पांच देशों से साहित्यकार एवं कवि पधारे हुए थे जैसे कि – थाईलैंड, मौरिशश, रूस, नेपाल और भारत एवं भारत के विभिन्न विशिष्ट स्थानों से । उस वृन्दावन के अविस्मरणीय काव्यगोष्ठी में विभिन्न कवियों एवं साहित्यकारो ने अपनी अपनी रचनाओं से दर्शकों एवं साहित्यप्रेमियों का मन जिता जिसमें मुझे भी नेपाल के तरफ से कुछ सुनाने का मौका मिला, काव्यगोष्ठी से श्रोतागण काफी प्रभावित हुए। यह अवसर प्राप्त करने हेतु मैं सादर आभार प्रगट करूंगी डॉ असाबरी बापट एवं श्री सत्येन्द्र दहिया जी के प्रति जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया । मुझे इस कार्यक्रम में वृन्दावन तक पहुंचाने का श्रेय नेपाल के साहित्यकारो को स्नेह एवं सहयोग करते हुए, आई सी सी आर भारतीय राजदूतावास एवं विभिन्न विद्वतजनों के साथ साथ सचिदानंद मिश्र हिमालनी पत्रिका के संरक्षक एवं संपादिका व त्रि. वि. हिन्दी विभाग के प्र. डा. श्वेता दीप्ति जी का हार्दिक धन्यवाद् एवं शुभकामनाएं हैं। जब बांके बिहारी की कृपा बरसती है तो हमारे मन में किसी के प्रति प्रेम और सद्भाव उपजता है और परोपकार के क्षेत्र में हमें कार्य करने का मन बनता है तो इसबार ” वृन्दावन में साहित्यक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम सफलता पूर्वक समापन होने का पूरा श्रेय” हमारे कृष्ण कन्हैया, बांके बिहारी जी को मिलता है। प्रभु! ऐसे ही अपने भक्तों के मन में प्रेम उपजाते रहे। बोलिये वृन्दावन बांके बिहारी लाल की जय।।
संगीता ठाकुर, काठमांडू, नेपाल

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संगीता ठाकुर, काठमांडू, नेपाल

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