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बीआरआई के पीछे क्या है चीन का मकसद

चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के बारे में जानने के लिए।
बीआरआई के पीछे क्या है चीन का मकसद?
बीआरआई का प्रभाव क्यों बढ़ा, कैसे फंस गए कई देश?
पोखरा एयरपोर्ट के मामले में किस तरह फंस गया नेपाल?



चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) की कामयाबियां गिना रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने बीजिंग में बीआरआई फोरम में कहा कि इसके तहत जो ‘ब्लूप्रिंट बनाए गए थे, वे असल प्रोजेक्ट्स में बदल चुके हैं।’ इस आयोजन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) सहित 130 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। चीन दस साल पहले लॉन्च किए गए बीआरआई का जश्न भले ही मना रहा हो, लेकिन एशिया से लेकर अफ्रीका तक में कई देश चीन के इस चक्कर में फंस चुके हैं। भारत के पड़ोसी श्रीलंका और नेपाल भी इनमें शामिल हैं। नेपाल का पोखरा एयरपोर्ट ऐसा ही प्रोजेक्ट है, जो तैयार होने के बाद भी रनवे पर ही अटका हुआ है।

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नेपाल का हाल देखने से पहले आइए समझते हैं कि चीन का BRI क्या चीज है? चीन का यह जो BRI है, इसे ‘वन बेल्ट, वन रोड’ भी कहा जाता है। साल 2013 में चीन ने इसका खाका सामने रखा था। चीन ने इसे अपनी कंपनियों के लिए शुरू किया था। चाइनीज डिवेलपमेंट बैंक से मिले लोन के जरिए चीन की कंपनियां विदेश में सड़क, पुल, रेल नेटवर्क, बंदरगाह, हवाई अड्डे से लेकर एनर्जी प्रोजेक्ट तक तैयार करती हैं। BRI का मकसद दुनिया के तमाम देशों के साथ चीन का कनेक्शन मजबूत करना था। विजन यह था कि इसके जरिए चीन से पश्चिम एशिया और यूरोप तक में प्राचीन सिल्क रोड का नया रूप तैयार किया जाएगा।

Xi Jinping and Vladimir Putin

चीन का इरादा बीआरआई के जरिए एशिया, यूरोप और अफ्रीका को ऐसे ट्रेडिंग और इकनॉमिक एरिया में बदलने का है, जहां अमेरिका के मुकाबले उसका ज्यादा दबदबा हो। इंफ्रा में बड़े निवेश के जरिए चीन ने अपनी हाई-स्पीड रेल फर्मों के लिए तो बाजार बनाने की कोशिश की ही है, सीमेंट, स्टील और दूसरे मेटल्स की अपनी अतिरिक्त कैपेसिटी का निर्यात भी किया है।

अब देखते हैं कि BRI कितना बड़ा है?बीआरआई के तहत अब तक 152 देशों ने चीन के साथ एग्रीमेंट किए हैं। अधिकतर देश एशिया और अफ्रीका के हैं। इनमें यूरोपियन यूनियन के 18 देश भी हैं। G7 का मेंबर इटली भी इनमें शामिल है। बीआरआई के प्रोजेक्ट्स में चीन बड़ा फाइनैंसर रहा है। एक तरह से वर्ल्ड बैंक जैसी फाइनैंसिंग उसने की है। चीन का कहना है कि बीआरआई वाले देशों में करीब एक लाख करोड़ डॉलर के 3 हजार से ज्यादा प्रोजेक्ट लॉन्च किए जा चुके हैं। इन देशों के चाइनीज बीआरआई की ओर आने के पीछे एक बड़ी वजह रही है। वर्ल्ड बैंक सहित अधिकतर मल्टीलैटरल फंडिंग एजेंसियां इंफ्रास्ट्रक्चर के बजाय हेल्थ और एजुकेशन पर ज्यादा जोर देने लगी हैं। ऐसा इसलिए हुआ है कि बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट्स से पर्यावरण को नुकसान के लिए इन एजेंसियों पर सवाल उठाए जाने लगे।

चीन के BRI में किस तरह फंसे हैं कई देश?

बीआरआई के तहत चीन का लोन कई देशों के लिए एक अलग समस्या बन गया। चीन ने BRI के प्रोजेक्ट्स की शर्तों में कड़ी सौदेबाजी की। लोन और लीज की शर्तें काफी हद तक अपने पक्ष में रखीं। इसके चलते अधिकतर देशों में बीआरआई के प्रोजेक्ट भारी कर्ज में डूब गए और बाद में चीन ने लोन की भरपाई के एवज में लीज बढ़वा ली। श्रीलंका का हंबनटोटा बंदरगाह इसका एक बड़ा उदाहरण है, जो 99 साल की लीज पर अब चीन का हो चुका है। श्रीलंका अपने कर्ज की शर्तें नरम कराने के लिए हाथ-पैर मार रहा है। उसका कहना है कि इसके लिए उसने चीन के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक के साथ एक एग्रीमेंट किया है। भारी-भरकम कर्ज जांबिया और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए भी जी का जंजाल बन चुका है। यहां तक कि G7 का मेंबर इटली भी अब चाइनीज बीआरआई से निकलने के बारे में सोच रहा है क्योंकि उसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है। इटली के थिंक टैंक ISPI का कहना है कि अगले साल मार्च में बीआरआई प्रोजेक्ट्स का रिव्यू होना है और पूरी संभावना है कि तब इटली बीआरआई से किनारा कर लेगा।

pokhara international airport

आइए अब देखते हैं कि नेपाल का क्या हाल है?
बीआरआई के तहत नेपाल का पोखरा इंटरनैशनल एयरपोर्ट (Pokhara International Airport) शामिल किया गया था। इस साल जून में वहां नए इंटरनैशनल टर्मिनल का उद्घाटन हुआ, जब चीन से सेचवान एयरलाइंस की फ्लाइट वहां पहुंची। बड़े धूमधाम से उसका स्वागत किया गया। इसकी वजह भी थी। पोखरा एयरपोर्ट का उद्घाटन होने के 6 महीने बाद पहली फ्लाइट जो आई थी।

हालांकि उस जश्न में एक कड़वी हकीकत भी छिपी थी। पोखरा एयरपोर्ट मुख्य रूप से चीन की कंपनियों ने बनाया था। उसके लिए पैसा भी चीन से आया था। यानी चीन का पैसा घूम फिर कर चीन की कंपनियों के पास पहुंच गया। लेकिन ऊंची ब्याज दर पर वह नेपाल के खाते में उधार के रूप में दर्ज हो गया। अब आने वाले कई वर्षों तक नेपाल इसे चुकाने के लिये बाध्य है । नवभारत गोल्ड टीम साभार



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