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जीने की अभिलाषा

 

रवीन्द्र झा ँशंकर’:काल के झंझावात से पंखुडिÞयाँ वृक्षों से टूटकर गिर जाती हंै, फूल धूल में मिल जाते हैं, अधपके फल झडÞ पडÞते हंै । चारों ओर मृत्यु की विभीषिका, विनाश का ताण्डव, अस्थिरता का साम्राज्य और उनके बीच मुस्कुराता हुआ उन्नतग्रीव मानव अपनी अप्रतिम शक्ति और अपराजेय मनोबल के साथ प्रकृति की विनाश लीला को चुनौती देता हुआ उसे पराभूत कर पता नहीं कब से उस के साथ संर्घष्ा करता चला आ रहा है । कितने ही मनुष्य महामारी के शिकार हुए, ज्वालामुखी के भयावह विस्फोट ने उनका र्सवश्व भर्ूगर्भ में विलीन कर दिया, बाढÞ उनका सब कुछ बहा ले गई । पारस्परिक संर्घष्ा ने भी मानव जाति का कम नुकसान नहीं किया है । मानव अनादिकाल से संसार की क्षणभंगुरता को देख रहा है । शास्त्र एवं सन्तों ने भी संसार को मिथ्या बतलाया है । बतलायें क्यों न – हंसते-बोलते चेहरे क्षणभर में न जाने कहाँ चले जाते है – हमारा सुनहला संसार, हराभरा जीवनोद्यान हमेशा के लिए उजडÞ जाता है । बौद्ध दर्शन ने संासारिक दुःखों को शाश्वत बतलाया और उनसे बचने के लिए संसार को त्याग कर भिक्षु जीवन व्यतीत करने का सुझाव दिया । सभी धमोर्ं ने संसार से असंगता की उसके सम्बन्धों में आसक्त न होने की शिक्षा दी है । यह सब होते हुए भी मानव के भीतर पता नहीं ऐसी कौन सी प्रबल इच्छाशक्ति है, जिसने उसे जीवन के प्रति उदासीन नहीं होने दिया । संसार के प्रति उसके हृदय में प्रवाहित होनेवाले प्रेम के स्रोत को सूखने नहीं दिया । मानव की यह अदम्य इच्छाशक्ति ही ‘जिजीविषा’ या जीनेकी अभिलाषा कहलाती है । जिससे अनुप्राणित होकर वह जीना चाहता है- अपराजेय मृत्यु के भय को जीत कर अपरिहार्य विनाश को चुनौती देकर संसार के रागात्मक सम्बन्धों की समाप्ति से भग्न हृदय को जोडÞ कर ! इसी जिजीविषा का सशक्त और कभी मन्द न पडÞने वाला गम्भीर उद्घोष ऋषि के कण्ठ से भी फूट पडÞा था- ‘मृत्र्योमा अमृतं गमय’ प्रभो ! मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ।’ काल की अनन्तता में औसतन पचास-साठ या अधिकतम सौ सवा सौ साल जीनेवाले अल्पायु मानव की यह अमरता की कामना सामान्यतः कुछ उपहासास्पद सी लगती है । पर वह अमरता क्या है, जिसकी ऋषि ने कामना की थी – उसने अमरता किसे माना है –
सभी में जीने की उत्कट इच्छा होती है । सभी संसार में बने रहना चाहते हैं । कोई मरना नहीं चाहता । सभी ओर से निराश, प्रताडिÞत और घसीटते हुआ जीवन पथ पर चलने वाला मनुष्य भी थोडÞा और जी लेना चाहता है । वह अचानक उत्पन्न होने वाले मृत्यु के कारणों से संर्घष्ा करता है । लम्बी बीमारी से आक्रान्त रोगी अथवा मृत्युशैया पर पडÞे हुए वृद्ध से भी, जो शायद ही आनेवाली उषा को देख सके, कहा जाए- ‘अच्छा हो, अबर् इश्वर आप को जल्दी उठा लें, ताकि इस असहृय वेदना से आप को छुटकारा मिले तो उसकी मुखमुद्रा में निश्चय ही अन्तर आ जाएगा, भले ही वह इस बात का स्पष्ट विरोध न कर सके । हम कितने ही आत्मीय जनों की शवयात्रा में गए हैं । जाते समय हमारे मन पर विषाद का जो गम्भीर भाव रहता है, वह श्मशान से लौटते समय काफी कम हो जाता है । जिस परम आत्मीय जनकी मृत्यु पर हमारा जीवन भी हमें भारस्वरूप लग रहा था, हम सोच रहे थे कि उस के बिना हम कैसे जी सकेंगे – उसके चिर वियोगजनित सन्ताप को भी कुछ दिनों बाद भुला कर संसार के नानाविध कार्याें में उलझ जाते है । मृत्यु की घटनाओं को लगातार देखते-देखते तो हमारे मन पर उनका हल्का और क्षणिक असर ही हो पाता है । दूसरों की मृत्यु के तीक्ष्ण असर हमारी जिजीविषा के दर्ुगन्ध कवच को नहीं भेद पाते । तभी तो महाभारतकार ने कहा है कि प्रतिदिन प्राणी मौत के मुँह में जा रहे हैं, फिर भी दूसरे संसार में बने रहना चाहते हैं, इससे बढÞकर आर्श्चर्य और क्या हो सकता है ।
यौवन और सौर्न्दर्य से समन्वित इस भौतिक पिण्ड -शरीर) की विभिन्न आवश्यकताओं की पर्ूर्ति के लिए धन का संग्रह करना, उसके लिए अधिकाधिक सुख भोग के साधन जुटाना अर्थात् जीवन को आन्दपर्ूवक जीने की इच्छा जिजीविषा का दूसरा भौतिकवादी स्वरूप है ।

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