Wed. Jul 15th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

भूकंप नहीं कमजोर संरचना दोषी : कंचना झा

 

कंचना झा, हिमालिनी अंक नवंबर 023 । पिछले कुछ दिनों से नेपाल में एक ही समाचार ने सभी के ध्यान को अपनी ओर खींचा हुआ है । हाल ही में जाजरकोट और रुकुम में विनाशकारी भूकम्प आया था उसे लेकर समाचार बनाए जा रहे हैं । प्रत्येक दिन क्षति को लेकर बातें आती है । उद्धार और राहत सामग्री कहाँ से कैसे आ रहा है ? उस क्षेत्र के लोग कैसे अपना समय व्यतीत कर रहे हैं ? इन सभी बातों से समाचार बनाया जा रहा है । भूकम्प ने इतने लोगों की जान ले ली, इतने घर क्षतिग्रस्त हो गये । बड़े बडेÞ हेडलाइन बनाकर लिखे गए समाचारों में कितनी सत्यता है ? क्या जान सच में भूकम्प ने लिया है या क्या सारी क्षति भूकम्प के कारण से हुई है ? या फिर कहीं न कहीं हम ही तो नहीं है इसके कारण में । या फिर कहीं हमारी संरचना तो दोषी नहीं है इसके लिए ? भूकम्प पर इतना बड़ा आरोप लगाना कितना न्यायोचित है ?

दरअसल भूकम्प एक प्राकृतिक घटना है । हमारी पृथ्वी के अन्दरुनी भाग में रहे टेक्टोनिक प्लेट जब आपस में टकराती है और उस के टकराने से उत्पन्न उर्जा जो बाहर निकलने की कोशिश करता है, जिसके कारण जमीन में कम्पन होता है । यही घटना भूकम्प है । यह प्राकृतिक नियम है और लगातार होती रहती है । भूकम्प कोई पहली बार आया है ऐसा नहीं है हजारों साल पहले भी भूकम्प आता था, आज भी आ रहा है और भविष्य में भी आता रहेगा । लेकिन अंतर केवल इतना है कि पहले जो भूकम्प आता थी उसमें मानवीय क्षति इतना ज्यादा नहीं होती थी लेकिन अब जो भूकम्प आ रहा है उसमें मानवीय क्षति बहुत ज्यादा हो रही है ।
बहुत दिन नहीं हुए २०७२ साल में नेपाल में जो भूकम्प आया था उसमें ९ हजार से ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई थी और क्षति की तो बात ही छोड़े कितनी हुई कितनी हुई । सच कहें तो २०७२ के भूकम्प से जो तबाही हुई थी उसे लोग आज भी नहीं भूले हैं । कुछ महीने पहले टर्की, सिरिया और मोरक्को में आए भूकम्प ने एक लाख से ज्यादा लोगों का जान लिया था ।

मन में सवाल तो उठता है न कि आखिर क्यों हो रही है इतनी बड़ी मानवीय क्षति ? क्या सच में भूकम्प ही जिम्मेदार है इस क्षति के लिए ? वैसे तो कहा गया है कि प्रृकृति कभी मानव से कुछ लेती नहीं है वह सिर्फ देना जानती है लेना नहीं । तो फिर इतनी जाने क्याें ली ? हम इंसानों की यह फितरत होती है कि हम दोषी स्वयं को नहीं दूसरों को देते हैं । माना कि प्राकृतिक आपदा कभी कहकर नहीं आती लेकिन हम जानते तो है कि नेपाल भूकम्प से पीडि़त है । यहाँ कभी भी किसी भी समय भूकम्प का झटका आ सकता है तो भी हम बहुत सी बातों पर ध्यान नहीं देते । खासकर जिन संरचनों का हम निर्माण करते हैं उस ओर तो हमारा ध्यान जाता ही नहीं है ।
इसी सप्ताह जाजरकोट तथा रुकुम में आए ६ दशमलव ४ रेक्टर के भूकम्प से कितनी तबाही हुई है । शुक्रवार कार्तिक १७ गते रात ११ बजकर ४७ मिनट में आए इस भूकम्प के कारण १६० से ज्यादा लोगों की मृत्यु हो चुकी है और २०० से ज्यादा लोग घायल हैं । २० हजार से ज्यादा घर में क्षति पहुँची है और लोगों का हाल बेहाल है । सर पर रहने को छत नहीं खाने के लिए भोजन नहीं और ना ही पीने के लिए स्वच्छ पानी है । एक बार फिर हर तरफ से एक ही रोना कि भूकम्प ने बड़ी क्षति कर दी है ।

यह भी पढें   प्रधानमंत्री बालेन को ‘श्री ८’ की संज्ञा देने पर रास्वपा की आपत्ति, रिकॉर्ड से हटाने की मांग

भूकम्पविज्ञों का कहना है भूकम्प अपने आप में क्षति नहीं करती । हमने जो गलती की है उसकी सजा हमें देती है प्रकृति । करोड़ों रुपये खर्च कर हम घर बनाते है लेकिन घर बनाते समय हम भूकम्प के बारे में कितना सोचते हैं ? कैसी जमीन पर हम घर बना रहे हैं ? कितने तल्ले का घर बना रहे हैं ? कितने क्षेत्रफल में कितना बड़ा घर बना रहे हैं ? इन बातों की ओर हमारा ध्यान कभी जाता ही नहीं है । हम नहीं सोचते हम बस एक ही बात सोचते है कम पैसा खर्च कर ज्यादा से ज्यादा आमदनी हो । और घर कमजोर बना लेते हैं । भूकम्प है तो प्राकृतिक आपदा । यह कब, कहाँ, आए इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है लेकिन जब आती है तो हमारे कमजोर संरचना ही हमारे मृत्यु का कारण बन जाती है ।

२०७२ साल में गोरखा के बारपाक को केन्द्रबिन्दु बनाकर आए भूकम्प के बाद सरकार ने भवन निर्माण सम्बन्धि कुछ नए आचार संहिता बनाई थी ,उसे लागू भी किया गया था । उस समय लोगों ने निर्णय किया था कि वो बड़े बड़े, उँचे ऊँचे भवन नहीं बनाएंगे । कुछ समय तक लोगों के मन में डर रहा लेकिन कुछ समय बाद वो डर हट गया और लोग फिर वैसी ही संरचना का निर्माण करने लगे । थोडेÞ से पैसे बचाने के चक्कर में अभी भी हम कमजोर संरचना बना रहे हैं । थोडेÞ से पैसे के लोभ में सरकारी निकाय वैसी कमजोर संरचना को प्रयोग करने की स्वीकृति भी दे देती है । सच में देखा जाए तो जाजरकोट और रुकुम में जो क्षति हुई है उसका प्रमुख कारण वहाँ की कमजोर संरचना ही है ।

यह भी पढें   बालेन सरकार के सौ दिन का कार्यकाल असफल-राजेन्द्र महतो

भुगर्भविद् लगातार आगाह कर रहे हैं कि हमें सचेत रहना चाहिए । हिन्दुकुश पर्वतमाला क्षेत्र भूकम्पीय क्षेत्र है और इस क्षेत्र में कभी भी बड़ा अर्थात ८ रेक्टर के आसपास का भूकम्प आ सकता है । वैज्ञानिकों द्वारा दिए जा रहे इस चेतावनी को हमने अभी भी गंभीरता के साथ नहीं लिया है, दूर दराज की तो बातें ही छोड़ दें राजधानी काठमांडू में अभी भी कमजोर संरचनों का निर्माण हो रहा है, और कमजोर संरचना में लोग अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं । ऐसे में भूकम्प आया तो बहुत बड़ी क्षति का होना तो स्वभाविक ही है ।

पिछले कुछ दशकों में नेपाली समाज शहरमुखी हो गया है । वह किसी भी तरह शहर में एक छोटा सा मकान बनाना चाहता है जिसके कारण किसी भी शहर में अब खाली जगह नहीं है । लोग खेती योग्य जमीन पर घर बनाकर रहने लगे हंै । ऐसे में कदाचित भूकम्प आ जाती है तो खुले जगहों की कमी है और भूकम्प से भी ज्यादा उसके बाद का जिन समस्याओं से जूझना पड़ता है वह बड़ी हो जाती है ।
भुकम्प प्रभावित क्षेत्र में उद्धार और राहत पहुँचाने में कठिनाई होती है । इसके बाद उस क्षेत्र में पीने का पानी का अभाव हो जाता है । गन्दगी के कारण त्वचा और पेट सम्बन्धि रोग बहुत से लोगो को लग जाती है जिससे बहुतों की जान भी चली जाती है । हम सबकुछ जानते हुए भी अनजान बन जाते हैं । हमें मालूम है कि भुकम्प कभी भी आ सकता है लेकिन कहाँ हम कर रहे हैं भूकम्प की पूर्व तैयारी ? जरुरत है भूकम्प आने से पहले की तैयारी करने की । लोगों को सर्तक बनाने की, उचित और सही ज्ञान देने की । सुरक्षित स्थान बनाने की जहाँ लोग प्राकृतिक आपदा के समय में भी अपने आप को सुरक्षित रख सके ।

२०७२ साल का भूकम्प जिसे याद कर आज भी मन में सिहरन उत्पन्न हो जाती है । आम नागरिकों की तो ऐसी अवस्था थी कि जो पीडि़त थे उन्हें एक चाउचाउ का पैकेट नहीं मिला, खुले आसमान के नीचे सोना पड़ा । सरकार ने त्रिपाल और भोजन पानी की व्यवस्था की लेकिन आँखों देखा हाल ये था कि जो सच में पीडि़त थे उन्हें कुछ नहीं मिला । जो थोड़े दबंग और राजनीतिक पार्टी के कार्यकत्र्ता थे उनका घर त्रिपाल, पानी की बोतलें और चाउचाउ के पैकेट से भर गया ।

यह भी पढें   आज कापंचांग: आज दिनांक 14 जुलाई 2026 मंगलवार शुभसंवत् 2083

 

सबसे अहम बात ये हरेक प्राकृतिक आपदा आने के बाद ये प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति जो इलाके के भ्रमण पर चले जाते हैं । उससे बेहतर है कि निगरानी में रखें हर बात को । उद्धार कैसे क्या किया जा रहा है ? पीडि़तों तक राहत सामग्री पहुँची या नहीं । इन बातों की ओर उनका ध्यान जाना चाहिए । धन जन की जो क्षति हुई है उससे कैसे उबरेंगे ? इन बातों पर चर्चा करें और उसे कार्यान्वयन में लाएं । ये जो मरने वालों के परिवार को आप क्षतिपूर्ति दे रहे हैं उसके बदले में उसके क्षतिपूर्ण सरचना को नए तरीके से बनाए ताकि आने वाले भूकंप से उसका बचाव हो ।

 

अगर गौर करें तो इस बार के भूकम्प पीडि़त क्षेत्र को कितनी सहायता राशि मिली है । केवल इनका अगर सही तरीके से खर्च कर दिया जाए तो बहुत बड़ी क्षति से हम बच सकते हैं । देश विदेश ने अपने तरीके से बहुत सहायता भेजी है । यहाँ तक कि सभी प्रदेश सरकार ने भी सहायता भेजी है जैसे कर्णाली सरकार ने भूकम्प प्रभावित १६ स्थानीय तह को २ करोड़ की सहायता भेजी है । नेपाल आइएमई ग्रुप ने भी प्रधानमन्त्री को १ करोड़ ५० लाख का चेक हस्तान्तरण किया है भूकम्प पीडि़तों के लिए । इसी तरह भूकम्प पीडि़तों के लिए भाटभटेनी ने एक करोड़ ११ लाख एक हजार १११ का सहयोग चेक प्रधानमन्त्री को हस्तान्तरण किया है । इतना ही नहीं मित्र राष्ट्र भारत ने भूकम्प के तुरंत बाद नेपाल को हरसम्भव सहयोग उपलब्ध कराने की बात कही । और माननीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी की प्रतिबद्धता अनुरूप भारु १० करोड़ बराबर की आपतकालीन राहत सामग्री भेजी ।
इससे यह पता चलता है कि हमारे पास सहयोग करने वाले बहुत हैं तो चाहे तो पूर्व तैयारी कर सकते हैं लेकिन करते नहीं है । अभी हम अगर संचरना पर ध्यान दें तो बहुत बड़ी क्षति से बच सकते हैं ।

कंचना झा
कार्यकारी संपादक
हिमालिनी ऑनलाइन

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *