मेहमान (कहानी) : मौसमी सिंह (तिवारी)

मौसमी सिंह, हिमालिनी अंक फरवरी 2024।
खट–खट की आवाज से रजनी बार–बार परेशान हो रही थी । रजनी के पास इतना भी समय नही था कि वो बेसन से सने हाथों को धोकर दरवाजा खोले पर खटखटाहट की आवाज उसे बार–बार परेशान कर रही थी । वह मन हीं मन झल्ला भी रही थी, पता नहीं कौन आ टपका ! इस उमस भरी दोपहर में । मेहमानों का घर आने का समय हो रहा था । सो उसके पास समय बहुत कम था फिर भी दरवाजे पर तो देखना ही था । बाहर से बार–बार आती आवाज परेशान कर रही थी रजनी को । हाथों को तौलिए से पोछती हुई ऊपर बालकनी से ही उसने नीचे की ओर देखा और पूछा, ‘कौन है ?’
साधु आवाज के साथ ही ऊपर के तरफ देखता हुआ बोला–‘बेटी ! बहुत दिनों से भूखा हूँ, कुछ खाने को दे दो ।’
रजनी साधु की आवाज ठीक से सुन नहीं पाई, फिर से झल्लाई–‘कौन हो भाई ? कुछ बोलते क्यों नहीं हो ?’
साधु मेन गेट के दरार के अंदर अपना हाथ घुसाकर हिलाता हुआ बोला– “बेटी मैं बहुत दिनों से भूखा हूँ, कुछ खाने को दे दो ।”
ओह ! अच्छा तो यह भिखारी ही इतनी देर से गेट पे खड़ा दरवाजा खट–खटा रहा है । मेहमानों के घर आने में अब कुछ मिनट ही शेष रह गये थे । नाश्ते के लिए अभी पकौड़े तलने थे और सारी तैयारी तो हो चुकी थी । पकौड़े से उसे याद आया अभी–अभी तो पकोड़े तलने के लिए कड़ाही मैं रख कर आई हूँ । वह दौड़ती हुई किचन में गई । किचन में धुआँ हीं धुआँ पैmला हुआ था । पकौड़े सारे काले पड़ चुके थे । रजनी झटपट गैस बंद कर सारी खिड़कियां और किचन का दरवाजा खोल दी । इतनी ही देर में फिर से आवाज आई ।
‘बेटी मैं बहुत प्यासा भी हूँ थोड़ा पानी ही पिला दो ।’
पकौड़ों का जलना, समय का अभाव और उस पर से साधु की आवाज ने तो जैसे आग में घी डालने वाला काम किया । वह आगबबुला होती हुई दरवाजे की तरफ बढ़ी । सारा कुसूर इसका है इसके कारण मेरे सारे पकौड़े जल गए । अब पहले तुझे ही निपटाती हूँ, फिर मेहमानों को देख लूँगी ।
धडाÞम से दरवाजा खोलती हुई बोली– ‘हाँ, बोलो क्या बोलना है तुम्हें ? इतनी देर से इसी दरवाजे पर खड़े हो, तुम्हें कोई और दरवाजा दिखाई नहीं देता क्या । इतनी तेज धूप में तुम लगभग २० मिनट से इसी दरवाजे से चिपके हो ।’
वह गुस्से से बोली, ‘भीख माँग कर गुजारा करना है तो इतने सारे दरवाजे हैं, २० मिनट में तो तुम ३ –४ दरवाजा देख लेते । क्यों व्यर्थ में तुम अपना समय खराब कर रहे हो ? और मेरे पकौड़े भी जला दिये तूने । वह गुस्से में सिर्पm बड़बड़ाती जा रही थी । मेरे घर मेहमान आने–वाले हैं सारे पकौड़े तुम्हारे कारण जल गये और मेरे पास अब ज्यादा वक्त भी नही है । मेहमान लोग कभी भी आ सकते हंै ।’
साधु गिड़गिड़ाता हुआ बोला– “बेटा इसमें मेरा क्या कुसूर है ? मैने तुम्हारे पकौड़े नहीं जलाये” मैं तो फकीर हूँ माँगकर खाने–वाला । भूखा था इसलिए तुम्हारा घर और दरवाजा बड़ा देखकर यहीं पर रूक गया और बड़ी देर से दरवाजा से चिपका हूँ शायद कुछ ज्यादा मिलने की आस मे हूँ । इसमें मेरा क्या कसूर है बेटा, तुम्हारे घर के अंदर क्या हो रहा है, दरवाजे के बाहर खड़ा फकीर को क्या मालूम । अच्छा पहले पानी ही पिला दो बहुत प्यास लगी है ।’
रजनी गुस्से में इतनी भरी थी कि वह कुछ सुनने को तैयार हीं नहीं थी । ‘चलो, हटो जाओ, अब तुम्हे कुछ भी नहीं मिलेगा । मेरी सारी मेहनत पर तूने पानी फेर दिया ।’
साधु गिड़गिड़ा रहा था, ‘बेटी पानी पिला दो बहुत प्यास लगी है….. ।’
रजनी गुस्से से अंधी हो चुकी थी । वह झट् से अंदर आकर दरवाजा को ठेलना ही चाहती थी कि उससे पहले हीं दरवाजा खुल गया । वह और भी गुस्साती हुई बोली ‘क्या है ? अब, भी तुम नहीं समझे ।’
‘सब समझ गया बहना ।’
‘भैया आप ?’
भैया रजनी का हाथ पकड़कर सर सहलाते हुए बोले–‘चल मैं तुझे अंदर सब समझाता हूँ । और सुनो! तुम अपने साथ जो जूस और मिठाईयाँ लायी हो वह साधु बाबा को दे दो और मेरी बहना ने जो नादानियाँ की है उसके लिए साधु बाबा से माफी माँग लेना ।’
समीर अपनी पत्नी शालिनी से बोलते हुए बहन का हाथ पकड़े दरवाजा से अंदर आ गए । बहन को समझाते हुए उन्होंने कहा, ‘अरे पगली! मैं तेरी सारी बातें सुन रहा था । भैया भी कभी बहन के लिए मेहमान बन सकता है भला ? जले पकौड़े ही खा लेंगे । कोई दिक्कत नही ।ं वो साधु बाबा के भेष में शिव जी तेरे घर पधारे है । हो सकता है वह तेरे द्वार पर फिर कभी दोबारा ना आये । वह भूखा और प्यासा तुझसे बार–बार खाना और पानी माँग रहा है । मैं तेरे घर बार–बार आऊँगा और जले पकौडेÞ खाऊँगा । मैं मेहमान नही हूँ पगली ।’
रजनी की आंखें भर आईं । उसने साधु से माफी मांगी और उसे आदर के साथ खाना पीना देकर विदा किया । वह सोच रही थी कि सचमुच भैया ने कितनी बड़ी बात कही है । क्या पता किस वेश में हमें ईश्वर मिल जाए और ईश्वर ना भी मिले तो किसी की संतुष्ट आत्मा की दुआ तो कभी खाली नहीं जा सकती है न ।

उप-प्रध्यापक, केंद्रीय हिंदी विभाग, त्रि वि वि ।

