कलाकारी में विश्राम नहीं होता, निरंतर संघर्ष करना होता है : प्रियंका झा

कई मामलों में आज भी नेपाली समाज महिलाओं के लिए ज्यादा उदार नहीं है, संकुचित है । आज से लगभग २०–२५ साल पहले का परिदृश्य और भी कठिन था । बेटियों के लिए घर से बाहर रह कर काम करना मुश्किल था । तराई–मधेश के हक में परिस्थिति और भी जटिल थी । ऐसे ही समाज में प्रियंका झा का जन्म हुआ । सर्लाही जिला औरही नगरपालिका स्थित परवाहा गांव में उनका जन्म हुआ है । लेकिन गजब का संयोग ! पिता रमेशरंजन झा नाट्यकला और साहित्य के साधक थे । छोटी–सी बेटी प्रियंका में पिताजी का प्रभाव दिखने लगा । घर में कला–साहित्य से जुड़े हुए लोगों का आना–जाना होता रहता था । बेटी प्रियंका में कला के प्रति जो मोह दिख रहा था, उसके प्रति माता देवता झा ने भी हौसला देकर सहयोग किया । इसीलिए समाज कुछ भी कहे, बाल्य जीवन से ही प्रियंका कला क्षेत्र में कूद गई । इसीलिए आज तराई–मधेश में मैथिली भाषा का नाट्य–साहित्य तथा अभिनय क्षेत्र में परिचित नाम बन गया है– प्रियंका झा । प्रियंका के कला जीवन को लेकर हिमालिनी के लिए लिलानाथ गौतम ने कुछ बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–
० कलाकारी में आप की यात्रा कैसे शुरु हुई ?
– मैं कक्षा ५ में पढ़ रही थी, उस समय मैंने स्कूल के एक प्रतियोगिता में डांस किया था । यह वि.सं. २०५५ साल की बात है । मिथिला नाट्य क्षेत्र में महेन्द्र मलंगिया की अपनी एक अलग पहचान है । वह मेरे पिताजी के गुरु हैं और मेरे भी । पिता रमेशरंजन झा भी कला क्षेत्र में ही जुड़े हुए थे । गुरु महेन्द्र मलंगिया लिखित एकांगी नाटक था– ‘ ओ खाली मुँह देखै छै’ । इस नाटक को गुरु महेन्द्र जी ने पूर्णंकी नाटक में रुपान्तरण किया, जहां बहुत सारे पात्र हो गए । नाटक दहेज संबंधी विषयवस्तु को लेकर लिखा गया था । उसमें सीता नाम की एक बच्ची पात्र है । मेरे डांस से प्रभावित होकर गुरु महेन्द्र मलंगिया ने सीता नामक पात्र का चरित्र निर्वाह करने के लिए मुझे प्रस्ताव किया । शुरु में तो मैंने इन्कार किया था । लेकिन पिताजी के हौसला से मैंने प्रस्ताव को स्वीकार किया, यही से मेरी कलाकारिता की औपचारिक यात्रा शुरु हुई है ।
यह वि.सं. २०५६–०५७ साल की बात है । प्रज्ञा प्रतिष्ठान की ओर से एक नाटक महोत्सव आयोजन हो रहा था । देशभर से विभिन्न भाषा–भाषियों के कलाकार काठमांडू आ रहे थे । मैथिली भाषा की नाटक ‘ ओ खाली मुँह देखै छै’ भी चयनित था, जो पहली बार काठमाडू में मञ्चन हो रहा था । नाटक खतम होने के बाद कलाकार निर शाह ने मुझे बाल कलाकार के रूप में सम्मानित किया । उसका दृश्य आज भी मेरी मानसपटल में ताजा है । यह मेरा प्रथम ‘स्टेज–शो’ था । घर में कलाकारिता को लेकर बहस होती ही रहती थी । घर में सुनिल पोखरेल जैसे राष्ट्रीयस्तर के कलाकारों का आना–जाना होता ही रहता था । पोखरेल जी जब भी हमारे घर आते थे, मैं गीत गाकर सुनाती थी । उस समय वह कहते थे– ‘आप जरूर कलाकार बनेंगे÷बनना चाहिए ।’ शायद ऐसा ही वातावरण मुझे कलाकारिता की ओर खींच लाया ।
० आज तक आप ने कितने नाटकों में अभिनय किया है ?
– मेरे खयाल से ४० से भी अधिक विषयवस्तु में निर्मित नाटकों में मैंने अभिनय किया है । उसका स्टेज–शो अनगिनत है । यकीन तथ्यांक तो नहीं है, लेकिन २० हजार से भी अधिक सड़क नाटक किया है । विशेषतः जनकपुर, राजविराज, काठमांडू जैसे क्षेत्रों सड़क नाटक किया है । स्टेज, थियटर, डबली नाटकों की संख्या भी सैकड़ों में है । एफएम रेडियो में ‘रेडियो ड्रामा’ का कार्यक्रम भी संचालन किया है । जनकपुर से संचालित एफएम रेडियो में उस समय ‘बा¥ह मसला ते¥ह स्वाद’ नाम का हास्यव्यंग्यात्मक कार्यक्रम खूब चर्चित रहा । रवीन्द्र झा जी, रामनारायण ठाकुर जी और मैं तीन व्यक्ति मिलकर कार्यक्रम चलाते थे । इस कार्यक्रम का प्रभाव जनकपुर में आज भी है । आज भी कई लोग उस कार्यक्रम को लेकर हम लोगों से बात करना चाहते हैं । इसीतरह ‘संगोर’ नाम के दूसरा रेडियो नाटक कार्यक्रम भी था, जो देशभर के विभिन्न एफएम रेडियो स्टेशन से प्रसारण होता था । इसमें मैं प्रमुख भूमिका में थी, संगोर २०० भाग तक प्रसारण हुआ था । एन्टेना फाउण्डेशन के लिए भी मैंने मैथिली नाटक लेखन का काम किया है ।
० अभिनय करते वक्त आप किस तरह के पात्र÷चरित्र में प्रस्तुत होना पसन्द करती हैं ?
– एक कलाकार को जो भी रोल मिलता है, उसके अनुसार करना पड़ता है । मैथिली और नेपाली भाषाओं के नाटकों में मैंने अभिनय किया है, जहां समाज के विविध नारी चरित्र हैं । तराई–मधेश में रहनेवाली अधिक महिला दहेज प्रथा और डायन के आरोप में पीडि़त हैं, इसतरह की महिला हिंसा के विरुद्ध निर्मित नाटकों में नेतृत्वदायी भूमिका निर्वाह करते वक्त ज्यादा आनन्द की अनुभूति होती है । समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए जो भी भूमिका मिलती है, उसमें मैं डूब सकती हूँ ।
० आज तक आप ने जो भी अभिनय किया है, आपकी नजर में उसमें से सबसे मनपसन्द पात्र कौन है ?
– माओवादी के सशस्त्र युद्धकाल में उसी विषय पर मेरे पिताजी ने ‘सखी’ नाम से एक नाटक लिखा था । उसको मैथिली और नेपाली भाषा में काठमाडौं, विराटनगर जैसे प्रमुख शहरों में दर्जनों बार मंचन किया गया । उस नाटक में ‘शोभा’ नाम की एक पात्र है । मुझे लगता है कि उस युवती के चरित्र में मेरा अभिनय जीवन की सब से सशक्त भूमिका है ।
० आप तो थियटर की कलाकार के रूप में ज्यादा परिचित हैं । क्यामरा के सामने (फिल्मों में) आप की अभिनय यात्रा कब से शुरु हुई थी ?
– सम्भवतः वि.सं. २०५८ साल की बात है । महजोडी अर्थात् मदनकृष्ण श्रेष्ठ और हरिवंश आचार्य ने ‘सृष्टि’ नाम का एक टेलिचलचित्र निर्माण किया है । उसमें सृष्टि नाम की एक युवती का चरित्र है । सृष्टि प्रमुख पात्र भी हैं । सृष्टि की भूमिका में अभिनय करने का सौभाग्य मुझे ही प्राप्त हुआ । सृष्टि मेरे लिए कलायात्रा की एक ‘टर्निङप्वाइन्ट’ भी है । उसके बाद मुझे बहुत सारे नेपाली और मैथिली पर्दों में काम करने का अवसर मिला ।तब भी मुझे थियटर का अभिनय ज्यादा आकर्षित करता है ।
० आप ने जो भी फिल्म निर्माता और निर्देशकों के साथ काम किया है, उसमें से आपके लिए आदर्श पात्र कौन हैं ?
– मुझे लगता है कि मेरे पिता जी ही मेरे कलाकारिता के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर हैं । अगर पिता जी कला क्षेत्र से जुड़े हुए नहीं होते तो शायद मैं भी इस क्षेत्र में नहीं आ पाती । इसीतरह पर्दा के सामने पहली बार मदनकृष्ण श्रेष्ठ और हरिवंश आचार्य जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ मुझे काम करने का अवसर मिला । वे तो मेरे लिए अभिभावक हैं । थियटर की दुनिया में सुनिल पोखरेल और युवराज घिमिरे जैसे व्यक्तित्व भी मेरे अभिभावक है । जीतु नेपाल, केदार घिमिरे के साथ भी काम किया । पिछली बार फिल्म ‘महाजात्रा’ में प्रदीप भट्टराई के साथ काम करने का अवसर मिला । यह सभी मेरे लिए सम्मानित व्यक्तित्व हैं ।
० कलाकारिता यात्रा में पारिवारिक और सामाजिक अवरोध का सामना करना पड़ा या नहीं ?
– जिस वक्त मैं जनकपुर स्थित थियटर में कलाकार के रूप में काम कर रही थी, उस समय महिला कलाकार नहीं थे । रञ्जु झा और मैं थी । जनकपुर बमकाण्ड में रञ्जू जी शहीद हो गई । समाज उस समय बेटियों को कलाकार के रूप में स्वीकार नहीं करता था । अपनी बेटी को कलाकार बनाने के लिए कोई अभिभावक राजी नहीं होते थे । पीठ पीछे बात करनेवाले लोग बहुत होते थे । लेकिन मेरे परिवारिक सदस्य ही कलाकारिता क्षेत्र में होने के कारण विरोध के बावजूद भी मैं आगे बढ़ पायी । आज परिस्थिति बदल चुकी है । लोगों की मानसिकता में परिवर्तन आ चुका है । आज तो कलाकार को सम्मान की नजर से देखा जाता है । उस समय अपनी बेटियों को कलाकारों के साथ मिलने भी नहीं देते थे । लेकिन आज ‘मेरी बेटी गीत गाती है, नाचती है’ कहते हुए अवसर की तलाश में हमारे पास आते हैं । यह एक सकारात्मक परिवर्तन है ।
० आप के विचार में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा कम करने के लिए और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए क्या करना होगा ?
– शिक्षा प्रमुख हथियार है । एक समय था, बेटियों को स्कूल भेजने के लिए अभिभावक कतराते थे । उस मानसिकता में आज परिवर्तन आ चुका है । सत्य तो यही है कि जब एक बेटी शिक्षित होती है, वह पूरे परिवार को शिक्षित बनाती है । उसके बाद समाज भी परिवर्तन की ओर आगे बढ़ता है । शिक्षा के बाद आत्मनिर्भरता दूसरा पक्ष है । अगर हर महिला आर्थिक रूप में खुद आत्मनिर्भर हो जाती है तो समाज में आज महिला हिंसा के नाम में जो भी घटना दिखाई देती है, वह स्वतः खतम हो जाएगी । इसीलिए महिलाओं के व्यक्तिगत जीवन में शिक्षा और सीप अनिवार्य आवश्यक है, जिससे वह आर्थिक दृष्टिकोण से आत्मनिर्भर बन सकती है ।
० आजकल किस काम में व्यस्त है आप ?
– लगभग चार सालों से नाटक लेखन और निर्देशन का काम कर रही हूँ । मेरी पहली नाट्यकथा है– कथा नहि भेटल, जो मंचन हो चुका है । आज तक चार–पाँच की संख्या में नाट्यकथा लिख चुकी हूँ । इसमें से सिर्फ दो कथा मंचन हुआ है । डा. राजेन्द्र विमल रचित कथा ‘झिमनी’ को भी मैंने नाट्य रुपान्तरण कर निर्देशन किया है । इसकी प्रस्तुति लाहन में हुई थी । इसीतरह मैं कविता भी लिखती हूँ । मैथिली भाषा में लगभग दो सौ की संख्या में कविता है ।
० कला क्षेत्र में आनेवाली नयी पीढ़ी के किशोर–किशोरियों के लिए क्या कहना चाहती हैं आप ?
– व्यक्तिगत रूप में मैं तो उन लोगों को इस क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकती हूँ, मेरी सलाह है कि वे लोग इस क्षेत्र में प्रवेश ना करें । क्योंकि यह एक दुखद क्षेत्र है । दुःख और संघर्ष तो हर क्षेत्र में होता है । लेकिन कलाकारिता में हरदम दुःख और हरदम संघर्ष करना पड़ता है । आप डाक्टर बन सकते हैं, इन्जिीनियर बन सकते हैं, या शिक्षक बन सकते हैं । एक बार शिक्षक बन जाते हैं तो तो आप जीवन भर शिक्षक के रूप में रह सकते हैं । उसके बाद आप को खास संघर्ष नहीं करना पड़ता । लेकिन कलाकारिता में ऐसा नहीं होता । यहाँ हरदम संघर्ष होता है, हरक्षण भागते रहना पड़ता है । इसीलिए अन्य क्षेत्रों की तुलना में यहां ज्यादा दुःख है ।
० फिर आप क्यों इसी क्षेत्र में हैं ?
– मैं तो जाने–अनजाने में इस क्षेत्र में आ गई । वेसे तो सभी लोगों के लिए एक ही बात लागू नहीं होती है । दूसरी बात, कला क्षेत्र को सरकार की ओर से आवश्यक सहयोग भी नहीं मिलती । अगर सरकारी की ओर से कला क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है तो बात कुछ और होती ।
० इसका मतलब सरकार की ओर से कला क्षेत्र को कुछ सहयोग नहीं मिलता ?
– हाँ, सरकार कला क्षेत्र में सिर्फ राजनीति करती है । कला और साहित्य क्षेत्र में राजनीति प्रवेश होने के कारण ही यह क्षेत्र पीछे पड़ा हुआ है । चलचित्र विकास बोर्ड नाम की एक संस्था है । लेकिन यहां का नेतृत्व और सदस्य किस को बनाया जाए, इसको लेकर राजनीति की जाती है । यही राजनीति के कारण कला क्षेत्र से बाहिर रहे व्यक्ति संस्था संचालन करने आ जाते हैं । जो कलाकार ही नहीं है, उसको कला क्षेत्र की जिम्मेदारी दी जाती है तो परिस्थिति क्या होगी ? कला और साहित्य क्षेत्र की विकास के लिए ही प्रज्ञा प्रतिष्ठान, चलचित्र विकास बोर्ड जैसे संस्था हैं । लेकिन फिल्मकर्मी ही चलचित्र विकास बोर्ड के सदस्यों को नहीं पहचानते हैं तो कला क्षेत्र कैसे आगे बढेगा ?

