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बजट समस्या से पीडि़त प्रदेश और स्थानीय निकाय : अंशु कुमारी झा

अंशुकुमारी झा, हिमालिनी अंक मई 2024 । ‘बजट’ शब्द का आर्विभाव फ्रेंच भाषा के ‘बूजट’ शब्द से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, ‘चमड़े का थैला’ । इस शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम फ्रान्स की महारानी के थैले से हुआ था । तत्पश्चात सन् १७७३ में व्यंग्य रचना में राबर्ट वालपोल (इंगलैन्ड के प्रधानमन्त्री) के “ओपनिंग दी बजट” के वित्तीय योजना के विरोध में किया गया था । बाद में यह शब्द बहुत ही महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि इसका व्यापक अर्थ वित्तीय आय व्यय का वार्षिक लेखा जोखा होता है । एक साधारण व्यक्ति से लेकर देश चलाने वाली सरकार तक को बजट की आवश्यकता होती है । बजट के बिना हम अपने खर्चों का मूल्यांकन और उपयोग सही तरीके से नहीं कर सकते हैं ।
देश चलाने के लिए बजट का निर्माण करना बहुत जरूरी है । बजट वित्तीय प्रशासन का एक शक्तिशाली साधन होता है । एक सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित बजट के बिना हम देश के सामाजिक एवं आर्थिक उन्नति की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं । हमारे देश को प्रशासनिक तौर पर तीन स्तर में बांटा गया है, संघ, प्रदेश और स्थानीय निकाय । इनको चलाने के लिए बजट की आवश्यक्ता होती है । विभिन्न क्रियाकलापों से यहाँ बजट पर संघ का ही वर्चस्व देखा जा रहा है जिससे प्रदेश और स्थानीय तह को चलाने में समस्या हो रही है ।



अब यह आर्थिक वर्ष भी समाप्त होने का समय आने लगा है । नीति तथा कार्यक्रम निर्माण, बजट की तैयारी के समय प्रदेश में अस्थिरता विराजमान है । सरकार तोड़ने, बनाने का निरन्तर चल रहा है । कुछ प्रदेश के सरकार पर वैधानिकता के सम्बन्ध में अदालत में मुकदमा चल रहा है । केन्द्र से लेकर देश के विभिन्न प्रदेशों में सरकार हिलती हुई दिखाई दे रही है । ऐसे में देश का भविष्य अव्यवस्थित हो रहा है । दुर्भाग्य की बात है कि एक तो प्रदेश वैसे ही संविधान प्रदत अधिकार के प्रयोग से वंचित है ऊपर से राजनीतिक अस्थिरता प्रदेश को आगे बढ़ने देने में बाधक है । इस प्रकार की गतिविधि से प्रदेश प्रति नागरिक में असन्तुष्टि है । जनता में संघीय व्यवस्था प्रति असन्तोष होने का अर्थ संविधान का असफल होना है । इसलिए सम्बन्धित निकाय को इस गम्भीर विषय के लिए सजग होना बहुत जरुरी है ।

देश में बजट निर्माण का समय आ गया है । नेपाल की संघीयता कार्य जिम्मेदारी में निक्षेपित और राजस्व अधिकार में केन्द्रीकृत है । यहाँ के संविधान का आशय यही है, केन्द्रीकृत राजस्व को कानून बनाकर विकेन्द्रीकृत करना । प्रदेश और स्थानीय तह में वित्तीय हस्तान्तरण की सुनिश्चितता संविधान में उल्लेख है परन्तु उक्त सुनिश्चितता से प्रदेहश और स्थानीय तह खुश नहीं है ।

आर्थिक वर्ष २०७५÷७६ से ०८०÷८१ तक को आधार मानते हुए सातों प्रदेशों ने औसत वार्षिक अनुदान १ खरब १२ अरब और स्थानीय तह ने २ खरब ६१ अरब प्राप्त किया । एक वर्ष में एक प्रदेश ने वार्षिक १६ अरब और पालिका ने लगभग ३५ करोड अनुदान नेपाल सरकार से प्राप्त किया जो सन्तोषजनक था । प्रतिशत में लाने के बाद वि.सं.२०७५÷७६ में १०.२७ प्रतिशत था परन्तु २०८०÷८१ में घटकर ८.३४ प्रतिशत पर आ गया है । यह अनुदान वितरण की कमजोरी है । इसमें सुधार की आवश्यकता है । स्थानीय तह की स्थिति वैसे भी अच्छी नहीं है । वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य में भी सही तरीके से बजट नहीं पहुँचाया जा रहा है । सरकारी विद्यालयों में दिवा नाश्ता के नाम पर बच्चों को कुछ भी खिलाया जा रहा है । उनके पठन पाठन हेतु पुस्तकों का भी अभाव ही रहता है । अन्य विभिन्न क्षेत्रों में भी बजट की पूर्णता नहीं दिखती । नीचे तक आते आते नेतागण भी अपना थैला भरते आते है । वैसे तो अनुदान वितरक की भी यह प्रवृति सही नहीं है । योजना तथा कार्यक्रम के लिये मन्त्रालय क्यों दौड़ना पडेगा ? यहाँ की परिपाटी ही दूषित है । गांवपालिका के प्रमुख से लेकर केन्द्र के सांसद लोग मन्त्रालयों में भीड़ लगाये रहते हैं । कोई भी चाहे जितना दौड़ लगा ले पर बजट का बहुत बड़ा अंश प्रधानमन्त्री तथा सम्बन्धित मन्त्री के निर्वाचन क्षेत्र में पहुँचता है । तत्पश्चात पार्टी के बड़े–बड़े नेता, शक्तिशाली सांसद, सचिव तथा कर्मचारी के यहाँ जाता है । इन सभी से स्पष्ट होता है कि अभी भी संघीय सरकार का अधिकांश मन्त्रालयय तानाशाही नियम को ही मान रहा है ।

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वो अपने आगे प्रदेश व स्थानीय तह का महत्व नहीं दे रहा है । केन्द्र में ही बजट रखा रहेगा पर नीचे तक नहीं पहुँचाएगा । इसका अर्थ है, उन बजट से अपने चमचों का सत्कार करना । मनमानी की भी हद होती है । अपने आगे नीचे स्तर की संस्था हो या व्यक्ति

महत्वहीन ही नजर आता है परन्तु यह ज्ञात होना चाहिए कि किसी भी चीज की विकास शैशवकाल से ही किया जाता है । बहुत तो ऐसे भी मन्त्रालय हैं जिसे पता है कि उक्त कार्यक्षेत्र प्रदेश और स्थानीय तह का ही है फिर भी एक रुपया भी नहीं देता । मन्त्रालय का बजट समानीकरण अनुदान के रूप में स्थानीय निकाय तक भेजना चाहिए था पर नहीं केन्द्र में ही रखा रहेगा । इसका अर्थ तो स्पष्ट है, जिसकी लाठी उसकी भैंस । २०८०÷८१ के मन्त्रालयों के परियोजनाओं के अध्ययन के तहत इस प्रकार की स्थिति महिला मन्त्रालय, कानून न्याय तथा संसदीय मामला मन्त्रालय, सञ्चार तथा सूचना प्रविधि मन्त्रालय और संस्कृति, पर्यटन तथा नागरिक उड्डयन मन्त्रालय में है । इन मन्त्रालयों ने एक रुपैया का भी बजट स्थानीय तह में विनियोजित नहीं किया है । जबकि महिला मन्त्रालय का अधिकांश कार्य क्षेत्र प्रदेश और स्थानीय तह में ही है । सभी मन्त्रालयों की जिम्मेदारी नीचे तक है फिर भी अनदेखा कर रहा है ।

एकात्मक व्यवस्था में सरकार द्वारा जो काम किया जाता है उसमें ६० प्रतिशत से अधिक काम प्रदेश और स्थानीय तह में करने का नियम है, परन्तु पैसा के कारण काम ही नहीं होता । स्थानीय प्रकृति का सेवा प्रवाह और सामाजिक, आर्थिक पूर्वाधार इत्यादि की जिम्मेदारी स्थानीय तह का है । प्रदेश संविधान के विकास के लिए अग्रगण्य भूमिका निर्वाह करता है । अन्तरपालिका स्तरीय और प्रदेश सम्बन्धि कार्य प्रदेश का है । फि भी इन दोनों का संघीय सरकार हमेशा महत्वहीन समझता है । जबकि संघीय सरकार संविधान अनुरूप नियमों का अनुसरण नहीं कर पा रही । कुछ दिन पहले ही मन्त्रीपरिषद की बैठक ने यह घोषणा की है कि मापदण्ड अनुसार एकल अधिकार के सवाल में संघीय सरकार ३ करोड़ और प्रदेश सरकार १ करोड़ से से कम की आयोजन सन्चालन नहीं कर सकती है । उक्त रकम कम ही है परन्तु यह नियम लागु करने पर विभिन्न मन्त्रालयों को समस्या होगी ।
समग्र में हम कह सकते हैं कि संघ के इस एकात्मक विचार से देश का विकास असम्भव है । नियम जो कहता है उसके अनुसार हर क्षेत्र में बजट का महत्व है । संविधान ने प्रदेश को विकास का वाहक माना है संघीय मन्त्रालय नहीं अब प्रदेश को ही पूर्वाधार विकास का नेतृत्व करना होगा तभी कुछ हो सकता है ।संसदीय अभ्यास में बजट को ही कानुन माना जाता है ।

संसद द्वारा पास हो जाने पर प्रदेश और स्थानीय तह में आयोजना भेजने के बाद भी मन्त्रीपरिषद निर्णय से उसे वापस ले लिया जाता है । इस प्रकार के क्रियाकलाप से भी हमलोग अवगत हैं । यह देश के हकहित के लिए सही नहीं है । प्रदेश और स्थानीय तह के लिए भी उसका बजट मिलना उतना ही आवश्यक है जितना संघीय सरकार के लिए ।

अंशुकुमारी झा

 



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