कहानी अघोरी भाउपन्थी
रात के किस समय ये तो पता नहीं पर एक चूहा पानी के बाल्टी में गिर कर मर गया था । छपाक की आवाज भी नहीं आई । पानी साइलेन्ट किलर बन गया था । पानी ढंक कर रखना चाहिए था । प्रचार में भी यही कहते हैं अर्थात स्वास्थ्य के लिए भी पानी ढंकना चाहिए । पानी ढंकना चाहिए ये तो सही है पर सवाल ये है कि जिस नल में पानी न आता हो उसे पानी कैसे निकाला जाय और किस बर्तन को ढंका जाय । नल है कनेक्शन भी है पर पानी नहीं है । हो सकता है सप्ताह में कहीं एक या दो बार पानी आता भी हो पर उसके यहाँ पानी आए काफी समय गुजर चुका है । नल से पानी वैसे ही गायब हो गया है जिस तरह नोट पर से राजा की तस्वीर । इसलिए वो सभी बाहर र्सार्वजनिक नल में बर्तन लाइन लगा कर पानी भरा करते हैं ।
पानी नहीं आता अै सिर्फये बात नहीं है ।आगे चलकर तो और भी कष्टकर समय आने वाला है । पानी के साथ ही लोडसेडिंग की भी समस्या है । बिजली पानी कभी आएगा पर प्रत्यक्ष में यह समय अत्यन्त जटिल और कष्टकर है । भविष्य के लिए पानी एक काल्पनिक वस्तु बन सकता है । यह भविष्य की बात है । अतीत भी कोई खास अच्छा नहीं रहा है । राजनीति ने जो सपना दिखाया था वह भी आज राजा के तस्वरि की तरह ही गायब हो चुका है । आशा और सपनों के पीछे दौडÞने की उनकी आदत हो गई है ।
कहने को तो ये देश पानी का धनी देश है । उसमें भी पेय जल का । आने वाले समय में युद्ध, स्त्री, भू भाग या सत्ता विस्तार के लिए न होकर पेय जल के लिए होगा, ऐसा हम सभी गर्व के साथ कहते हैं । गर्व इस अर्थ में कि हमारे पास पानी का अजस्त्र स्रोत है, तो युद्ध हो या शान्ति हम तो पेय जल के कभी न खत्म होने वाले अजस्त्र स्रोत के धनी हैं । बाकी लडÞते रहें हमें क्या । हम तो हाथ में पानी का बोतल लेकर ये दृश्य देखेंगे, ओलम्पिक के खेल की तरह । अभी तो खेल यहीं हो रहा है । खाली गागरी और बाल्टियाँ ।
किन्तु ये चूहा – चूहा पानी के ऊपर प्रश्न चिन्ह बन कर तैर रहा है । यह एक बाल्टी पानी उनलोगों ने काफी संर्घष्ा करके कल रात भरा था । पूरे परिवार के सदस्यों ने बारी बारी लाइन में लगकर पानी भरने में अपना योगदान दिया था । पानी के लम्बे लाइन में अपना नम्बर आना तो मुश्किल है ही कभी कभी तो लाइन आते आते पानी आना ही बन्द हो जाता है और नल के आगे रखा बर्तन काकाकुल की तरह मुँह खोले रह जाता है । किसने किस तरह कितना पानी भरा यह बहादुरी की बात है और इसकी चर्चा उसके जमात में होती है । जो पानी नहीं भर पाया वह महत्वहीन हो जाता है । एक कटोरा पानी भी कोई नहीं देना चाहता है । पानी बाँट कर धर्म कमाने वाली उक्ति अब ठण्डी हो गई है ।
उसने सर को झटका । धरती में तीन हिस्सा पानी है, एक हिस्सा भू भाग । हमारा देश हिमस्रोत के पेय जल से परिपर्ूण्ा है आदि । किन्तु आने वाला समय में मानव मूत्र को रिसाइकल कर के पीना पडÞेगा कि क्या – परन्तु मुत्र भी कैसे बनेगा निर्जलीय मनुष्य में । उसने दिमाग की ये सारी बातों को खारिज किया और सोचा ये सारी बातंे होती रहती है । किन्तु तर्क आश्रयविहीनों की तरह झुण्ड का झुण्ड आ रहा था । एक तर्क ने कहा अभी की समस्या ये है कि चूहा पानी के बाल्टी में कैसे डूब कर मरा – चूहा और कहीं मरता तो ठीक था अब पानी रखुँ या फेकूँ ये समस्या है । दूसरा तर्क था सबस्टिच्यूट में मिनरल वाटर । पर रोज तो मिनरल वाटर खरीद कर पी नहीं सकता । मिनरल वाटर भी कितना शुद्ध है इसकी कोई गाइरेन्टी नहीं है । सरकार की ही कोई गाइरेन्टी नहीं है कन्ट्रोल कौन करेगा – सबकी अपनी ही मर्जी है । जो चाहो सो करो । तो, सिर्फमिनरलवाटर शुद्ध उच्चारण करने से तो नहीं हो जाएगा, खरीदने के लिए पैसा भी तो चाहिए । पानी पीने के लिए अमेरिका तो जा नहीं सकते । अमेरिका उसकी चेतना में कुछ इस तरह घुसा है कि उसे लगता है कि वहाँ सब शुद्ध मिलता है । सुरक्षा भी है । एक मानव के पीछे दस पुलिस । वाह क्या बात है । हमारे यहाँ तो घटना स्थल पर पहुँचने के लिए पुलिस पोशाक पहनते पहनते दिन बिता देते हैं । कुछ दिन पहले गुप्तांग में पिस्तौल छुपाकर ले गए थे, अश्लीलता के लिहाज से वहाँ तक पुलिस जाँच नहीं कर पाई । जेल के भीतर ही हत्या नहीं हो जाती है –
तो क्या ये चूहा भी किसी गुप्त रास्ते से घर में आया होगा । चूहों की भी अराजकता है । नहीं, ये भी पानी की खोज में निकले होंगे । प्यास से परेशान होकर पूरे बाल्टी का पानी पीने के लोभ से बाल्टी में कूद गया होगा । परन्तु इसे पता नहीं होगा कि ये एक बाल्टी पानी हमारे परिवार के लिए कितना महत्व रखता था । इसका भी अपना परिवार होगा । वो सभी इसे खोज रहे होंगे, घर से निकले अपहरण हो गए व्यक्ति की तरह । ये चूहा भी लौट नहीं पाया, कहते हैं कि चूहों की जाति की प्रजनन क्षमता अत्यन्त तीव्र होती है । मनुष्य भी वैसा ही है । हम दो हमारे दो । ऐसा प्रचार प्रसार के बाद भी काठमान्डू में पोपुलेशन ऐसी बढी कि एक लीटर पीने का पानी भी मिलना बन्द हो गया ।
मरो । इस चूहा को भी मरने के लिए और कोई जगह नहीं मिली । इस पानी से भरे बाल्टी में क्यों मरना पडÞा । चूहा को लेकर उसके मन में कोई कथात्मक सोच नहीं उभर पा रही थी क्योंकि उसने लगभग बीस लीटर पानी बरबाद कर दिया था । कथा काल्पिनिक हो सकती थी, रोचक हो सकती थी किन्तु अभी यह मृत चूहा यथार्थ में उसका मूड बिगाडÞ रहा था । मूड नहीं यार पानी, वह स्वयं से बोला । उसके मन में उस चूहे के लिए अचानक घृणा उभर आई । किस समय मरा होगा – बाल्टी में उसकी इस तरह मौत हो गई मन किया उसकी आत्मा की चिरशांति की कामना करते हुए उसकी पूँछ पकडÞ कर उसे बाहर निकाल दूँ । आखिर मृत्यु ही सत्य है, मरे हुए शेर की मूँछ कितनी उखाडूँ । परन्तु उसे अभी मरे हुए चूहे के प्रति घृणा ही हो रही थी ।
उसने अपने मन में निर्ण्र्ााकर लिया था कि पूरा पानी वह बाहर फेंक देगा । उसी के साथ चूहा भी बह जाएगा और उसे सद्गति मिल जाएगी । घर में अभी कोई और नहीं जगा था । सुबह सुबह खाली पेट शुद्ध पानी पीने की उसकी आदत थी । शुद्ध के पीछे उसने एक बडÞा प्रश्नचिन्ह जडÞा । शहर में क्या शुद्ध है – शुद्ध पानी पीने का उसका परिवार हमेशा विरोध करता रहा है । खाना खाने के बाद एक गिलास पानी पीना तो आवश्यक है । पानी पीना कम करो, विद्युत बचाओ नारा की तरह, विद्युत बचाने का अर्थ है विद्युत उत्पादन । यद्यपि पूरा देश लोडसेडिंग से त्रस्त है, हमेशा से गरीबी और अविकास की तरह । बिजली नहीं है, जलाया भी नहीं गया है, उत्पादन बढÞा है । फिर भी नारा है विद्युत बचाओ ।
सुबह का एक गिलास पानी वह बहुत तृप्ति के साथ पीता है । एक बडÞे गिलास में वह पानी लेता है और बिना किसी आवाज के पूरा पानी पी जाता है । इस तरह चोरी-चोरी पानी पीने में एक रोमांच औरु थ्रिल का अनुभव होता है क्योंकि उसे लगता है कि वह परिवार की जानकारी के बिना एक गिलास पानी पीने की क्षमता रखता है । जन व्रि्रोह का फैशन ही है, शुक्र है एक गिलास पानी के लिए परिवार ने कभी जनव्रि्रोह की धमकी नहीं दी है ।
जो हो समस्या फिर भी बरकरार थी । चूहा छोटा था । छोटा होने से क्या मरा तो था एक बाल्टी में, अब वह चूहा था या चूहिया यह पता नहीं । अब पानी किसी काम का नहीं रहा । किन्तु, उसने एक क्षण के लिए अपनी सोच पर विराम लगाया । उसने अखवार में पढÞा था । गलत बातों को ये अखवार वाले ज्यादा उधेडÞते हैं । देश के किस नेता ने कितना खाया इसका हिसाब वो रखते हैं । नेता साफ सुथरा रहते हैं, चलते हैं पजेरो में, सरकारी पेट्रोल खर्च करते हैं, पुलिस की सुविधा लेते हैं, धूल धुआँ से बचते हैं फिर भी अखवार वाले न जाने क्यों उनकी छवि बिगाडÞते रहते हैं ।
खबर ये थी कि पानी के मुख्य स्रोत पर मानव मल जमा है । क्या पता वह पानी में भी मिला हो – पर ये बात अखवार में नहीं लिखी है । पानी तो अखवार वाला भी पीता होगा । अपनी बात नहीं कहनी है । बागमती अब मलमती बन गई है । बहुत अचम्भा है । उसे ऐसा लगता है । रेष्ट्रा में खाना स्वादिष्ट बनाने के लिए वैसे ही पानी का तो प्रयोग नहीं होता – मनुष्य हमेशा रेडिमेड खाना की तलाश में रहता है । महानगरीय जीवन तो एैसे ही बासी हो गया है, इसे दूर करने के लिए खट्टा, मीठा, तीखा, मसालेदार तो खाना ही पडÞा ।
पानी के स्रोत पर ही ऐसा है तो शुद्ध पानी कहाँ है – किन्तु ये चूहा – वह तो बेकार इस तर्क में फँसा है । चूहा हो या कुत्ता पानी के स्रोत में वो सब भी तो सडÞ गल कर आता होगा तो इस बाल्टी में लाख लाख चूहा भी डूब कर अगर मर गया तो क्या हुआ – महानगर का मनुष्य अघोरी हो गया है । किस बात की घृणा – इस बात में दम है । तर्क को मानते हुए वह धीरे से निःशब्द चूहे की पूँछ को पकडÞता है, उसने चूहे को तो नहीं निचोडÞा पर उसे थोडÞी देर लटका कर बाल्टी में टपकाता रहा । पर पीडÞक भावना भी थी चूहे के प्रति, लो और कभी किसी के पानी में डूब मरने की धृष्टता करोगे – यह स्वाभाविक था कि चूहा पानी में ही डूब कर मरा है, इसलिए उसके शरीर का पानी बाल्टी में ही टपकना चाहिए । उसे लगा कि चूहे को निचोडÞ कर भी पानी निकाल लूँ । दूध में गिरे मक्खी को निचोडÞने की कहावत उसे याद आई । अगर ऐसा हो सकता है तो मक्खी से तो चूहा बडÞा ही है जो बाल्टी में डूब कर मरा है । निचोडÞने पर कम से कम आधा गिलास पानी तो जरूर निकलेगा । आजकल तो महानगर अघोरियों का अड्डा बन गया है । अघोरी ।
उसने चुपचाप दरवाजा खोलकर मरे हुए चूहे को बाहर निकाला । भाग्य की बात थी कि दरवाजे में कोई चूँ चाँ की आवाज नहीं होती थी नहीं तो कोई न कोई जग ही जाता । फिर कितने प्रश्न होते । चूहे की पूँछ भीगी होने के कारण उसे र्स्पर्श सुख प्राप्त हो रहा था । पानी का र्स्पर्श सुख । किसी गदराए वक्ष स्थल पर हाथ रखने जैसा । चूहा को फेंकने जाने से पहले उसने बाल्टी का ढक्कन उठा कर उसे ढक दिया । किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि पानी में चूहा मरा था । चूहा ही तो डूबा था कोई कुत्ता जैसा बडÞा जानवर तो नहीं डूबा था ।
वह बाल्टी में ढक्कन लगा कर आश्वास्त हुआ, चूहा के मरने के बाद भी उसे ऐसा लगा कि जैसे अब पानी पवित्र हो गया है । जो भी हो पानी को ढँक कर रखना चाहिए । स्वास्थ्य के लिए अच्छी बात है । यद्यपि अब पानी का दूसरा बाल्टी कब भरने को मिलेगा यह पता नहीं था ।


